महिला समाज सुधार का जो काम यूरोप में मैरी वॉल्सटनक्रॉफ्ट ने किया था, हिंदुस्तान में वहीं काम पंडिता रमाबाई कर गई. उन्होंने उस दौर में अपनी ज़िंदगी को जिया जब हिंदुस्तानी समाज पर पुरुष वर्चस्व पूरी तरह कायम था. महिलाओं के प्रति होने वाले इस भेदभाव को धार्मिक लोग उचित साबित करने पर तुले हुए थे. समाज पूर्णतः रूढ़िवाद की चपेट में जी रहा था. ऐसे हालातों में नारी को जागरूक करने का बीड़ा उठाया पण्डिता रमाबाई ने. 'पण्डिता' की ये उपाधि उन्हें कलकत्ता के संस्कृत विद्वानों द्वारा दी गई.
"हिंदू स्त्री का जीवन" 1887 में छपी रमाबाई की बुक 'द हाई कास्ट हिंदू वीमेन' का हिंदी अनुवाद है। तथाकथित रूप से कमजोर मानी जाने वाली नारी व उसके जीवन को समझने का यह बेहद ज़रूरी दस्तावेज़ है. किताब तीन चरणों में है। हिंदू स्त्री का बचपन, युवावस्था व वैवाहिक जीवन और वृद्धावस्था। इसमें पुरुषवादी ढांचे की जड़ों का खुलकर वर्णन किया है।
उन्होंने एक निम्न मानी जाने वाली दलित जाति के व्यक्ति से शादी की, जिस पर कई लोगों ने तकरार भी किया. पति की मृत्यु के बाद उन्होंने महादेव गोविंद रानाडे के साथ अपने वास्तविक जीवन की शुरुआत की. उस वक्त हिंदू धर्म ग्रंथो के अनुसार नारी पर हो रहे हर अत्याचार को जायज ठहराया जा रहा था. भारत के बाहर रहकर भी रमाबाई ने महिला जागरूकता के लिए बेजोड़ मेहनत की. उन पर धर्म परिवर्तन का आरोप भी लगता रहा, पर ब्रिटिश सरकार और बाद में भारत सरकार ने भी महिलाओं को लेकर किए गए उनके अथक प्रयासों की सराहना की.
ब्रिटिश सरकार ने भारत में शिक्षा के लिए हंटर कमीशन स्थापित किया,उसमें रमाबाई को शामिल किया गया। लड़कियों को मेडिकल शिक्षा देने के लिए चले डफरिन आंदोलन में भी रमाबाई की बड़ी भूमिका थी। बालिकाओं व विधवाओं के लिए शारदा सदन, मुक्ति सदन, कृपा सदन जैसी संस्थाएं भी उन्होंने बनवाई। इस प्रकार स्त्री को पददलित अवस्था से ऊपर उठाने में रमाबाई का बड़ा योगदान रहा है। भारत में नारीवादी प्रवक्ताओं में उनका सर्वोच्च स्थान है. उनके द्वारा किए गए संघर्ष का ही नतीजा निकला कि हिंदुस्तान में धीरे-धीरे नारी की स्थिति में उतरोत्तर सुधार होता चला गया.