चिंतन के साथ-साथ व्यवहार के क्षेत्र में अभूतपूर्व काम करने वाले इटालवी विद्वानों में एक बड़ा नाम एंटोनियो ग्राम्शी का भी आता है. मुसोलिनी को कड़ी चुनौती देते हुए इटली की जनता को उन्होंने आभास कराया कि लोकतंत्र वही है जो सिविल सोसायटी को महत्व दे. मार्क्स ये कहकर जा चुके थे कि मजदूर क्रांति उन्नत पूंजीवादी देशों में होगी. पर ग्राम्शी ने देखा कि इन देशों में दूर तक कहीं कोई वैसी क्रांति नज़र नही आ रही. कारण मिला कि मज़दूर उस सत्ता से खुश था. तमाम मज़दूरों को सत्ता द्वारा दी गई ये खुशी हज़म कैसे हो गई? इसी प्रश्न का उत्तर तलाशने का काम किया महज़ चार फुट दस इंच के एक इटालवी विद्वान ग्राम्शी ने.
इटली की एक बहुत ही गरीब, दरिद्र व वंचित बस्ती में उनका जन्म हुआ. उन लोगों की समस्याओं को उन्होंने बचपन से ही महसूस किया था. आगे चलकर हाशिए पर पड़े ऐसे ही तबके की बुलंद आवाज़ बनकर उभरे एंटोनियो ग्राम्शी. इसी वजह से उन्हें सबाल्टर्न वर्ग का एक मजबूत योद्धा माना जाता है. फासीवादी शासकों को विद्वानों के ऐसे ही काम खटकते हैं. ग्राम्शी भी क्रूर शासकों का शिकार होने से नही बच पाए. वे दस वर्ष तक के लिए जेल में डाल दिए गए.
ऐसा कहा जाता है इटली में जो भी महान लेखक हुए उन्होंने अपने जीवन का सर्वश्रेष्ठ कार्य जेल में ही किया. टोमेसो कंपानिला भी इटली के ही थे,जिन्होंने अपना महत्वपूर्ण वर्क पच्चीस साल के लंबे कारावास के दौरान ही किया. ग्राम्शी भी शांत नही बैठे,हालांकि जेल में भी उनके लिखने पर रोक लगाई जाती रही. बंदा जब बाहर निकला तो उसके हाथ में तीस नोटबुक थी, जिन्हें इतिहास में 'द प्रिजन नोटबुक' के नाम से जाना जाता है.
वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल ने 'द प्रिंट' के लिए "ग्राम्शी,अंबेडकर और लालू: वंचितों की मुक्ति के प्रश्न से टकराती तीन शख्सियतें" नामक शीर्षक से एक लेख लिखा. उन्होंने बताया -
"ग्राम्शी और आंबेडकर के बीच समानता के बिंदुओं की तलाश के क्रम में 2010 में लंदन यूनिवर्सिटी में दुनिया भर के राजनीति विज्ञानियों, इतिहासकारों, नारीवादी लेखकों, फिलॉसफी के विद्वानों के एक सेमिनार में शामिल हुए, जिसे स्कूल ऑफ अफ्रिकन एंड एशियन स्टडीज के प्रोफेसर कॉसिमो ज़ीन ने आयोजित किया.
इस सेमिनार का विषय था –ग्राम्शी एंड अंबेडकर ऑन सबाल्टर्न एंड दलित.
इस दौरान पेश किए गए आलेखों को संकलित करके एक किताब छापी गई है, जिसका नाम है – 'पॉलिटिकल फिलॉसफी ऑफ एंटोनियो ग्राम्शी एंड बी आर अंबेडकर: आइटिनररिज ऑफ दलित एंड सबाल्टर्न'. इस किताब की प्रस्तावना प्रोफेसर ज़ीन ने लिखी. इसमें ग्राम्शी और आंबेडकर के बीच समानता के पहलुओं को उजागर किया गया."
बकौल दिलीप मंडल "जहां इटली की सरकार चाहती थी कि ग्राम्शी कम से कम 20 साल तक जेल के अंदर रहें, वहीं भारत की सरकारें और सत्ता संरचनाएं चाहती है कि लालू प्रसाद यादव कभी जेल से न छूटें. ग्राम्शी इटली के वंचितों, गरीबों, सबाल्टर्न के सवालों पर लगातार मुखर रहे और जेल में रहने पर भी उनकी आवाज कमजोर नहीं पड़ी. उसी तरह लालू यादव भी भारत में दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के सवाल पर लगातार मुखर रहे हैं और जेल जाने के बाद भी इन सवालों पर बोलना बंद नहीं करते. इतने सारे मुकदमों और कानूनी उलझन में फंसे होने के बावजूद लालू प्रसाद ने सामाजिक न्याय और सेकुलरिज्म के सवालों पर बोलना बंद नहीं किया है. पिछड़ों, दलितों और आदिवासियों के आरक्षण के सवाल पर वे देश की सबसे मुखर आवाज हैं. इस वजह से वे सामाजिक और राजनीतिक सत्ता संरचना में किन शक्तियों को नाराज कर रहे हैं, इसकी सिर्फ कल्पना की जा सकती है."
पुनश्च: ग्राम्शी ने इटली की मजदूर पार्टी को क्रांति के लिए प्रेरित किया. जब मुसोलिनी सत्ता में आया उससे साल भर पहले कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इटली बनी थी. ग्राम्शी उसके उपाध्यक्ष बनाये गए. पूंजीपतियों की जिस चाल को पकड़ने में कार्ल मार्क्स के अनुयायियों की नज़र धोखा खा गई उसे ग्राम्शी ने पहचान लिया. यदि आप उसे जानना चाहते हैं तो आपको ग्राम्शी की 'हेजेमनी अर्थात वर्चस्व की थ्योरी' पढ़नी होगी. एकेडमिक जगत में उनको सबसे बड़ी पहचान इसी थ्योरी ने दिलाई.
