संघ और भाजपा के बीच तकरार !

गांधी जयंती पर 2 अक्टूबर को राम माधव का एक लेख छपता है. लेख किसमें छपता है. द इंडियन एक्सप्रेस में. राम माधव गांधी जी की तरह एक जंत्र देते नजर आए. सरकार में और मीडिया में इसकी जितनी चर्चा होनी चाहिए थी नही हुई. इस पर बहस न होना, या न होने देना एक राजनीति हो सकती है! मीडिया के एकाध मंच पर वरिष्ठ व जिम्मेदार पत्रकारों ने कुछ बहस जरूर की. इन जानकर लोगों का मानना है कि इस लेख को इंडियन एक्सप्रेस के अलावा कोई नही छाप सकता था. 



यकीन जान लीजिए अगर निकट भविष्य में सरकार या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में कोई बड़ा फ़ेरबदल होता है तो उसमें इस लेख की अहम भूमिका रहेगी! क्योंकि राम माधव यूँ ही महज़ किसी व्यक्ति का नाम भर नही है. वो नाम के परे भी बहुत कुछ हैं. अमेरिका जैसे देश में संघ का बड़े पैमाने पर प्रचार करने में उन्हीं का योगदान है. न सिर्फ़ संघ बल्कि नरेंद्र मोदी का पीएम बनने के बाद अमेरिका में नाम चमकाने वाला शख़्स यदि कोई है तो वो राम माधव ही है. मेडिसन स्क्वेयर गार्डेन में पीएम मोदी का विशाल भव्य स्वागत आपको याद होगा. उसके प्रबंधन के पीछे चट्टान की तरह राम माधव ही खड़े थे. पूर्वोत्तर और जम्मू कश्मीर (भाजपा-पीडीपी) में सरकार बनवाने में उनकी बड़ी भूमिका रही है. 


राम माधव संघ का एक बहुत बड़ा चेहरा है. बीस सालों से वे संघ द्वारा निकाली जाने वाली पत्रिकाओं में बतौर पत्रकार लिखते रहे हैं. पिछले दिनों जब उन्हें पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव पद से हटाया गया तब एक ख़बर उड़ती हुई चली कि माधव देश के अगले शिक्षा मंत्री हो सकते हैं! लगभग 15 किताबें भी लिख चुके हैं. फ़िल्म सेंसर बोर्ड में भी काम कर चुके हैं. भारत-चीन मसलों पर गहरी पकड़ रखते हैं. इस लेख में बातों ही बातों में उन्होंने लिखा नही है,चाबुक चलाया है. उनके लिखे का बहुत कुछ मतलब है. जानकर प्रबुद्ध लोगों के लिए यह लेख हैरानी बन गया कि आखिर राम माधव ने भी ऐसा लिखा है? और ये सब लिखने की जरूरत क्यों आन पड़ी? अचरज होना स्वाभाविक भी था क्योंकि उन्होंने गांधी जी के बहाने सरकार विशेषकर पीएमओ की तरफ ईशारा करते हुए कहा है कि हुज़ूर! या तो चेत जाइये वरना जनता(संघ) सब देख रही है. इस इशारे में बहुत कुछ छिपा है,जो देर-सबेर ही सही पर बाहर जरूर आएगा. इसे पढ़ते ही आपको एहसास हो जाएगा कि संघ और बीजेपी में हाल-फिलहाल सब कुछ ठीक-ठाक नही चल रहा है. कोई बड़ा बदलाव भी हो सकता है. नही भी होगा तो अंदरूनी खींचतान तो जरूर होगी. 


जब मीडिया में कहीं-कहीं इस पर चर्चा हुई तो मैंने भी इसे डाऊनलोड करके पढ़ा. और एक बार नही कई बार पढा. हालांकि अंग्रेजी मेरी बहुत कमजोर है, इसलिए लेख को इंटरनेट पर हिंदी में ट्रांसलेट करके पढा. बड़ी ही टैक्टिकल भाषा का प्रयोग हुआ है. गौर से पढ़ने पर समझ आएगा. राम माधव ने एक बार पार्टी नेताओं को संबोधित करते हुए कहा भी था कि 2024 के लिए पार्टी मोदी के भरोसे न बैठे. उनके इस लेख के कुछ बिंदु हैं. 


उसके मायने क्या हो सकते हैं? मायने समझना इसलिए भी जरूरी हो जाता है क्योंकि इस वक्त देश के एक बड़े राज्य में चुनाव हो रहे हैं. राम माधव की बातें वहाँ कितना असर छोड़ेंगी ये तो नही कह सकते मगर हाँ, संघ और बीजेपी दोनों के लिए एक नए डिस्कोर्स को जन्म जरूर दे सकती हैं! लेकिन इतना तय हो सकता है यदि बिहार भाजपा के हाथ से निकल गया तब संघ राम माधव के कहे को बड़ी गंभीरता से लेगा. आप यूँ कह लीजिए कि लेख में गांधी तो एक बहाना था, असली मक़सद तो पीएमओ को समझाना था. 


राम माधव ने हिटलर और स्टालिन का उदाहरण देते हुए लिखा है कि 'तानाशाह हमेशा क्रूर शक्ति, कमजोर मीडिया और निरंतर प्रचार के सहारे ही आगे बढ़ता है. अपने को "यस मैन" से घिरा देखकर वह खुश रहता है.' समझने वाले समझ गए होंगे कि ये ईशारा किसकी तरफ है. सबको दिख रहा है आज मीडिया पूरी तरह से किसके चरणों में नतमस्तक है. कौन रैलियों और अपने संबोधन के माध्यम से निरंतर प्रचार करता है. कैबिनेट और मंत्री परिषद के नेता किसकी बात काटने से डर रहे हैं. सब हाँ में हाँ मिला रहे हैं. सभी यस मैन हैं. 


राम माधव ने "आलोचना" का मुद्दा भी उठाया है. उन्होंने लिखा है कि 'गांधी जी अपने आलोचकों का सम्मान करते थे, जबकि तानाशाह को ये सब पसंद नही होता.' 'आलोचना' इतना बड़ा इशू बन गया था कि माननीय सुप्रीम कोर्ट के जज तक को ये कहना पड़ा कि सरकार की आलोचना की जा सकती है, इसमें कोई बुराई नही. हम सभी गलतियां करते हैं. सरकार से असहमति कोई राष्ट विरोधी हरकत नही है. सरकार आलोचना को सहना सीखे. गांधी के असहयोग आंदोलन में भी असहमति प्रमुख थी. 


आगे राम माधव लिख रहे हैं कि 'हिटलर ने पार्टी को खत्म करके विशेषज्ञों को बहुत महत्व दिया.' पिछले साल केंद्र सरकार ने लेटरल एंट्री के तहत निजी क्षेत्र के 9 विशेषज्ञों को केंद्र सरकार के विभिन्न विभागों में संयुक्त सचिव के पदों पर नियुक्त किया है. क्या सरकार पार्टी के दम पर सत्ता में आई थी या एक्सपर्ट्स के? राम माधव के लिखने का यही मतलब है कि जो हिटलर राजनीतिक पार्टी की बदौलत ही सत्ता में आया,और आते ही उसे समाप्त कर विशेषज्ञों पर भरोसा जता लिया. हिटलर और स्टालिन दोनों ने ही अपने रास्ते में रोड़ा बनने वाले नेताओं का इतिहास से नामोनिशान ही मिटा दिया. 


आप समझ सकते हैं की घर बैठने वाले किन दो-तीन मार्गदर्शक नेताओं की ओर इशारा हो रहा है! उनके लिए ये सब संभव हुआ आज्ञाकारी मीडिया और स्टेट पॉवर के चलते. तभी राम माधव लिख रहे हैं कि 'गांधी जी ऐसी तानाशाही के सख़्त खिलाफ थे.' उन्होंने 20वीं सदी के अंतिम तानाशाही शासक सोवियत लीडर की सत्ता ढ़हने का भी ज़िक्र किया है. तानाशाही किसी भी स्तर पर हो सकती है. पार्टी में रहकर, संगठन में रहकर तथा सत्ता में रहकर. संघ के लिए पहली और दूसरी तानाशाही परेशानी का सबब बनती रही है. 


राम माधव गांधी जी की निर्भीक सच्चाई के ज़रिए बता रहे हैं कि जहां मुस्लमान हिंदुओं पर अत्याचार कर रहे थे गांधी वहां भी गए और जहां हिन्दू मुसलमानों पर कर रहे थे वहां भी गए. नोआखली और पटना का उदाहरण उन्होंने दिया है. मतलब हिन्दू-मुस्लमान में से किसी एक के प्रति अधिक झुकाव करना अच्छी बात नही है. वैसे आडवाणी ने जब कुछ इसी तरह की बातें कही थी तब संघ उनसे नाराज हो गया था. तभी से पार्टी में आडवाणी के दिन लदने शुरू हो गए थे. गांधी और दीन दयाल उपाध्याय का रामराज्य इसकी अनुमति नही देता. 


गांधी की 'समानता' के ज़रिए संभव है राम माधव वर्तमान में अमीर व गरीब के बीच चौड़ी होती खाई पर चिंता जता रहे हों! क्योंकि एक तरफ गिने चुने उद्योगपति हैं जिनकी आय विपरीत परिस्थितियों में भी बढ़ रही है दूसरी तरफ नब्बे प्रतिशत से ज्यादा आम लोग हैं जो लगातार गरीबी की मार झेल रहे हैं. कोरोना काल में भी बढ़ने वालों की आय खूब बढ़ी है. वे लिख रहे हैं कि 'गांधी का कोर आईडिया स्वतंत्रता था और आज वही स्वतंत्रता खतरे में है. लोगों की स्वतंत्रता के लिए फ्री मीडिया होना जरूरी है.' यानी वे वैल्यू-बेस्ड पीपुल ओरियंटिड जर्नलिज़्म की जरूरत पर जोर दे रहे हैं. गांधी की स्वच्छता और स्वदेशी की मुहिम के आसरे नाम चमकाने वाले नेताओं की तरफ भी राम माधव इशारा करते नज़र आ रहे हैं. इसलिए उनकी कही हर बात के मायने हैं. 


आप देखिए स्वदेशी और कृषि की नीतियों के चलते संघ बीजेपी से नाराज चल रहा है. हाल ही में आये किसान कानूनों का संघ ने खुलकर विरोध नही किया तो समर्थन भी नही किया है. क्या इस लेख में संघ की सरकार को कोई चेतावनी झलक रही है? क्या संघ राम माधव को फेस बनाकर खुद के शीर्ष नेतृत्व को साफ दिखाना चाहता है? या किसी बड़े फ़ेरबदल की ओर ध्यान दिलाने की कोशिश हो रही है? क्या संघ ये कहना चाहता है कि सरकार के शीर्ष नेतृत्व द्वारा अख्तियार होने वाला वन वे कम्युनिकेशन का एजेंडा अब नही चलेगा? इन सब बातों का जवाब तो वक्त या फिर बिहार का चुनाव परिणाम ही देगा.