साल 1962 का 18 नवंबर. दिन रविवार. सुबह के तकरीबन साढ़े तीन बजने को थे. ठंड रोज के मुकाबले कुछ ज्यादा ही कहर ढ़ा रही थी. शून्य डिग्री से भी कम तापमान की सर्दी अदम्य साहस से भरे हुए जवानों के खौलते हुए लहू की गर्मी के सामने पिघलती चली जा रही थी. उस सुबह सरहद पर सिर्फ़ कामचलाऊ कपड़ों और हथियारों के सहारे भारतीय जवान अपने खून से शौर्य और पराक्रम की सदैव अमर रहने वाली गौरव गाथा अपने प्यारे वतन को समर्पित कर रहे थे.
जी. बात हो रही है रेजांगला के युद्ध की. यह लड़ाई दुनिया की कुछ गिनी चुनी बड़ी लड़ाइयों में शुमार है. चीनी सेना के भारतीय रेंज में घुसने की सूचना पाते ही हमारे सैनिकों ने तुरंत मोर्चा संभाला. 120 भारतीय सैनिकों में जिंदा बचे कैप्टन रामचन्द्र यादव के मुताबिक चार-पांच चीनी सैनिक तो उसी समय ढ़ेर कर दिए गए. भारतीय सेना का नेतृत्व कर रहे मेजर शैतान सिंह ने अपने जवानों का हौंसला बढ़ाते हुए कहा "जिस समय का हमें इंतजार था वो आ पहुंचा है,और जैसे ही चीन हमारी फायरिंग रेंज में आए वैसे ही उस पर तुरंत हमला बोल दिया जाए."
'द ब्रेव' किताब की लेखिका और सैनिक इतिहासकार रचना बिष्ट रावत बताती हैं, "उनका पहला हमला हमने नाकामयाब कर दिया था. ढलान के इधर-उधर चीनियों की लाशें पड़ी हुई थीं जो उन्हें ऊपर से दिखाई दे रही थीं. लेकिन फिर चीनियों ने दूसरे हमले में मोर्टर फ़ायरिंग शुरू कर दी. अब भी मेजर शैतान सिंह अपने जवानों का हौंसला निरतंर बढ़ाते जा रहे थे. चूंकि उस वक़्त भारतीय सेना के पास आधुनिक हथियार नही थे. इसके बाद चीन की तरफ से तीसरा हमला बोला गया और सब कुछ ख़त्म हो गया. हर तरफ़ मौत और तबाही का मंज़र था."
रामचंद्र यादव याद करते हैं, "मेजर साब ने मुझसे कहा रामचंद्र मेरे पेट में बहुत दर्द हो रहा है. मेरी बेल्ट खोल दो. मैंने उनकी कमीज़ में हाथ डाला. उनकी सारी आंतें बाहर आ गई थीं. मैंने उनकी बेल्ट नहीं खोली, क्योंकि अगर मैं ऐसा करता तो सब कुछ बाहर आ जाता. इस बीच लगातार फ़ायरिंग हो रही थी. बेहोश हो गए मेजर शैतान सिंह को फिर होश आया और उन्होंने टूटती सांसों से कहा मेरा एक कहना मान लो. तुम बटालियन में चले जाओ और सब को बताओ कि कंपनी इस तरह लड़ी है. मैं यहीं मरना चाहता हूँ. मैं मामूली ज़ख़्मी था और पूरी तरह से होश में था. लेकिन मेरे दिमाग़ में हरफूल की वो बात दौड़ रही थी कि मेजर साब की लाश चीनियों के हाथ नहीं पड़नी चाहिए. मैंने उनको ज़ोर से अपनी बाहों में लिया और उनके साथ एक खड्डे में लुढ़क गया. फिर मैं उन्हें अपनी पीठ पर लाद कर क़रीब 800 मीटर तक चला. फिर एक बड़े पत्थर के पास मैंने मेजर शैतान सिंह को लिटा दिया. ठीक सवा आठ बजे मेजर साब के प्राण निकल गए."
लड़ाई खत्म होते ही उस क्षेत्र में भारी बर्फबारी हुई. इसलिए उसे नो-एंट्री जोन घोषित कर दिया गया. महीनों बाद जब बर्फ़ कुछ कम हुई तो उसमें से भारत माँ के इन वीर सपूतों को निकाला गया. भले ही उनके मृत शरीर बर्फ़ के नीचे दबे पड़े थे पर हाथों में बंदूक तब भी सीधी तनी हुई थी. रचना बिष्ट रावत कहती हैं "जब मैंने उस लड़ाई में मरने वाले सैनिकों के नाम मांगे, तो उन से मेरे लैप-टॉप की तीन शीट्स भर गईं. ये सोच कर मेरी आँखें भर आईं कि कितने लोगों ने इस लड़ाई में अपनी ज़िंदगी की शहादत दी थी".
यह लड़ाई भारतीय युद्ध इतिहास की सबसे पराक्रमी लड़ाई मानी जाती है. ये वो युद्ध था जिसको दुश्मन देश ने भी सराहा था और माना था कि रेजांगला के युद्ध ने चीन को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है. चीनियों ने शहीद हुए भारतीय जवानों के सम्मान में कम्बल तक ओढ़ाए थे. शहीद होने वालों में अधिकांश सैनिक अहीरवाल से थे. 120 सैनिकों में 114 सैनिक अहीर (यादव) थे. इसलिए रेजांगला का 'अहीर धाम' के रूप में नामकरण किया गया. ज्यादातर जवान भले ही यादव थे पर सरहद पर मिटने वाला हर खून हिंदुस्तानी था.
आज हर भारतवासी के मुंह से उन जवानों की जय निकलनी चाहिए. हर कलम उनका जयकार करती हुई चले. वीरों के बलिदान को नमन करते हुए राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की कविता याद करिए
जला अस्थियाँ बारी-बारी
चिटकाई जिनमें चिंगारी,
जो चढ़ गये पुण्यवेदी पर
लिए बिना गर्दन का मोल
कलम, आज उनकी जय बोल।
जो अगणित लघु दीप हमारे
तूफानों में एक किनारे,
जल-जलाकर बुझ गए किसी दिन
माँगा नहीं स्नेह मुँह खोल
कलम, आज उनकी जय बोल।
पीकर जिनकी लाल शिखाएँ
उगल रही सौ लपट दिशाएं,
जिनके सिंहनाद से सहमी
धरती रही अभी तक डोल
कलम, आज उनकी जय बोल।
अंधा चकाचौंध का मारा
क्या जाने इतिहास बेचारा,
साखी हैं उनकी महिमा के
सूर्य चन्द्र भूगोल खगोल
कलम, आज उनकी जय बोल।।
