रूसो के दार्शनिक बनने की विचित्र कहानी

रूसो की एक बेपरवाह इंसान से दार्शनिक बनने की बड़ी रंग-बिरंगी कहानी है. वह एक करेक्टरलेस 'व्यक्ति' था. अनेक स्त्रियों से उसके गलत संबंध थे, और बिना शादी के उसने बहुत सारे बच्चे पैदा किए. वह न केवल कामुक था, वरन चोरी-चपाटी भी करता था. बताते हैं व्यक्तिगत रूप से रूसो इतना चरित्रहीन था कि उनके अंतिम संस्कार में चार-पाँच लोग ही शामिल थे. पर जब लोगों को ये पता चला कि फ्रांसिसी क्रांति का अग्रदूत रूसो का ही चिंतन था तो हजारों की भीड़ उनकी क़ब्र पर रोज इकट्ठा होती थी. जीते-जी उन्हें ऐसा सम्मान कभी नही मिला. 



हालांकि रूसो ने खुद में सुधार लाने के लिए संगीत का भी सहारा लिया, पर कोई फायदा नही हुआ. सरकारी नौकरी की पर लंबे समय तक नही टिक पाया. वह एक महिला के संपर्क में आया और उसने पाँच बच्चों को जन्म दिया. ऐसे बच्चों को वो अनाथाश्रम में भेज दिया करता था. कहते हैं पच्चीस साल बाद उसने इसी महिला से शादी भी की. ख़ैर, किसी दार्शनिक को उसके 'व्यक्तिगत' जीवन से नही उसके चिंतन और दर्शन से आंकना चाहिए. 


एक लेख ने बदला जीवन 


1749 में रूसो ने एक लेख लिखा, जिसके लिए अपने सनसनीखेज विचारों के चलते उन्हें एक बड़ा पुरस्कार मिला. इसमें उन्होंने बताया कि "प्रकृति की गोद में मनुष्य शुद्ध,पवित्र व नैतिक था, लेकिन कला और विज्ञान मनुष्य की नैतिकता में निरंतर गिरावट पैदा करते चले गए. सभ्यता का नाश और चारित्रिक पतन के कारण विज्ञान और कला हैं. यदि सरल,सुखी और सद्गुणी जीवन बिताना है तो प्रकृति की ओर लौटो. जैसे-जैसे समाज़ का निर्माण हुआ, मनुष्य बिगड़ता चला गया." माने ये कि प्रकृति की हर वस्तु अच्छी होती है लेकिन मनुष्य के हाथ में पड़कर वह बुरी बन जाती है. वह दौर यूरोप में औद्योगिक क्रांति का था, पर मानवीय मूल्य निरंतर खंडित हो रहे थे. 


यह लेख लिखते ही रूसो की ज़िंदगी में एक टर्निंग प्वाइंट आता है. उसने सभी औरतों से संबंध तोड़ लिए और साधारण रूप से अकेला रहने लग गया. यहीं से रूसो के कामुक और बेपरवाह व्यक्ति से दार्शनिक बनने की नींव पड़ती है. 


एक विश्वप्रसिद्ध वाक्य  


1754 में 'व्यक्तिगत संपत्ति' विषय पर  फिर एक लेख लिखते हुए बताया कि यहीं संपत्ति समाज़ में असमानता की जड़ है. 1755 में 'राजनीतिक अर्थव्यवस्था' पर एक और लेख लिखते ही रूसो फेमस हो गया. पर पुरानी आदत पूरी तरह से अब भी नही गई.  फिर से वह एक फ्रेंच महिला के संपर्क में आ गया, जो एक लेखिका थी और अकेली रहती थी. नाम- मैडम डी. एपिने. ये एक धनवान महिला थी जिसने रूसो के लिए एक शानदार घर बनवाया. यहीं पर रहते हुए रूसो ने अपने दो महान  ग्रन्थ लिखे-  सोशल कॉन्ट्रेक्ट तथा द एमाइल. 


सोशल कॉन्ट्रेक्ट का एक विश्वप्रसिद्ध वाक्य है- "Man is born free but everywhere he is in chains. मनुष्य स्वतंत्र पैदा हुआ है लेकिन हर जगह बेड़ियों से जकड़ा हुआ है." इसमें उन्होंने राजा को ईश्वर पुत्र मानने से मना कर दिया. आज भी ये वाक्य क्रांतिकारियों को सत्ता के खिलाफ आंदोलन करने को प्रेरित करता है. दूसरी किताब में धार्मिक पाखंड व चर्च की सत्ता का ज़बरदस्त विरोध किया. यह किताब बच्चों की शिक्षा के संबंध में लिखी गई. इन दो किताबों की वजह से रूसो को फ्रांस छोड़कर भागना पड़ा और इंग्लैंड पहुंच गया. इनके अलावा रूसो की एक आत्मकथा भी है, जिसे दुनिया की पहली प्रमाणिक आत्मकथा माना जाता है; इसमें उन्होंने अपनी सभी बुराइयों को स्वीकार किया है. 


इंग्लैंड में 'गौरवपूर्ण क्रांति' पहले ही हो चुकी थी. सो, उनके लिए वो सुरक्षित जगह थी. वहां पर वह सम्राट और प्रधानमंत्री का चहेता बन गया. इसी वजह से वहां के मंत्री उससे जलने लगे. यहां भी जीवन के खतरे की आशंका महसूस की और इंग्लैंड को भी बाय-बाय बोलता हुआ वापिस फ्रांस आ गया. फ़्रांसिसी क्रांति के तीन अमर शब्द स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व रूसो के सिद्धांतों की उपज ही थे. 


यदि रूसो न होता तो  


उसने मानव जीवन के दुःख भरे पहलू को देखा और उसे अपने चिंतन में उतारा. बाल्यकाल में ही पिता ने घर से निकाल दिया, माँ जन्म देते ही मर गई.  इसलिए बचपन पेरिस की सड़कों पर बीता. गांधी और टॉलस्टॉय ने रूसो से बहुत कुछ सीखा. नेपोलियन ने यह तक मान लिया था कि यदि रूसो न होता तो फ़्रांसिसी क्रांति न होती. 1778 में 'स्वतंत्रता' से प्यार करने वाला यह विरला दार्शनिक धरती से चलता बना. उनकी मृत्यु के 11 साल बाद हुई फ़्रांसिसी क्रांति में उनके विचारों को भरपूर स्थान तो मिला पर अपने इस स्थान को देखने के लिए रूसो जिंदा नही था. 


लेकिन,  

क्या आप जानते हैं कार्ल मार्क्स ने गवर्नमेंट नामक संस्था और प्राइवेट प्रॉपर्टी को लेकर जो बातें कहीं, 100 साल पहले रूसो वहीं बातें कहकर जा चुका था. खुद मार्क्स ने बहुत जगहों पर रूसो को कोट किया है. 

वो क्या कारण थे जिनके चलते रूसो ने सामाजिक झगड़े की जड़ निजी संपत्ति को बताया?  क्या रूसो जिस दौर में जी रहा था,ऐसा कहने के पीछे उस काल की परिस्थितियां जिम्मेदार थी?  क्यों रूसो ने स्टेट को अमीरों के हाथों में खेलता हुआ यंत्र कहा?  मार्क्स की प्रिमिटिव सोसायटी रूसो की प्राकृतिक अवस्था से कैसे मेल खाती थी?  और संपत्ति की इस लड़ाई को दूर करने के लिए रूसो ने कौन-सा मार्ग सुझाया? ये सब फिर कभी...