सुसेन ओकिन : नारीवाद की पैरोकार

ग्रीक दार्शनिक अरस्तू महिला-पुरूष असमानता को सही मानते थे. उनकी नज़र में एक स्त्री शासन के योग्य नही है. कारण बताया गया कि महिला के पास दिमाग नही होता, बुद्धि नही होती. अमेरिकी नेता थॉमस जेफरसन का नज़रिया भी ऐसा ही था कि महिलाएं राजनीति से दूर रहें तो ही अच्छा है. ऐसे अनेको-अनेक रूढ़िवादी महानुभाव  इस दुनिया में हुए हैं. इंग्लिश दार्शनिक जॉन स्टुअर्ट मिल ने 1869 में अपनी बुक 'सब्जेक्शन ऑफ वीमेन' में महिला मताधिकार की आवाज़ उठाई तो फ्रायड जैसे लोगों ने उनको जमकर गालियां दी. खुले तौर पर मिल का मजाक उड़ाया गया. महिला को 'राइट टू वोट' सबसे पहले बीसवीं सदी के दूसरे दशक में मिला जबकि मिल पचास साल पहले ही ऐसा कह चुका था. 



18वीं सदी तक किसी भी विद्वान की हिम्मत नही पड़ी कि कट्टरपंथियों के इस नज़रिये को मजबूती से चुनौती दे सकें. समाज में एकतरफा पितृसत्ता मौजूद थी. इस सदी के अंत में यह बीड़ा उठाया एक नारीवादी लेखिका मेरी वॉलस्टनक्राफ्ट ने. उन्होंने 1792 में एक बुक लिखी-'ए विंडीकेशन ऑफ द राइट्स ऑफ वीमेन.' उनका कहना था कि विवाह भी एक कानूनी वेश्यावृत्ति ही है, इससे पुरुष-समाज को महिलाओं को अपनी दासी बनाने का लीगल राइट मिल जाता है. 1798 में उनकी मृत्यु के बाद उनके पति ने मेरी की याद में एक जीवनी लिखी. मिल ने भी वह बुक अपनी पत्नी हैरियट टेलर को समर्पित कर दी थी. 


कुछ विद्वानों का मानना है कि मिल की उस बुक से खुद मिल नही बल्कि उनकी पत्नी बोल रही है. ये सही भी है क्योंकि जैसे ही उनकी जिंदगी में हैरियट  आई तभी से मिल ने नारीवाद पर लिखना शुरू कर दिया था. फेमनिज्म आंदोलन की मुख्य तीन लहरें मानी जाती है. नारीवाद की पहली लहर मेरी वॉल्स्टनक्राफ्ट की इसी बुक से शुरू होती है. दूसरी लहर में बैटी फ्रीडन और सीमोन डी बोउवार(द सेकेंड सेक्स) जैसी नारीवादी फिलॉस्फर हुई. जिन्होंने समाज की इस कुंठित सोच को चैलेंज किया कि एक महिला मां, पत्नी और बेटी के रूप में ही संतुष्ट रहती है. इनके बाद मार्था नासबॉम और सुसेन मोलर ओकिन जैसी उदार लेखिकाएं आई. 


लिबरल फेमनिस्ट ने सरकार से डिमांड करी कि वह महिलाओं के निजी क्षेत्र में भी हस्तक्षेप करे, क्योंकि एक स्त्री का उसके निजी क्षेत्र यानी परिवार में भी शोषण, उत्पीड़न व भेदभाव होता है. सुसेन ओकिन ने 1989 में एक किताब लिखी - "जस्टिस, जेंडर एंड द फेमली." इसका एक प्रसिद्ध वाक्य है- 'व्यक्तिगत ही राजनीतिक' (personal is political) है. पूरी किताब इसी पंक्ति के आहर-बाहर घूमती है. उन्होंने इसमें कई कारण बताए कि आखिर क्यों व्यक्तिगत राजनीतिक होता है?  मसलन उन्होंने शक्ति का उदाहरण दिया. 


ओकिन का मानना था कि जहां पावर है वहां पॉलिटिकल है, और पावर परिवार में भी होती है. परिवार में पावर का सबसे खतरनाक रूप होता है स्त्री पर होने वाली हिंसा. पुरुषों द्वारा इस हिंसा को प्राकृतिक बता दिया जाता है . इसलिए फेमली को राजनीतिक समझा जाए. और सरकार यानी राजनीति उसमे हस्तक्षेप करे. चूंकि परिवार एक व्यक्तिगत क्षेत्र है, इसलिए सरकार द्वारा हस्तक्षेप करते ही व्यक्तिगत राजनीतिक (personal is political) हो जाता है. 


वे श्रम विभाजन का एक और उदाहरण देती है. ओकिन का कहना है कि महिलाएं ज्यादातर घरेलू कार्यों में इतनी व्यस्त रहती हैं कि उन्हें अन्य पब्लिक क्षेत्र में भाग लेने का अवसर ही नही मिल पाता है. यहीं वजह है कि महिलाएं बिजनस, राजनीति आदि में कम पाई जाती हैं. अर्थात महिलाएं अपना पेशा चुनने के लिए स्वतंत्र नही होती. दूसरी तरफ इस घरेलू कार्य का उन्हें कोई वेतन भी नही मिलता जिस कारण वे पुरुषों पर निर्भर रहती हैं. अतः परिवार ऐसा हो जहाँ घरेलू श्रम का भुगतान किया जाए. इसलिए ये नारीवादी इस श्रम में सरकार का हस्तक्षेप चाहते हैं. चूंकि घरेलू श्रम भी व्यक्तिगत अर्थात पारिवारिक है, जैसे ही सरकारी हस्तक्षेप होगा तो व्यक्तिगत राजनीतिक (personal is political) बन जायेगा. इनके अलावा भी सुसेन ओकिन 'सामाजिक क्षेत्र' और 'लिंग समाजीकरण' जैसे कई उदाहरण पेश करती हैं. 


ओकिन के मुताबिक इस जेंडर सोशलाइजेशन से जेंडर डिस्क्रिमिनेशन क्रिएट होता है. सबसे पहले यह परिवार में पनपता है. परिवार में लड़की को क्यूट, लविंग गर्ल और इमोशनल के रूप में देखा जाता है जबकि लड़के को ताकत और एग्रेशन के तौर पर. यहीं से एक महिला को पुरुष से कमतर आंकने का खेल शुरू हो जाता है. इसलिए सरकार फेमली को भी अन्य संस्थानों की तरह एक राजनीतिक संस्थान ही समझे व इसमें हस्तक्षेप करे. 


सुसेन ओकिन ने अपनी इस किताब में दिखाया कि अतीत और वर्तमान के कितने राजनीतिक सिद्धान्त ऐसे हैं जिन्होंने महिला-पुरुष समानता और न्याय की पैरवी की. ओकिन का हमेशा ये मानना रहा कि न्याय से संबंधित जितने भी सिद्धान्तकार हुए हैं सभी ने परिवार  के अंदर लैंगिक अन्याय को अनदेखा किया है. बहुत से देश नारीवाद का झंडा बुलंद जरूर करते हैं पर हकीकत में नही सिर्फ कानून में. USA दुनिया का सबसे विकसित व ताकतवर देश है मगर आजतक देश की बागडोर किसी महिला के हाथ में नही आ सकी. 


सुसेन ओकिन ने माना कि बच्चा न्याय की बातें सबसे पहले परिवार से सीखे न कि स्कूल के इंतजार में रहे. परिवार में एक बच्चा अपनी माँ पर हुए शोषण को देखता है, माँ की पिता पर निर्भरता को देखता है तो ऐसे हालात में आने वाली पीढियां परिवार से क्या सीखेंगी. जब तक परिवार न्यायिक नही होगा , हम न्याय आधारित समाज की कल्पना भी नही कर सकते. प्रेम व एकजुटता न्यायिक परिवार के दो गुण हैं. श्रम और लिंग का यह विभाजन अन्य क्षेत्रों में भी महिलाओं के लिए अवरोध पैदा करता है. जेंडर सोशलाइजेशन के जरिए उन्होंने इस पर विस्तार से बताया है. 


पुनश्च : अपनी इस किताब के कारण 'अमेरिकन पॉलिटिकल साइंस एसोशिएसन' ने ओकिन को एक बहुत बड़े पुरस्कार से सम्मानित किया. वे लंबे समय तक स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस की प्रोफेसर रही. इससे पहले वे ऑकलैंड और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में भी पढ़ा चुकी थी. उन्होंने सिद्ध कर दिया कि तर्क और विवेक के मामले में पुरुष व महिला दोनो बराबर हैं. अतः लिंग आधारित भेदभाव किसी भी नज़रिए से सही नही है. नारीवादी दर्शन में रुचि रखने वालों के लिए सुसेन ओकिन का वर्क बहुत ज्ञानवर्धक साबित होगा. महिलाओं के प्रति अपने वैज्ञानिक दृष्टिकोण के चलते ओकिन दुनियाभर में एक महत्वपूर्ण नारीवादी राजनीतिक दार्शनिक मानी जाती हैं.