गांधी से आज का मीडिया यह सीखे

हिंदुस्तान के इतिहास का जो काल-विभाजन किया गया है उसमें सन 1920 से 1947 तक का समय 'गांधी युग' के नाम से जाना जाता है. गांधी अकेले ऐसे जन नेता थे जिन्होंने भारतीय संस्कृति, कला, साहित्य और राजनीति को सबसे अधिक प्रभावित किया. यूँ तो वे पेशे से वकील थे, पर आंदोलनों को सफल बनाने के लिए उन्होंने जो रास्ता चुना वह था-पत्रकारिता. अहिंसा द्वारा सत्य की विजय उन्होंने अख़बार के ज़रिए ही हासिल की. 

बकौल गांधी जी,"आत्मबल की कोई लड़ाई बिना अख़बार नही जीती जा सकती. अगर मैंने अख़बार निकालकर भारत और दुनिया को द.अफ्रीका की घटनाओं से अवगत न कराया होता तो मैं अपने उद्देश्य में कभी सफल नही हो पाता." मीडिया का हर एक लफ्ज़ किस तरह से पूरे विश्व को जागरूक करता है,इसे आज के पत्रकार गांधी जी के उपरोक्त कथन से सीख सकते हैं. 



अपने न्यूज़पेपर 'इंडियन ओपिनियन' को उन्होंने चार भाषाओं में निकाला. इसके ज़रिए उन्होंने अफ़्रीका में इंडियन और अफ्रीकन लोगों को एकता के सूत्र में बांधा. गांधी जी ने इसमें लिखा था- ''हम तमिल या कलकत्ता वाले नहीं हैं, न मुसलमान हैं न हिंदू , न ब्राह्मण न बनिया, बल्कि हम केवल और केवल ब्रिटिश भारतीय हैं. हमें साथ-साथ डूबना और साथ-साथ तैरना है." गांधी वो पत्रकार थे जो अपने अख़बारों में अपनी भारतीय जनता की कमियों को भी उजागर कर उन्हें दूर करने का सुझाव देते थे. मतलब वो एक निष्पक्ष पत्रकार थे. आज के पत्रकारों को सिर्फ़ दूसरों के दोष नज़र आते हैं. 


बापू का मानना था पहले अपने अंदर झाँको व आत्म-मंथन करो. अपने स्तंभों में वे अक्सर बताया करते थे कि समाज की भावनाओं को चोट पहुंचाने के मकसद से लिखना तो मैं कभी सोच भी नही सकता. "लिखने में जितना संयम मैं बरतता हूँ, पाठक उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते." मेहनती इतने कि चलती ट्रेनों में भी लिख लेते थे. उनके पास अपने विचारों को फैलाने का एकमात्र जरिया अख़बार ही था. इसी की बदौलत उन्होंने अपना मुकाम हासिल भी किया. व्यस्तता इतनी कि कई बार उनके सचिव को ट्रेन के शौचालय में बैठकर काम करना पड़ता था, ताकि गांधी जी का हर काम समय पर होता रहे. 


'सत्याग्रही' नामक अपने एक पेज के अख़बार को लेकर उन्होंने कहा था कि ये तब तक चलता रहेगा जब तक रॉलेट एक्ट वापस नही लिया जाएगा. ऐसा साहसी और निर्भिक पत्रकार गांधी ही हो सकता था. उन्होंने एक प्रैस भी स्थापित की जिसमें मनसुख लाल को संपादक और मदनजीत को सहायक संपादक नियुक्त किया. लिंकन व टॉलस्टॉय जैसे लोगों के विचारों को गांधी जी ने अपने लेखन द्वारा जन-जन तक पहुंचाने का काम किया. 


संपादक पद हेतु गांधी जी के पास बड़े-बड़े अखबारों के ऑफर आए पर उन्होंने उन सभी को नकार दिया. इस संदर्भ में उस वक्त के एक प्रसिद्ध न्यूज़पेपर 'बॉम्बे क्रॉनिकल' का उदाहरण दिया जा सकता है. माने लेखन उनके लिए व्यवसाय नही था. आज दो दिन रिपोर्टिंग करने वाला व्यक्ति भी संपादक की कुर्सी तक पहुंचने को लालायित रहता है. गांधी जी के अखबारों में कहीं भी रहस्य, चमत्कार, दिल दहला देने वाली, सनसनीखेज खबरें बिल्कुल नही होती थी, जैसा कि आज का मीडिया टीआरपी के चक्कर में अमूमन ऐसी न्यूज़ देता है. खबरों को बढ़ा-चढ़ा कर लिखना और समाज में भय पैदा करना उनकी कलम का हिस्सा नहीं था. 


खास बात यह भी थी कि उस समय जितने भी समाज सुधारक थे सब अपने-अपने पत्र या पत्रिकाएं छापते थे. मसलन, ऐनी बेसेंट का न्यू इंडिया, तिलक का केसरी, सुरेंद्र बैनर्जी का बनवासी, राजा राममोहन राय का संवाद कौमुदी, मौलाना आजाद का अल हिलाल, मौलाना मोहम्मद अली का उर्दू इत्यादि. 1930 के आंदोलन के चलते गांधी जी को जेल हो गई तो उनके दो अख़बार नवजीवन तथा यंग इंडिया बंद हो गए, पर जेल से छूटते ही उन्होंने इनका पुनः प्रकाशन शुरू कर दिया. क्योंकि समाज को सच से रूबरू कराने की उनकी इच्छा शक्ति दृढ़ थी. जीवन में थोड़ी देर के लिए आने वाली बाधाएं उन्हें उनके लक्ष्य से डिगा नही पाई. जिम्मेदार मीडियाकर्मी गांधी जी से सीख सकते हैं कि आर्थिक तंगी या अन्य किसी कारण से प्रैस रुक भी जाए तो हताश नही होना चाहिए. 1933 में गांधी जी ने तीनों अखबारों को मिलाकर 'हरिजन' निकाला. यह असल में उनके विचारों का रूपांतरण था. 


1942 में गांधी जी के गिरफ्तार होने के चलते हरिजन बंद हो गया. अंग्रेजी सरकार इससे इतना खौफ़ खाती थी कि उन्होंने अख़बार की पिछले दस साल की फाइलों को जलाने का हुक्म दे दिया. आज़ादी मिलने के कुछ दिन पहले गांधी जी ने सरदार पटेल से कहा कि अब 'हरिजन' को बंद हो जाना चाहिए, क्योंकि अब सरकार तुम्हीं लोगों के हाथ में है. मैं सरकार के कामों के समर्थन में नही हूँ. अगर हरिजन छपता रहा तो मैं सरकार के खिलाफ लिखने से खुद को रोक नही पाऊँगा. 


गांधी जी ने जितने भी पत्र-पत्रिकाएं निकाली लगभग सभी के सभी साप्ताहिक थे. इसका एक मतलब ये भी माना जा सकता है कि वे विज्ञापनों के पक्ष में नही थे. उन्होंने खुद भी कहा है कि जिस अख़बार को विज्ञापनों का सहारा लेना पड़े उसको चलाने का कोई लाभ नही. हर एक विषय पर उनकी कलम कैसे चलती थी? पढ़िए ऐसे चलती थी- ग्रामीण कुटीर उद्योगों के लिए उन्होंने 'खादी समाचार', 'खादी पत्रिका' औऱ 'खादी जगत' का प्रकाशन किया. शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए 'नई तालीम' तो महिला जागरूकता पर 'महिला आश्रम पत्रिका' निकाली. साहित्य पर 'जीवन साहित्य' के ज़रिए उनकी कलम चली तो भाषाओं का प्रसार करने के लिए 'सब की बोली' का प्रकाशन किया. उनका केवल यही मानना था कि मनोरंजन और पैसा कमाने के लिए प्रकाशन करना न समाज हित में है न देशहित में. जबकि आज का मीडिया तो खड़ा ही विज्ञापन की बुनियाद पर है. और गांव-देहात की कवरेज करने में वो अपनी तौहीन समझता है. 


गांधी जी की जर्नलिज़्म से प्रभावित होकर इस देश के अनेक नेता पत्रकार बने. मसलन, राजेंद्र बाबू ने साप्ताहिक 'देश' निकाला. गणेश शंकर विद्यार्थी ने 'प्रताप' , अंबिका प्रसाद वाजपेयी ने 'भारत मित्र', शिव प्रसाद गुप्त ने 'आज' , बनारसीदास चतुर्वेदी ने 'विशाल भारत' ,कृष्णदत्त पालीवाल का 'सैनिक' तो हरीभाऊ उपाध्याय ने 'मालव मयूर' का संपादन किया. इन सबने गांधी जी की कही बात का अनुसरण किया कि सत्य की विजय के लिए अख़बार जरूरी है. जनता की भावनाओं को समझना व उसे अभिव्यक्त करना ही मीडिया का उद्देश्य होना चाहिए, ताकि जन समुदाय में वांछनीय विचारों को जागृत किया जा सके. उस वक्त ऐसे ही विचारों को फैलाने की दरकार थी और इन नेताओं की कलम समाज को सही रास्ता दिखाने में सक्षम भी हुई. 


यदि पत्रकारिता के महज़ कुछ ही वर्ष पीछे के बेसिक इतिहास को पढ़े-सुनें तो आसानी से पता चल जाता है कि तब संस्थान के मालिक और संपादक के बीच टकराव व दबाव नाम की कोई चीज़ नही थी. संपादक नेताओं से मिलने में भी दूरी ही बनाये रखते थे. संस्थान का मालिक बिजनेसमैन जरूर होता था ,लेकिन उसमें ईमानदारी हुआ करती थी. अब तो हर तरफ पैसे की लूट ही लूट मची है. जर्नलिज़्म को धंधा बना लिया गया है. बापू होते तो कहते कि 'ऐसी मीडिया को सन्मति दे भगवान.' 


गांधी जी पत्रकारिता को 'सेवा' मानते थे. आज देश के जिम्मेदार मीडिया संस्थानों के कर्त्ता-धर्त्ता खुले आम स्वीकार कर रहे हैं कि हम विज्ञापनों का बिजनेस करते हैं. विज्ञापन के बीच अगर कहीं कोई स्पेस बचता है तो वहाँ ख़बर फिट कर दी जाती है. आज आप देखिए मीडिया कैसे खबरों की दिशा मोड़ता है. घटना गैंगरेप की होती है. मीडिया मंचो पर बहस होगी आरोपी किस समुदाय का है? पीड़ित किस समुदाय की है? जहाँ गैंगरेप हुआ वहाँ किस धर्म-जाति के लोग बहुतायत में हैं? उस राज्य में सरकार किस पार्टी की है? सरकार का विज्ञापन बज़ट कितने रुपये का है? मीडिया इस मुद्दे पर कभी बहस नही करेगा कि सत्तर साल की आज़ादी के बाद भी हम वो समाज और वो माहौल क्यों नही बना पाए जहाँ गैंगरेप हों ही नही? आखिर क्यों नही होती ऐसी बहस. इसका ज़वाब आप और हम सब जानते हैं. 


पुनश्चः  जर्नलिज़्म ऑफ करप्शन के इस दौर में प्रो-पीपुल जर्नलिज़्म की परंपरा फिर से स्थापित करनी है तो गांधी की पत्रकारिता को फॉलो करना होगा. जर्नलिज़्म ऑफ करेज को आदर्श मानने वाले खबरनवीस ही हुक़ूमत के दोषों को जनता के सामने रख सकते हैं. यूँ तो गांधी जी का लेखन हर काल में प्रासंगिक रहेगा. मग़र आज जिस तरह मीडिया अपने पतन की गाथा शौक और गुमान से निरंतर लिखती चली जा रही है,ऐसे में गुजरी सदी के बेशकीमती लेखनी वाले महान पत्रकार गांधी जी की कलम को दोहराना समय की जरूरत बन जाती है.