इस कहानी को सबसे अधिक दिलचस्प अगर कोई बनाता है तो वो है सम्पूरन ओबरॉय. वह फ़िल्म इंडस्ट्री से जुड़ा हुआ है. ज़िंदगी में कई उतार-चढ़ाव आए मगर बंदे ने हमेशा स्टेंडर्ड का जीवन जिया. हमेशा कर्जदार रहता था, फिर भी जरूरत पड़ने पर किसी न किसी तरह पैसे निकलवा लेता था.
ये गुण सिर्फ रविन्द्र कालिया के प्रसिद्ध उपन्यास "17 रानाडे रोड" के सबसे अहम किरदार सम्पूरन में ही हो सकता है. उसने कभी भी असफलता के सामने घुटने नही टेके,वरन खुद सफलता ही उसे रोज शीश नवाया करती थी. कठिन से कठिन मेहनत करना और आए दिन संघर्ष से जूझना मानों उसकी फितरत-सी बन गई थी. संसाधन न होते हुए भी बिज़नेस को खड़ा करना कोई सम्पूरन ओबरॉय से सीखे. उसने दिखा दिया कि बार-बार गिरने के बाद भी संभल कर कैसे खड़ा हुआ जाता है, न सिर्फ़ खड़ा हुआ जाता है, बल्कि मंज़िल को भी पाया जाता है. यह किरदार जितना संघर्ष करता है उतनी ही मस्ती.
सुप्रिया सम्पूरन की सक्रेटरी है. लेखक ने सुप्रिया का जो चित्र उपन्यास में खींचा है, बहुत ही क़ाबिल-ए-तारीफ है. सुप्रिया एक जुझारू लेडी है. सम्पूरन भी फिल्मी, व्यापारिक और राजनीतिक हस्तियों से उसका कभी सक्रेटरी के रूप में, कभी पत्नी के रूप में तो कभी सहायिका के रूप में परिचय करवाता रहता है. खुशी और ग़म दोनों में सुप्रिया सम्पूरन ओबरॉय को संभाले रखती है. सुदर्शन पुरुषार्थी कई दफ़ा रात को चलने वाले सम्पूरन-सुप्रिया के खेल का जब सुबह-सुबह जायजा लेता है तो मन-ही-मन लज़ा जाता , क्योंकि खुद खिलाड़ियों को भी नही पता होता था कि वे दोनों खेलते-खेलते थक हारकर कब और किस अवस्था में सो गए थे. अर्थात अजन्ता और एलोरा की गुफाओं के भित्तिचित्रों सरीखी दिखने वाली उन दोनों की शारिरिक मुद्राएं कमरे को प्रकाशमान करें ,इससे पहले वह उन पर सुबह उठते ही पर्दा डाल देता था. ऐसे मनोहर दृश्य किताब में बहुत बार पढ़ने को मिलते हैं.
सुप्रिया और उसकी सहेली का कई वर्षों बाद हुआ मिलन भी ऐसा ही नीला-पीला सीन प्रस्तुत करता है. इस तरह की भाव-भंगिमा को वर्णित किए बिना किसी भी बड़े उपन्यासकार की कोई किताब मुश्किल ही पूरी होती होगी. क्योंकि बात 'सरस फिलॉसफी' की जो आ जाती है.
एक तीसरा और खास किरदार है सुदर्शन पुरुषार्थी. वह भारत का एक जाना माना ग़ज़ल लेखक है. जो गांव से निकला और मुम्बई में वाहवाही लूटते हुए यूरोप में जा बसा. इंसान का जब नाम बिकना हो तो पता नही कब बिक जाए. कब अच्छे दिन आ जाएं. सुदर्शन भी आज प्रसिद्धि के सर्वोच्च शिखर पर था. एक दिन जब वह यूरोप से वापिस आया तो उसे पता चला कि उसका दोस्त सम्पूरन ओबरॉय अब इस दुनिया में नही रहा. तब वह सुप्रिया से कहता है कि वह उसे सम्पूरन की छोटी-से-छोटी बात तक बताए, क्योंकि वह अपने दोस्त पर एक उपन्यास लिखने जा रहा है.
सुदर्शन और सुप्रिया की इसी बातचीत के फ्लैशबैक में हम परिचित होते हैं "17 रानाडे रोड" नामक इस उपन्यास से. और पढ़ने को मिलती है वो कहानी जिसमें रविन्द्र कालिया ने अपने शब्दों को मुम्बई के सिनेमा जगत के बहाने कागज़ के पन्नों में पिरोया है.
इसके अलावा लेखक ने इसमें रूढ़िवादी समाज का चेहरा भी हमारे सामने खोल दिया. सम्पूरन की एक विज्ञापन फ़िल्म में काम कर रही एक यंग हीरोइन को उसके परिवार वाले वापस घर ले जाने की जिद्द करने लगते हैं. क्योंकि उनको फ़िल्म इंडस्ट्री में लड़कियों के काम करने के ढंग को लेकर समाज के नजरिये का डर सता रहा था. ऐसी ही घटना खुद सुप्रिया के साथ भी घटती है. उनके घर वाले भी लड़की को बाहर नौकरी करने के सख्त खिलाफ थे. और उसे तरह-तरह के ताने देते थे. सुप्रिया के भाई को तो इससे बहुत ज्यादा ऐतराज़ था. औरत के प्रति रूढ़िवादी समाज के घिनौने चेहरे का लेखक ने अच्छी तरह से पर्दाफाश कर दिया है.
उपन्यास में ये दोनों(यंग हीरोइन व सुप्रिया) श्रीमान सम्पूरन ओबरॉय के आशीर्वाद तले प्रोग्रेस कर रही होती हैं. तो, चिंता किसी बात की थी ही नही. बंदे ने दोनों के घर वालों को कुछ इस तरह समझाया कि उनमें ना करने की हिम्मत ही नही हुई. लेखक ने अपनी किताब के इस महान किरदार को जुबान का धनी बनाया है. उसके बात करने और समझाने के ढंग में एक जादू है. किसी माई के लाल में हिम्मत नही कि उसकी कही बात को नकार सके. क्या गज़ब किरदार गढ़ा है लेखक ने.
इसके अलावा लेखक ने साहित्यिक चोरी जैसी बुराई को भी उपन्यास में दिखाया है कि कैसे सुदर्शन की लिखी गज़लों को एक सरकारी कर्मचारी अपने नाम से छपवाकर प्रसिद्ध होने की कोशिश करता है. लेकिन सम्पूरन का आशीर्वाद मिलते ही सुदर्शन भी सुदर्शन चक्रधारी बन जाता है. सुदर्शन को हर बार एक नए नाम से पुकारने का सम्पूरन का स्टाइल मुझे बहुत अच्छा लगा. एकदम फनी टाइप.
अपनी माइंड पावर के दम पर सम्पूरन ने 17 रानाडे रोड पर एक बंगला खरीद लिया. सम्पूरन के आने से पहले इसे 'भूतों के बंगले' का खिताब हासिल था. सम्पूरन ने इसकी काया ही पलट दी. इस किताब में सम्पूरन को लेकर एक बात बार-बार कही जाती है कि वह जिस भी चीज को छू देता है वही सोना बन जाती है. इस बंगले को भी इस किताब का एक किरदार ही समझ लीजिए. अनेक बार यह भी मनोरंजन का जरिया बनता है.
पूरी कहानी फ़िल्मी दुनिया विशेषकर मुम्बई के ग्लैमर वर्ल्ड के इर्द-गिर्द घूमती है. सम्पूरन ओबरॉय का संघर्ष अत्यंत प्रेरणादायी है. अपनी हिम्मत और काबिलियत के दम पर खुद अपनी तक़दीर लिखने वालों का नाम है सम्पूरन और सुदर्शन. किताब पढ़ने के बाद मैं इतना तो कहूंगा कि यदि असल जीवन में सम्पूरन नाम का यह व्यक्ति धरती पर कहीं होता तो मैं उसका अनुयायी बन जाता. सच में बड़ा ही प्रभावशाली, संघर्षशील, दिलचस्प और लाज़वाब किरदार है उनका. किताब पढ़ने लायक है.
