राष्ट्रीय आंदोलन की पृष्ठभूमि पर एक प्रेम कथा

ये कहानी है भारती और श्रीराम नामक दो युवा क्रांतिकारियों के प्रेम की. देश को आज़ाद कराने और बापू के आंदोलन को सफल बनाने का उनका ज़ज़्बा बड़ा ही निराला है. इसके लिए कदम-कदम पर उन्होंने अपनी खुशियों का इज़हार करने की बजाए खुशी-खुशी उनका बलिदान किया. जेल की यातनाएं सही और निजी मुसीबतें भी झेली. पर कोई भी आफ़त उन्हें उनकी मोहब्बत से जुदा करने में कामयाब नही हो पायी. दोनों ही मजबूत इरादों वाले मेहनती युवा हैं. ख़्वाहिशें भी उनकी सीमित ही हैं.


गाँधी जी के एक कार्यक्रम के लिए भारती शहर भर में डोनेशन इकठ्ठा करती घूमती है. श्रीराम भी उस चंदे में अपनी तरफ से सहयोग करता है. यह उन दोनों की पहली मुलाकात थी. श्रीराम के मन में तो यहीं से ख्याली पुलाव बंधने भी शुरू हो जाते हैं. मग़र ख़्याल हक़ीकत में तब्दील हों उससे पहले तक़दीर को उसका इम्तिहान भी लेना था.



दोनों गांधीवादी स्वयंसेवक शादी करना चाहते हैं. इसके लिए भारती बापू की आज्ञा लेना बहुत जरूरी समझती है. वह अपना हर कार्य महात्मा जी की रजामंदी से ही करती है. बापू के चरण ही उसके लिए सुकून भरी जगह थी. जब तक ये अनुमति नही मिल गई तब तक उन्होंने अपनी इस चाहत को मन में ही दबाए रखा. जिस मिशन को लेकर वे राष्ट्रीय आंदोलन में कूदे थे, उस मंज़िल तक पहुँचे बिना एक गांधीवादी होने के नाते वे सन्तुष्ट हो भी कैसे सकते थे.

 

श्रीराम की तुलना में भारती एक सुलझी हुई और समर्पित स्वयंसेवक थी. अपने ख़्वाबों के पूरा होने तक वह अपनी भावनाओं पर काबू बनाये रखती है. वही श्रीराम को महात्मा से मिलवाती है,जब बापू अपनी यात्रा के पड़ाव के दौरान मालगुड़ी (लेखक की कहानियों का एक काल्पनिक गांव) में कुछ दिन रुकते हैं. दोनों ही गांधी जी के संदेश को देश में फैलाने का काम करते हैं. खास बात यह थी कि इस कार्य में कहीं भी उन्होंने हिंसा का सहारा नही लिया. क्योंकि दोनों ने महात्मा गांधी को अपना आदर्श माना हुआ है.


बंगाल समेत पूरे देश में हुए साम्प्रदायिक दंगों में परिवार से बिछुड़े बच्चों की देखभाल करने का काम भारती पूरी शिद्दत से करती है. एक-दूसरे को अपनाने के रास्ते में आई अनेक बाधाओं का उन्होंने मजबूती से सामना किया. बहुत बार उन्हें लंबे समय के लिए एक-दूसरे से अलग भी रहना पड़ा. इस जुदाई के डर से कई दफ़ा श्रीराम के मन में भारती से ताल्लुक टूटने का ख्याल भी आता है. यह भी एक वजह थी कि वह उससे शादी करने को ज्यादा बेकरार रहता है. इसलिए वह तरह-तरह के कयास भी लगाता है. पर ऐसा नही था, क्योंकि वह अपना ज्यादातर वक्त बापू के साथ आंदोलन के कामों में बिता रही थी.

 

भारती बंगाल से लौटकर महात्मा जी के साथ दिल्ली आ जाती है और श्रीराम को पत्र लिखकर वहीं पर मिलने के लिए कहती है,जो कैद से छूटने के बाद भारती से शादी का बेसब्री से इंतजार कर रहा होता है. अब सब्र का बांध टूटने का वक्त आ गया था. अंततः बिड़ला हाउस में एक रोज 'महात्मा का इंतज़ार' समाप्त हो जाता है और दोनों प्रेमी हमेशा के लिए एक-दूसरे के हो जाते हैं.


विभाजन के समय ट्रेनों में धर्म के नाम पर कैसे मार-पीट की जा रही थी इस विषैली नफ़रत की एक बानगी पढ़िए- " क्या मतलब है तुम्हारा,इस तरह मुझे क्यों घूर रहे हो? दोनों में से एक आदमी ने उसका कान खींचकर देखा और उसे एक छेद नज़र आया. इसे देखते ही उसने कहा "हिन्दू है" और फौरन उसे छोड़कर आगे बढ़ गए. श्रीराम को बाद में समझ आया कि ये लोग मुसलमानों की तलाश कर रहे थे, कोई मिलता तो उसे डिब्बे से बाहर फेंक देते. देश के अन्य भागों में जो हो रहा था, यह उसकी प्रतिक्रिया थी." 


ऐसे ही गांवों के दरिद्र हालात का ज़िक्र किया गया है. एक स्वयंसेवक ने श्रीराम को बताया, " देखो, अंग्रेजों ने हमारे देश का क्या हाल कर दिया है. उन्होंने यह अकाल इसलिए फैलाया है कि हम उनके गुलाम बने रहें. वे जंगलों और खेतों को लूट रहे हैं ताकि उनका युद्ध चलता रहे. महाजनों ने सारा अन्न अपने गोदामों में भंडार कर लिया है, उसकी कीमतें आसमान छू रही हैं. लड़ाई वाले लोग मुँह मांगी कीमत देकर इसे खरीद रहे हैं. इन गांवों की फ़िक्र किसी को नही है."


महात्मा जी की दिनचर्या और इबादत के बहाने प्रकृति का भी किताब में कई जगह चित्रण किया गया है.

मुख्य किरदार तीन ही हैं.

 

यह Waiting for the Mahatma का हिंदी अनुवाद है. आर.के. नारायण अंग्रेजी के विख्यात लेखक थे. ऐसे भारतीय लेखक जिनके अंग्रेजी लेखन ने पूरी दुनिया में अपनी जगह बनाई. 'महात्मा का इंतज़ार' युवा दिलों की संघर्षमयी दास्तान से निरुपित एक अत्यंत रोचक उपन्यास है. यह किताब एक संदेश भी है, जिसे पढ़कर आप प्रेम, शांति, अहिंसा और सद्भाव का अनुभव कर सकते हैं. स्वतंत्रता संग्राम में योगदान के साथ-साथ प्यार के परवान चढ़ने की ये एक दिलचस्प कहानी भर नही है, बल्कि युवाओं को निजी जिंदगी के समरूप देश के प्रति अपना फर्ज़ निभाने व उन्हें प्रेरित करने की दिशा में लेखक द्वारा किया गया एक ज़बरदस्त प्रयास है.