आप 'राग दरबारी' से सहमत या असहमत हो सकते हैं लेकिन इसकी अनदेखी नहीं कर सकते. यह उपन्यासों का उपन्यास है. श्रीलाल शुक्ल इसके रचयिता हैं. यह हिंदी उपन्यास साहित्य की अब तक की सबसे प्रसिद्ध क्लासिकल किताब है. इसका अंग्रेजी सहित पन्द्रह भाषाओं में अनुवाद किया गया. इसी उपन्यास के आधार पर दूरदर्शन का एक धारावाहिक शो बहुत लोकप्रिय हुआ था. शुक्ल के नाम पर भारतीय डाक ने भी एक पोस्टेज स्टाम्प जारी की थी. और इसी उपन्यास के चलते उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला. साहित्यकारों का मानना है कि यह उपन्यास हर आयु वर्ग के लोगो की पसंद रहा है.
ये किताब 1968 में आई थी. आते ही तेज रफ़्तार से बिकने लगी. अब तक इसकी पांच लाख से ज़्यादा कॉपियां बिक चुकी हैं. अगर कोई व्यक्ति ये कहे कि मैंने अब तक यह किताब नही पढ़ी है तो भी दावा किया जा सकता है कि ये आपने पढ़ी है. आप इसे हर रोज पढ़ते हैं. अपने आस-पास. बस आप परख नही कर पाते. यह किताब हिंदी की टॉप पांच किताबों में से एक है. पढ़ते हुए एहसास होता रहेगा कि हम आज भी 'राग दरबारी' वाली दुनिया में जी रहे हैं.
इसके बारे में देश के प्रसिद्ध साहित्यकार और आलोचक पुरुषोत्तम अग्रवाल का कहना है कि- "मैं इस उपन्यास को पचास बार पढ़ चुका हूँ और पचास बार और पढ़ूंगा.
साहित्यकारों का मानना है कि हिंदी भाषा में राजनीति विषय पर गिने-चुने उपन्यास ही पढ़ने को मिलते हैं. खासकर आज़ादी के बाद. न लेखक की कलम चलती है और न ही प्रकाशक छापने को तैयार होता है. ये बात काफी हद तक सही भी है, क्योंकि जब इस विषय का साहित्य हम इंटरनेट पर सर्च करते हैं तो बहुत कम सामग्री हाथ लगती है. राजनीतिक चेतना जगाने वाले नॉवेल तो मिल जाएंगे पर मुख्यधारा की राजनीति का कथानक देखने-पढ़ने को नही मिलेगा. लेखक इस लफड़े में पड़ना ही नही चाहता. क्यूँ किसी से फालतू की राड़-झगड़ करनी. मग़र प्रेमचंद जी कहा करते थे कि 'साहित्य तो राजनीति के आगे चलने वाली मशाल है.' बहुत से साहित्य लेखक तो राजनीति का नाम सुनते ही चिढ़ जाते हैं.
आजकल के ज्यादातर कवियों का हाल तो लेखकों से भी दो कदम आगे का है. वे तो इश्क़, मोहब्बत, प्रेमी, प्रेमिका, चाँद, नूर, नज़रें, अदाओं के घेरे से बाहर ही नही निकलना चाहते. फेसबुक पर लाइव आ जाइये. पाठक अगले वीडियो का बारिश की तरह बेसब्री से इंतज़ार करेगा. पुरुष पाठक तो उसी में अपना वीर रस भी ढूंढ लेता है. ऐसे लेखक और कवि केवल अपना पाठक-वर्ग तैयार करने के चक्कर में लगे रहते हैं. कॉन्टेंट की कोई फ़िक्र नही होती.
यकीन मानिए जब आप इस किताब को पढ़ना शुरू करेंगे तो रखने का मन ही नही करेगा. अगले पन्ने को पलटने की उत्सुकता बनी रहेगी. लगभग हर पेज पर व्यंग्य पढ़ने को मिलेगा. मजेदार अंदाज में. हर प्रकार का रस. अगर आप भारतीय राजनीति, शिक्षा, सिस्टम और समाज को गहराई से परखना चाहते हैं तो मैं रिकमेंड करूंगा कि आप राग दरबारी जरूर पढ़ें. सब समझ में आता चलेगा. राज काज और ब्यूरोक्रेसी पर करारा व्यंग्य करती हुई बहुत ही गज़ब किताब है राग दरबारी. चार वर्षों की कठिन मेहनत ने देश की आबो-हवा को पहचाना और उसे किताब की शक्ल के रूप में तब्दील कर दिया. शुक्ल जी ने 1964 में इस पर काम करना शुरू किया था. खुद लेखक महोदय इस उपन्यास से खुश नही हुए, क्योंकि ये इतना अधिक प्रसिद्ध हो गया कि इसके चक्कर में लेखक की अन्य दूसरी किताबें दब गई. परिणाम इसी का है कि आज भी ये किताब लोगों के सर चढ़कर बोलती है.
इसे उस समय राजकमल प्रकाशन ने प्रकाशित किया था. उपन्यास के पचास साल पूरा होने पर राजकमल प्रकाशन समूह इसे एक नए कलेवर में लेकर आया. चित्रों सहित. इसी बात से इस उपन्यास की पॉपुलरटी का अंदाज़ा लग जाता है.
शुक्ल जी महान इसलिए भी हैं क्योंकि सिस्टम में रहते हुए इन्होंने सिस्टम और सत्ता पर खुलकर लिखा. वे राज्य लोक सेवा से होते हुए IAS तक पहुंचे. आमतौर पर सिस्टम में बैठे हुए लोग तो दूर, नेता लोग भी ऐसे उपन्यासों को पसंद नही करते. इसी कारण साहित्यकार इन विषयों पर लिखने से बचते हैं. अतः ऐसे उपन्यास विरले ही मिलते हैं.
इसकी 5-7 लाइनों को पढ़िए. ये बातें पचास साल पुरानी हैं. उसी उपन्यास की जिसे शुक्ल जी ने उस समय देखा ,परखा और अपने उपन्यास में उतार दिया. लेकिन ये बातें आज की भी बातें हैं. देखिए लेखक ने कैसे भिन्न-भिन्न विषयों पर कटाक्ष किया है-
वंशवाद की राजनीति पर-
" वे पैदाइशी नेता थे क्योंकि उनके बाप भी नेता थे."
शिक्षा व्यवस्था पर-
"आज की शिक्षा व्यवस्था सड़क पर पड़ी उस कुतिया की तरह है जिसे कोई भी दो लात मार सकता है."
धीमी न्याय व्यवस्था पर-
"अदालत में वादी और प्रतिवादी इस अफसोस को लेकर मर सकते हैं कि मुकदमे का फैसला सुनने के लिए अभी अगला जन्म तो पड़ा है."
रिश्वत पर-
"चोरी,डकैती, रिश्वत-अब तो सब एक हो गया है...पूरा साम्यवाद है!"
गैर कानूनी व्यापार पर-
" इस व्यापार में एक छोटी सी खराबी है कि यह कानून के खिलाफ पड़ता है। अब कानून मुझसे पूछकर तो बनाया नही."
नेताओं द्वारा लेक्चर देने पर-
"लेक्चर का मजा तो तब है जब सुनने वाले भी समझें कि यह बकवास कर रहा है और बोलने वाले भी समझें कि मैं बकवास कर रहा हूं."
गबन पर-
" हमारी यूनियन में गबन नही हुआ था. इसी कारण लोग हमें सन्देह की दृष्टि से देखते थे।अब तो हम कह सकते हैं कि हम सच्चे आदमी हैं।गबन हुआ है और हमने छुपाया नही."
खराब सड़क और भीड़ के माहौल पर-
"वहीं पर एक ट्रक खड़ा था। जिसे देखकर यकीन हो जाता था इसका जन्म सड़कों से बलात्कार करने के लिए हुआ है."
यह भी पढ़िए-
"आगे बैठा हुआ गाड़ीवान खींच-खींचकर गालियाँ दे रहा था। गालियों का मौलिक महत्व आवाज़ की ऊँचाई में है, इसीलिए गालियाँ और जवाबी गालियाँ एक- दूसरे को ऊँचाई पर काट रही थीं। लड़के नाटक का मज़ा ले रहे थे, साइंस पढ़ रहे थे."
"पूरा गाँव अब उसे बेईमान मुन्नू कहता था। वे इस नाम को उसी सरलता से स्वीकार कर चुके थे, जैसे हमने जे.बी.कृपलानी के लिए आचार्यजी, जे.एल .नेहरु के लिए पण्डितजी या एम.के. गांधी के लिए महात्माजी बतौर नाम स्वीकार कर लिया है. बेईमान मुन्नू ने यह नाम खुद कमाया था."
"देश मे इंजीनियरों और डॉक्टरों की कमी है. कारण यह है कि इस देश के निवासी परंपरा से कवि हैं. चीज को समझने से पहले वे उसपर मुग्ध होकर कविता कहते हैं. भखडा-नांगल बांध को देखकर वे कह सकते हैं,'अहा! अपना चमत्कार दिखाने के लिए,देखो, प्रभु ने फिर से भारत-भूमि को चुना है."
किताब को लिखने वाले इस दुनिया में नही हैं. लेकिन अपनी रचना के माध्यम से कहीं न कहीं आज भी वे भारतीय परिवेश में जिंदा हैं. इसको लिखे हुए आधी शताब्दी बीत चुकी है, लेकिन आज भी इसका महत्व, इसकी प्रासंगिकता तथा इसकी पॉपुलरटी उतनी ही है जितनी कि पचास बरस पहले थी. और यदि भारतीय समाज इसी तरह घिसड़ता हुआ चलता रहा तो कहना गलत नही होगा कि आगे भी रहेगी. अब आप सोचिए कि जो हालात उस दौर के समाज मे थे, ठीक वहीं हालात आज भी नहीं है क्या? ऊपरी चकाचौंद से तो लगेगा कि सब कुछ बदल चुका है, लेकिन थोड़ा गहराई में जाइयेगा तो पता चलेगा कि समाज, सिस्टम और सत्ता जैसे पहले थे आज भी वैसे ही हैं. तो सवाल बनता है पचास साल में बदल क्या गया ?
शिक्षा व्यवस्था पर किए गए व्यंग्य के बारे में सोचिए. मतलब ये सच पचास साल पहले का था. और आज की शिक्षा आपके सामने है ही। सरकार कैसे शिक्षा का बाजारीकरण कर रही है. कैसे फर्जी डिग्रियां बंट रही है. कैसे पेपर लीक हो रहे हैं. और किस प्रकार की पढ़ाई हो रही है. सब कुछ आपकी आंखों के सामने.
बदलाव को लेकर आप तर्क दे सकते हैं कि क्यों नही बदला समाज. आज जो फेसिलिटी हैं वे पहले कहाँ थी. पहले ऐसा सूचना तंत्र नही था,डिजिटल सिस्टम नही था. यकीनन नही था. मगर मैं बात पर्दे के पीछे छुपे उस सच की कर रहा हूं जो कभी सामने आता ही नही. समाज के उस प्रचलन की कर रहा हूं जिसमें सत्ता,सिस्टम और समाज सब मिले हुए हैं. ये सच पहले भी ऐसा ही था और आज भी ऐसा ही है. इसमें रत्ती भर भी फर्क नही आया है.और यहीं कड़वा सच है.
राजनीति में पार्टी और एंटी-पार्टी पर व्यंग्य करते हुए शुक्ल जी ने लिखा है, "प्रत्येक बड़े नेता का एक-एक विरोधी होता है. सभी ने स्वेच्छा से अपना-अपना विरोधी पकड़ रखा है. बेचारे नेतागण कितनी शालीनता से विरोधियों को झेल रहे हैं. विरोधीगण अपनी बात बकते रहते हैं और नेतागण चुपचाप अपनी चाल चलते रहते हैं."
ऐसा भी नही है कि इस तरह के लेखक आज के समय में नही हैं. हैं. और उन्हें आगे आकर लिखना भी चाहिए. सत्ता पर और सिस्टम पर. शुक्ल की तरह. क्योंकि साहित्य समाज का दर्पण है. शुक्ल तो शुक्ल ही थे. मैंने अब तक उनके तीन उपन्यास पढ़े हैं. पढ़कर विश्वास ही नही होता कि जो इंसान तीस साल तक सिविल सेवा में रहा, और सिस्टम का सच ही समाज के सामने लाकर खड़ा कर दिया. हर उपन्यास में राजनीतिक पतन, सिस्टम और सत्ता का एक से बढ़कर एक सच. यकीनन बहुत महान व्यक्तित्व.
श्रीलाल शुक्ल की पुण्यतिथि पर उनको नमन करते हुए और 'राग दरबारी' को पढ़ने के बाद इसके सबसे अहम किरदार वैद्यजी के परिचय वाली तर्ज पर कम-से-कम मैं तो इतना ही कहूंगा -
राग दरबारी का लोगों के दिलों पर राज था, है और रहेगा.