नेहरू : बाल दिवस के बहाने

आज भारतीय इतिहास के 'लोक देव' नेहरू को याद करने का दिन है. बाल दिवस के बहाने याद करने का दिन है.  उनको लोक देव से किसी और ने नही बल्कि आचार्य विनोबा भावे ने नवाज़ा था. स्वरूप रानी मोतीलाल की दूसरी पत्नी थी. उन्हीं की गोद का जवाहर भारत का जवाहर बना. गांधी जी ने अपने इस शिष्य की खूबी 1929 में ही भांप ली थी. 

बकौल गांधी जी- "बहादुरी और देशप्रेम में उनसे आगे कोई नही. कुछ लोग इन्हें अधीर कहते हैं, पर ये तो उनका विशिष्ट गुण है. इनमें एक वीर योद्धा की तेजी है और कुशल राजनीतिज्ञ का विवेक भी." 



नेहरू राजनीतिज्ञ जरूर थे पर हर प्रकार के मैक्यावलियन से दूर. गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर ने उनकी नेतागिरी को महज़ एक पंक्ति मे समेट दिया. 

उन्होंने कहा कि- "नेहरू ने राजनीति में छल-कपट और आत्मप्रवंचना को हटाकर शुद्ध आचरण के आदर्श निर्मित किए." 


गांधी जी के असहयोग आंदोलन में पिता व पुत्र दोनों ने भाग लिया और दोनों को छः-छः माह की जेल हुई. ये दिन नेहरू के जीवन में नए आदर्श व विश्वास लेकर आए. जेल उनके लिए घर के समान थी. गांधी जी अगले आंदोलन में भी उन्हें छः महीने की जेल हुई. जब बाहर आए तो किसान सम्मेलनों में शरीक होने के चलते फिर से दो साल के लिए जेल में डाल दिए गए. ये निश्चय उन्होंने दस साल पहले ही कर लिया था. 1919 में नेहरू पहली बार गांव-गांव घूमे और देश के भूखे नंगे किसानों को देखा तो वहीं से उनके लिए सेवा करने का मन बना लिया. 


प्रतापगढ़ के किसानों के आग्रह पर नेहरू उनसे मिलने गांव गए तो देखते ही उन्हें खुद के सुखमयी जीवन पर लज्जा आई और गरीब किसानों के हालात पर दुख भी हुआ. रायबरेली के प्रदर्शन कर रहे किसानों पर जब अंग्रेजी हुक़ूमत ने गोलियां चलाई तो नेहरू तुरंत उनकी मदद के लिए दौड़े और उनके लिए धन भी इकट्ठा किया. अवध में सरकार ने किसानों के खिलाफ एक कानून पास किया तो वहां के किसानों ने नेहरू से गुहार लगाई. नेहरू ने किसानों के साथ मिलकर उसका विरोध किया तो सरकार को वह एक्ट वापिस लेना पड़ा. बताते हैं पं० नेहरू की यह पहली विजय थी. 


एक किस्सा भी बताया जाता है कि भाखड़ा बांध से सिंचाई योजना का उद्घाटन होना था. नेहरूजी को योजना के व्यवस्थापकों ने चांदी का फावड़ा उद्घाटन करने के लिए पकड़ाया. इस पर नेहरू झुंझला गये. उन्होंने पास में पड़ा लोहे का फावड़ा उठाया और उसे ज़मीन पर चलाते हुए कहा, 'भारत का किसान क्या चांदी के फावड़े से काम करता है.' ऐसे ही चने के खेत का एक किस्सा भी मशहूर है. आपको पढ़कर अजीब लग रहा होगा कि वैभव और ऐशोआराम की जिंदगी बिताने वाला ये शख़्स क्या किसानों के प्रति नरमदिल भी था? यकीनन था. संकीर्ण नही व्यापक दिमाग से सोचिए. 


तकरीबन तीस साल तक नेहरू गांधी जी के सानिध्य में रहे. ज़ाहिर है उनकी नैतिकता और धार्मिक विचारों का उन पर गहरा प्रभाव पड़ा. गांधी जी की प्रेरणा ने ही उनमें गीता के प्रति रुचि जगाई. परिणाम हुआ कि नेहरू ने भागवद्गीता के कर्म योग के सिद्धांत को अपने जीवन में उतार लिया. बचपन के अपने शिक्षक मिस्टर ब्रुक्स के प्रभाव के चलते नेहरू ने वेद व उपनिषदों का अध्ययन भी कर लिया था. उन्होंने खुद भी कहा था कि 'इसमें कोई शक नही कि मिस्टर फर्डिनेण्ड टी.ब्रुक्स की संगत का मुझ पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा है,जिसके लिए मैं उनका ऋणी हूँ.' नेहरू इंसान की धार्मिक आस्था को एक मौलिक जरूरत समझते थे. वे बुद्ध से भी काफी हद तक प्रेरित थे. 


निस्संदेह व्यवहार में वे एक आध्यात्मिक प्रवर्त्ति के इंसान थे पर किसी एक धर्म विशेष में उनका कोई विश्वास नही था. उनकी सोच धर्मनिरपेक्ष थी. रूढ़ियों व आडम्बरों से दूर सत्य को अनुभव के माध्यम से प्राप्त करने में ही उनकी अटूट श्रद्धा थी. मार्क्स की तरह उन्होंने भौतिक पदार्थ को भी कभी अंतिम सत्य नही माना. यानी हम ये कह सकते हैं कि नेहरू न पूर्ण नास्तिक थे, न पूर्ण आध्यात्मिक और न ही पूर्ण भौतिकवादी. 


टैगोर के समन्वयात्मक दर्शन को तो नेहरू ने दिल से आत्मसात कर लिया था. पिता के पुत्री(इंदिरा) के नाम पत्रों में भी नेहरू ने रामायण व महाभारत विषय पर जिक्र करते हुए एक पत्र में लिखा- 

"यह बड़े ऊँचे दरजे की किताबें हैं,जिसके गहरे विचारों और सुंदर कथाओं को पढ़ कर आदमी दंग रह जाता है. सबसे बढ़ कर हम सबको इसलिए इनसे प्रेम है कि इनमें वह अमूल्य ग्रन्थ रत्न है जिसे भगवद्गीता कहते हैं. ये किताबें कई हजार बरस पहले लिखी गई थीं. जिन लोगों ने ऐसी-ऐसी किताबें लिखीं वे जरूर बहुत बड़े आदमी थे. इतने दिन गुजर जाने पर भी ये पुस्तकें अब तक जिंदा हैं." 

अध्यात्म उनके लिए नैतिकता और मानसिकता का परिचायक था. प्रकृति की विविधता और परिपूर्णता उनको हर पल स्पंदित करती थी. उनका मानव प्रेम ही प्रकृति प्रेम का सहगामी था. इसी प्रेम ने उनके अंदर अंत तक मानवीय संवेदनाएं जिंदा रखी. 


साहित्यकारों व बुद्धिजीवियों से नेहरू की घनिष्ठ मित्रता थी. फिराक गोरखपुरी, जोश मलीहाबादी और निराला से उनकी दोस्ती बहुत प्रसिद्ध रही है. प्रधानमंत्री आवास तीन मूर्ति भवन में अक्सर हिंदी व उर्दू के कवियों की सभाएं होती रहती थी. दुनिया भी उनकी साहित्यिक शैली की कायल रही है. नेहरू की मृत्यु पर एक ब्रिटिश विद्वान ने कहा था कि 'हमने आज एक साहित्यकार मित्र को खो दिया है.' 


राजनीतिक चिंतन के क्षेत्र में यूँ तो नेहरू ने अनेकों सिद्धान्त स्थापित किए. पर उनके द्वारा प्रस्तुत 'लोकतांत्रिक समाजवाद' का अपना अलग ही स्थान है और यह सभी सिद्धान्तों में सबसे महत्वपूर्ण है. भारतीय लोकतंत्र और नेहरू को प्रायः पर्यायवाची माना जाता है. उन्हीं के शब्दों में- 

"आर्थिक आजादी के बगैर राजनीतिक आजादी एक धोखा है. मुझे उम्मीद है कि एक वक्त आएगा जब राजनीतिक रूप से आजाद हिंदुस्तान अपने आर्थिक साधनों पर भी नियंत्रण रखेगा और कुछ लोगों के फायदे के लिए किसी को भी उनका दुरुपयोग नही करने देगा." 


अपनी पुस्तक 'विश्व इतिहास की झलक' में उन्होंने पूंजीवाद को खूब आड़े हाथों लिया. अपनी 'आत्मकथा' में रूस के हिंसक साम्यवाद की आलोचना की 'डिस्कवरी ऑफ इंडिया' में मार्क्स व लेनिन के खुद पर प्रभावों को स्वीकार तो किया पर अपने सभी प्रश्नों के उत्तर उनमें नही खोज पाए. स्वतंत्रता और लोकतंत्र दोनों को मर्यादित करने के उद्देश्य से ही उन्होंने लोकतांत्रिक समाजवाद का विचार प्रस्तुत किया. नेहरु ने स्पष्ट कह दिया था कि एक भूखे नंगे व्यक्ति के लिए कोरा मताधिकार कोई महत्त्व नही रखता. जब समाज में ऊंच नीच हो और मुठ्ठी भर शिक्षित लोग निरक्षर जनता को अपने पैरों तले दबा कर रखे तो ऐसे देश में लोकतंत्र का कोई मतलब रह नही जाता. सहिष्णुता व परस्पर सद्भावना इसकी पहली शर्त हैं.  लोकतंत्र में परिवर्तन विचार विमर्श व संवाद द्वारा किए जाते हैं, जबरदस्ती  व हिंसा द्वारा नही. 


26 अगस्त 1954 को नेहरू ने कांग्रेस समितियों के सभी अध्यक्षों को पत्र लिखकर कहा कि,"समस्या चाहे कितनी भी जटिल क्यों न हो उनका समाधान हमें शांतिपूर्ण ढंग से,वार्ताओं,मेलमिलाप, बातचीत व समझा-बुझा कर ही करना है." लोकतंत्र एक जीवन पद्यति है जिसमें धन का समान वितरण किया जाना बहुत जरूरी है. आगे चलकर 'लोकतांत्रिक समाजवाद' के इन्हीं विचारों के आधार पर संविधान का ड्राफ्ट तैयार किया गया,जिसकी परिणति मौलिक अधिकार व नीति निदेशक तत्त्वों में जाकर हुई. वे मार्क्स के समाजवाद की मूल धारणा में तो विश्वास रखते थे,पर मार्क्स-भक्त नही थे. आचार्य नरेंद्र देव ने नेहरू को इसी लिए 'मार्क्स से प्रभावित समाजवादी' बताया था. लोकतंत्र को परिभाषित करते हुए नेहरू ने एक जगह लिखा था- 

Democracy is not only political, not only economic but something of mind... 


दुनिया में नेहरू की एक विश्व शांति के मसीहा के रूप में पहचान है. उनकी राष्ट्रीयता भी अंतर्राष्ट्रीयता पर आधारित थी. ऐसे राष्ट्रवाद को उन्होंने कोई तवज्जो नही दी जो चरम सीमा पर जाकर अन्तर्राष्ट्रीयवाद का दुश्मन बन जाए. उनका यह विचार गुट निरपेक्षता से जुड़ा हुआ है,जिसने उस वक्त बहुत से गरीब देशों को युद्ध की तरफ जाने से बचा लिया. इस अद्भुत काम के लिए पूरी दुनिया सदैव नेहरू की ऋणी रहेगी. इस मामले में नेहरू संकीर्ण नही व्यापक पुरुष थे. दुनिया के सभी मानवों के प्रति प्रेम करने की उनकी सोच कितनी विस्तृत थी, यह उनके एक भाषण से पता चलती है. 1942 के अपने मुंबई भाषण में उन्होंने कहा- 

"मैं सारे भारतीयों से अपील करता हूँ कि वे अपने ऊंचे मुद्दों व लक्ष्यों को न भूलें. वे महज़ भारत के हितों के लिए नही लड़ रहे हैं,बल्कि चीन व रूस समेत दुनिया भर के सब देशों के लिए लड़ रहे हैं."  


यकीनन ऐसा शांतिप्रिय नेता दुनिया को कभी कभी ही मिलता है. हिटलर व मुसोलिनी ने नेहरू को अलग-अलग मिलने के लिए आमंत्रित किया. पर नाजीवाद व फासीवाद के नेहरू सख़्त खिलाफ थे तो तुरंत मिलने से इनकार कर दिया. नेहरु ने खुद को कभी कम्युनिस्ट नही माना. 


जब नेहरू का जन्मदिन हो और बच्चों का जिक्र न हो, ऐसा हो ही नही सकता. उन्होंने अपना जन्मदिवस बच्चों को ही समर्पित कर दिया था. 

लेकिन आज उनको लेकर बहुत ही अभद्र किस्म की झूठी कहानियां रची जा रही हैं. आप क्या चाहेंगे, हमारी औलादें नेहरू को 'चाचा नेहरू' के रूप में पढ़ें या 'अय्यास नेहरू' के रूप में? ये बात सही है कि उनसे कुछ गलतियां हुई. किससे नही होती गलती? सबसे होती हैं. वो भी इंसान थे. हमारी तरह. फिर उनके कंधों पर जिम्मेदारी भी तो बहुत बड़ी थी. नई नई आज़ादी मिली थी। समस्याओं का पहाड़ लगा हुआ था. सभी वर्गों के बीच तालमेल और संतुलन भी बनाना था. नेहरू 17 साल तक पीएम रहे. इन 17 सालों में पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान ने 7 पीएम बदले. लेकिन हमारे यहां नेहरू संपूर्ण देश को एकता में पिरोए हुए निरन्तर आगे बढ़े. ये कोई आसान काम नही था. 


आज की सरकारों की कोई योजना नेहरू को दोष दिए बगैर लागू ही नही होती. झूठ का कोई आधार नही होता. ये सत्यमेव जयते का देश है. ये सत्य के पुजारी गांधी का देश है. आलोचनाएं करिए बुराई भी करिए पर अच्छे तरीके से करिए. सभ्य नागरिक बनिए. यहीं हमारी संस्कृति है. हमारे पूर्वज सभ्य थे. उनकी सभ्यता महान थी.