बिहार को नई सरकार मुबारक़

बिहार में नई सरकार बन गई है. जिन दो नेताओं को भाजपा ने उपमुख्यमंत्री बनाया है,बड़ी ही गहरी रणनीति और दूरदर्शिता से काम लिया गया लगता है. इससे बिहार भाजपा के हित सधे वो तो एक अलग बात है. एक दूसरा पहलू और भी है. क्योंकि अब बंगाल में भी चुनाव है. शायद इसी को ध्यान में रखकर यह फैसला लिया गया है. उपमुख्यमंत्री तारकिशोर कटिहार से हैं. और कटिहार बंगाल के बॉर्डर से बिल्कुल सटा हुआ है. भाजपा उन्हें बंगाल चुनाव में स्टार प्रचारक के तौर पर जरूर उतारेगी. दूसरी उपमुख्यमंत्री रेणु देवी हैं. चूंकि ये एक महिला हैं तो ममता बैनर्जी के सामने चुनाव प्रचार के लिए भाजपा ने एक अच्छा विकल्प प्रस्तुत कर दिया. 



पूरे बिहार चुनाव में अमित शाह ने दूरी बनाए रखी. क्योंकि 2015 के पिछले बिहार चुनाव की हार के लिए सीधा-सीधा अमित शाह को जिम्मेदार माना गया था. इसलिए पार्टी ने इस बार उन्हें बिहार चुनाव प्रचार से दूर रखा. और ये रणनीति कारगर भी साबित हुई. पर लोकसभा चुनाव में अमित शाह बंगाल में अपना जलवा दिखा चुके हैं. 


मीडिया में भले ही कुछ चलता हो पर भाजपा बिहार में सुशील मोदी को नजरअंदाज करके नही चल सकती. चूंकि नीतीश खुद अपने अंतिम चुनाव की बात कह चुके हैं,इसलिए अगली बार जब जदयू का दायर सिमटता जाएगा तब सुशील मोदी भाजपा के काम आएगा. यह भी सच है कि नीतीश कोई जननेता नही है,उनकी केवल एक छवि है. उन्होंने हर बार इसी छवि को भुनाने की ही कोशिश की है. जब ये छवि धूमिल होनी शुरू होगी तब भाजपा के यहीं वरिष्ठ नेता उभर कर निकलेंगे. जिस विचारधारा(हिंदुत्व) की समर्थक भाजपा मानी जाती है उसकी तुलना में बिहार का वर्तमान मंत्रिमंडल कहीं नही टिक रहा. परन्तु भाजपा परिस्थितियों के मुताबिक़ कदम उठा रही है. जब वो बिहार में अकेली पूर्ण बहुमत में आ जायेगी तब भाजपा ये उम्मीद भी पूरी कर लेगी. इसी लिए बिहार में बड़ा ही संतुलित मंत्रिमंडल बनाया गया है. यहीं भाजपा की खूबी है कि वह अपने युवा और वरिष्ठ नेताओं को अच्छे से यूज करना जानती है,जबकि कांग्रेस हर बार यहीं पर धोखा खा रही है. 


कांग्रेस को पता था कि बिहार की महिला वोटर नीतीश के साथ हैं. बिहार में कांग्रेस के पास मीरा कुमारी जैसी वरिष्ठ महिला नेता थी. पर उनका कोई सहारा नही लिया गया. महिला होने के नाते प्रियंका गांधी भी बिहार के मैदान में नही उतरी. कांग्रेस का कोई बड़ा मुख्यमंत्री भी बिहार में प्रचार तक नही करने गया. अब क्या किया जाए बिहार कांग्रेस की कमान ही ऐसे लोगों के हाथों में थी जो अपने राज्यों में जमानत जब्त कराए बैठे हैं. बिहार कांग्रेस के विधायक बिकने के लिए शायद तैयार बैठे थे पर किसी ने मोल ही नही लगाया, क्योंकि भाजपा को अभी इसकी जरूरत नही पड़ी है. जब साहनी और मांझी जैसे नेता ना-नुकर करेंगे तब कांग्रेसी विधायको में बिकने के लिए भगदड़ मच सकती है. 


विधानसभा में कई ऐसे मौके आएंगे जब जदयू और भाजपा किसी बिल को लेकर आमने-सामने हो सकते हैं. ऐसे में तेजस्वी यादव को राजनीतिक व सामाजिक समझ का परिचय देना चाहिए. नीतीश और लालू एक ही पृष्ठभूमि से निकले नेता हैं. सामाजिक न्याय के मुद्दे पर अपनी सीटों की धौंस दिखाते हुए भाजपा नीतीश पर हावी रहने की कोशिश करेगी. तब राजद चाहे तो बराबरी और न्याय के मुद्दे पर नीतीश के हक में बोल सकती है या समर्थन कर सकती है. इसका तेजस्वी को नुकसान नही बल्कि अगले चुनाव में फायदा मिल सकता है. फिलहाल के लिए तो राजद को पार्टी की बजाए बिहार हित ऊपर रखना चाहिए. 


बिहार की नई सरकार को खूब बधाई. मजबूत संगठन और कारगर रणनीति के आधार पर बधाई की हक़दार एनडीए है. जमीनी मेहनत और दमदार प्रचार की बदौलत बधाई के पात्र बिहार के भविष्य तेजस्वी यादव हैं. कांग्रेस को बधाई किस वजह से दें. फिलहाल तो कांग्रेस ये कहकर हार का सब्र कर रही है कि साहब हम ही क्यों जदयू का प्रदर्शन भी तो पिछले चुनाव के मुकाबले घटा है. माने लोगों का ग़म देखा तो मैं अपना ग़म भूल गया. कांग्रेस की यही स्थिति है.