द कश्मीर फाइल्स : परदे पर पलायन की कहानी !

हसीन वादियों से घिरी डल झील में उस रोज कमल के फूल, बहती हुई कुमुदनी और पक्षियों का सुरमय संगीत नही, बल्कि कट्टरपंथियों का कर्कश शोर सुनाई दे रहा था. सुबह की अजान के साथ साम्प्रदायिक नारों से उस दिन कश्मीर की हर गली गुंजायमान हो रही थी. जिस मिट्टी में उन लोगों का जन्म हुआ, जिस आंगन में वो खेले-कूदे और जिन गलियों में घूमते हुए वो बड़े हुए, वहीं से उन्हें एक तय समय में निकाल दिए जाने का फरमान सुनाया जाने लगा. समूची मानवता के इतिहास में वो दिन 'काला दिन' साबित होने जा रहा था. वो दिन था सर्दियों का शुक्रवार. तारीख थी 19 जनवरी. और वो लोग थे कश्मीरी हिंदू (पण्डित). सन 1990 का वह नया साल कश्मीरी हिंदुओं के जीवन में मातम की दस्तक़ लेकर दाखिल हुआ. इन सब दस्तानों की गवाह बनने जा रही थी कश्मीरी जमीं की वो आबोहवा जिसकी फ़िज़ाओं में मंदिर-मस्जिदों से इबादत की जगह कुछ और ही सुनाई दे रहा था. 



उस भयानक मंज़र को सिर्फ याद करने भर से हर कोई सिहर हो उठता है कि कैसे जन्नत के खिताब से नवाजी गई वो जमीन अपने ही फूलों की कत्लगाह बनीं. जिन बाशिंदों को उस माटी ने अपने आगोश में पाला-पोसा, उन्हीं को विस्थापित, व्यथित और वंचित जीवन जीने को अभिशप्त कर दिया गया. जहाँ आदिदेव शिव, महर्षि कश्यप हुए, जहाँ विष्णु शर्मा ने पंचतंत्र लिखा, जहाँ भरत नाट्य शास्त्र और योगसूत्र की उत्पत्ति हुई, धरती पर स्वर्ग का प्रतिबिंब कहा जाने वाला वो कश्मीर अपनी इस महान संस्कृति से अलग होने की कगार पर खड़ा था. कट्टरपंथियों ने वहां के हिंदुओं के समक्ष एक ही बात रखी- रालिव-गालिव-चालिव अर्थात पलायन, धर्म परिवर्तन या मौत. 


कश्मीर में अगर रहना है, तो अल्लाहु अक़बर कहना है' , 'यहाँ अब क्या चलेगा, निज़ाम-ए-मुस्तफ़ा' , 'असि गछि पाकिस्तान. कट्टरपंथी इन्हीं नारों के साथ वहाँ के हिंदुओं पर कहर बनकर टूट पड़े. जो हिंदू जिस हालत में मिलता वहीं उसकी जीवन लीला खत्म कर दी जाती. हथियारबंद लोग किसी भी समय हिंदुओं के घर में घुस जाते, उनके पूजा स्थल तोड़ दिए जाते. पलायन करने वाले हिंदुओं पर जाते समय भी रास्ते में हमले किये जाने लगे. घाटी के हिंदू अपना घर-द्वार, खेत-खलिहान, संपत्ति व जमीन सब कुछ छोड़ने पर मजबूर कर दिए गए थे. आज़ादी के समय ही वैश्विक आतंकवाद ने कश्मीर में साम्प्रदायिकता का जो बीज बोया था, नब्बे के दशक तक आते-आते उसने एक विशालकाय वृक्ष का रूप ले लिया. दुनिया के किसी भी देश में हिंदुओं का वह सबसे बड़ा विस्थापन था. 


एक रिपोर्ट (अनुमानित) के मुताबिक़ 19 जनवरी को एक ही दिन में करीब साठ हजार हिंदुओं ने घाटी को छोड़ दिया. उस दौर में हिंदुओं के घर जलाने की लगभग बीस हजार घटनाएं घटी, उनकी दुकानों में लूट की चौदह हजार वारदातें हुई, ग्यारह सौ (सरकारी रिपोर्ट में दो सौ सत्रह) लोगों को निर्मम तरीके से मौत के घाट उतार दिया गया, हिंदुओं से जुड़े हुए एक सौ पचास शैक्षिक संस्थानों को आग लगा दी गई और सौ से ज्यादा मंदिरों व आश्रमों को तहस-नहस कर दिया गया. उमानगरी के मंदिर को बम से उड़ा दिया गया. हिंदू गांवों के नाम बदल दिए गए. बीसवीं सदी की शुरुआत में कश्मीरी हिंदुओं की संख्या तकरीबन दस लाख थी, जो उस सदी के अंत तक पहुँचते-पहुँचते करीब पाँच लाख रह गई. 1990 के पलायन के बाद तो गिने-चुने कुछ सैकड़ों हिंदू ही वहाँ रह पाए. लाखों की संख्या जब कुछ-सौ तक पहुंच जाए तो इसे पलायन नही नरसंहार कहा जाता है. 


यह सब अचानक एक लम्हें में लिखी गई पटकथा नही थी. वक्त ने कई बरसों से इसे पनाह दे रखी थी. शेख अब्दुल्ला की सरकार रह-रहकर कश्मीरी हिंदुओं को जख्म दिए जा रही थी. मिसाल के तौर पर उनके द्वारा पारित किया गया बिगलैंड अबॉलिशन एक्ट देखा जा सकता है, जिसके तहत हिंदुओं की कृषि योग्य जमीन छीन कर बिना मुआवजा दूसरे किसानों को थमा दी गई. जिस वक्त कश्मीर में हिंदुओं पर अत्याचार हो रहा था उस वक्त भी वहाँ कांग्रेस व नेशनल कॉन्फ्रेंस की गठबंधन सरकार थी और मुख्यमंत्री थे फ़ारुख अब्दुल्ला. केंद्र में गृह मंत्री थे मुफ़्ती मोहम्मद सईद. पर स्थानीय सरकार अलगाववादियों व कट्टरपंथियों के आगे बेबस थी और केंद्र सरकार खामोश. उसके बाद भी कई सरकारें आई और गई. उमर अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती, गठबंधन में बीजेपी सबने सरकार की कमान संभाली लेकिन कट्टरपंथियों के खिलाफ कोई जाँच नही हुई, कोई आयोग नही बैठा. तत्कालीन राज्यपाल जगमोहन की राजीव गांधी को लिखी चिट्ठी बताती है कि उन्होंने कई बार कश्मीरी हिंदुओं की समस्या को लेकर उन्हें आगाह किया पर राजीव गांधी के कानों पर जूं तक न रेंगी. उन कश्मीरी हिंदुओं ने सरकारों से न्याय की आस लगानी तक छोड़ दी जो उस वक्त अपने ही देश में रिफ्यूजी बनकर रह गए थे. यह सब कुछ उनके साथ तब हुआ जब देश में चुनी हुई संप्रभु सरकार थी, सेना थी, पुलिस थी, सुप्रीम कोर्ट था और मीडिया थी. पर सब के सब सिस्टम के आगे बेबस. "सरकार भले ही उनकी हो, पर सिस्टम तो हमारा है"- ये डायलॉग एक फ़िल्म का है. 


अब बात करते हैं उसी फ़िल्म की. 

पाँच लाख हिंदुओं के कश्मीर से पलायन और नरसंहार पर डायरेक्टर विवेक अग्निहोत्री ने एक फ़िल्म बनाई है. फ़िल्म का नाम है- द कश्मीर फाइल्स. अनुपम खेर, मिथुन चक्रवर्ती, पल्लवी जोशी, पुनीत इस्सर व दर्शन कुमार मुख्य कलाकार हैं. फ़िल्म में दर्शन कुमार (कृष्णा) पुष्कर नाथ (अनुपम खेर) का पोता है जिसके माँ-बाप-भाई को कट्टरपंथियों ने निर्मम तरीके से मार दिया था. वह सच्चाई और आतंकियों व वामपंथी समूह द्वारा फैलाए गए नैरेटिव के बीच फंसा रहता है. पुष्कर नाथ शिवरात्रि महोत्सव में भगवान शिव का रोल किया करते थे. पल्लवी जोशी (राधिका मेनन) एक यूनिवर्सिटी में वामपंथी विचारधारा की प्रोफेसर हैं. कृष्णा भी उसी यूनिवर्सिटी का छात्र है तथा प्रोफेसर राधिका और वहाँ का माहौल उसका ब्रेनवॉश करता है. पुष्कर नाथ की मृत्यु के बाद उनका पोता सच की तलाश में रहता है. वह उसके दादा के चार मित्रों- मिथुन (ब्रह्म दत्त- कश्मीर में नियुक्त एक अफसर), पुनीत इस्सर (हरि नारायण- एक पुलिस अधिकारी), एक पत्रकार और एक सरकारी डॉक्टर से मिलता है. इन चारों को पता होता है कि कृष्णा के परिवार को किसने और कैसे मारा था. जब ये चारों कृष्णा को सच बताने की कोशिश करते हैं तो ब्रेनवॉश हो चुके कृष्णा इनकी बातों को झूठ मानता है. एक अन्य सीन में पुष्कर नाथ कश्मीर में सब्जी खरीदने के लिए तो भारतीय मुद्रा देता है पर उसे चेंज के रूप में जिन्ना की तस्वीर लगी करेंसी वापिस मिलती है. 


जिस यूनिवर्सिटी में कृष्णा पढ़ रहा होता है उसमें हम शर्मिंदा हैं, नाम रहेगा अल्लाह का, संघवाद से आजादी जैसे नारे लगते रहते हैं. यूनिवर्सिटी का माहौल आज की पृष्ठभूमि में घूमता है. कश्मीर से अनुच्छेद 370 खत्म करने के बाद घाटी में इंटरनेट सेवा बंद कर दी जाती हैं, लेकिन प्रो.राधिका यूनिवर्सिटी की सभाओं में इसे गलत तरीके से पेश करके सरकार के इस निर्णय को मानवाधिकार व अभिव्यक्ति की आजादी के खिलाफ बताती हैं. वह कश्मीर के आतंकवादियों को फ्रीडम फाइटर के रूप में पेश करती है. एक कट्टर अलगाववादी नेता खुद को गांधी का अनुयायी बताते हुए कृष्णा से कहता है कि 'तुम्हारी मौजूदा हुकूमत आज के इस गांधी को टॉलरेट ही नही कर सकती.' कृष्णा स्टूडेंट यूनियन का चुनाव लड़ रहा होता है. वह प्रो.राधिका से इस विषय पर चर्चा करता है. वो उसे बताती हैं कि कश्मीर भारत का भाग नही है... वहाँ मानवाधिकारों का हनन हो रहा है...इंटरनेट सेवा बंद है... अगर भारत इंग्लैंड से आजादी मांग सकता है तो कश्मीर भारत से क्यों नही... अगर पॉलिटिकल पार्टी अपना झंडा रख सकती हैं तो कश्मीर अपना अलग फ्लैग क्यों नही रख सकता...कश्मीर के लोगों के लिए हमें कुछ भी करना पड़े वो हम करेंगे क्योंकि यही न्याय है... Azad kashmir is only justice...देश के बुद्धिजीवी और अल्पसंख्यक डरे-सहमे हुए हैं और वर्तमान निज़ाम बोल रहा है सब चंगा सी इत्यादि. कृष्णा भी इस माहौल में रम जाता है. इसी लिए वह अपने दादा के उन चार मित्रों द्वारा बताई गई सच्चाई को स्वीकार नही करता. और आतंकियों की बात मान लेता है कि कश्मीर से हिंदुओं को भगाया नही गया, वे स्वयं भागे थे. 


प्रो. राधिका उसे कहती है कि गवर्नमेंट भले ही उनकी हो पर सिस्टम तो हमारा है. वह उसे कश्मीर के कुछ नेताओं से मिलने भेजती है. वहाँ कृष्णा प्रो. राधिका का कट्टरपंथी नेताओं संग एक फोटो देखता है और उसे शक होने लगता है. पर यह शक अभी यकीन में बदलना बाकी था. इस दृश्य को देखकर आप समझ सकते हैं कि देशद्रोही नारे लगाने वाले लोग तो मात्र मोहरे होते हैं, असली खेल तो एक्टिविस्ट के रूप में राधिका जैसे लोग खेलते हैं. यहीं लोग देश व समाज में नैरेटिव सेट करते हैं. और वह भी hope अर्थात उम्मीद के नाम पर. 


फ़िल्म के कुछ मुख्य डायलॉग हैं जो लगभग हर सरकार में, हर समाज में चरितार्थ होते हैं. जैसे- 

"सरकार ने पद्मश्री आपको वीरता के लिए नही चुप रहने के लिए दिया है." 

"मीडिया अपराधियों व सरकार की रखैल होती है." 

"टूटे हुए लोग बोलते नही उन्हें सुना जाता है." 

"गवर्नमेंट भले ही उनकी है पर सिस्टम तो हमारा है." 


अंत में कृष्णा को सच्चाई का पता चल जाता है. फ़िल्म के आखिर में दिया गया उसका स्पीच अत्यंत महत्त्वपूर्ण है. वह यूनिवर्सिटी कैंपस में सभी छात्रों को हकीकत से रूबरू कराते हुए कहता है कि कश्मीर का सच इतना सच है कि हमेशा झूठ ही लगता है. हमें हिटलर के अत्याचारों के बारे में तो बताया जाता है पर कश्मीर के आतंकियों के बारे में नही. कृष्णा अपनी स्पीच में प्रो. राधिका की तरफ इशारा करते हुए कहता है कि देश की बुद्धिजीवी जमात और इतिहासकरों ने हमें यह सच्चाई कभी बताई ही नही. उनका सिर्फ एकतरफा इतिहासलेखन होता है. उस इतिहास से जुड़े हुए और भी कई तथ्य वह प्रस्तुत करता है जिसे अक्सर मिटा और दबा दिया जाता है. 


32 साल पहले कश्मीरी हिंदुओं पर हुए जुल्मों के दर्द को सिनेमा के पर्दे पर लेकर आई है यह फ़िल्म। पुष्कर, ब्रह्म, शिव, कृष्णा, शारदा, लक्ष्मी, राधिका, महेश, हरिनारायण नाम रखकर डायरेक्टर ने यह दिखाना चाहा है कि कट्टरपंथियों ने न सिर्फ इन नामों को नष्ट किया बल्कि भारत की महान आध्यात्मिक संस्कृति को ही कश्मीर से तबाह कर दिया, क्योंकि भारतीय संस्कृति में यह नाम देवी-देवताओं के नाम हैं. प्रो. राधिका के माध्यम से दिखाया गया है कि कैसे यह ह्यूमन राइट्स और अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर स्कूल और यूनिवर्सिटी के छात्रों व सामान्य जनता को लामबंद करते हैं. 


यह वर्ग ये बताने की हिमाकत नही कर पाता कि नरसंहार और विस्थापन भले ही किसी का हो वो घोर अमानवीय होता है. फ़िल्म में एक लड़की बोलती भी है- 'ऐ ज्यादा ज्ञान मत पेल.' फ़िल्म में अनुपम खेर का डायलॉग भी है- 'आजादी इज अ सॉन्ग ऑफ टेरेरिज्म.' घाटी में कट्टरपंथियों के अत्याचार, अलगाववादी नेताओं की डर्टी पॉलिटिक्स और मानवाधिकार संगठनों की राष्ट्र को खंड-खंड करने वाली घिनौनी सोच को जनता के सामने प्रस्तुत करने का दावा डायरेक्टर विवेक अग्निहोत्री ने किया है। फ़िल्म हरियाणा और मध्यप्रदेश में टैक्स फ्री है.