व्यापारिक संगठनों की चाल

सत्तर के दशक में दुनिया में एक नई अर्थव्यवस्था पनपी. इसका मकसद धनी देशों की चौधर को कायम रखना था. दूसरे महायुद्ध के दौरान बने व्यापारिक संगठनों ने सबसे बड़ी शर्त यह लगाई कि यदि कोई देश IMF और IBRD से कर्ज लेना चाहता है तो उसे अपने यहां निजीकरण अपनाना होगा. यहीं से सार्वजनिक उद्योगों का निजीकरण होना शुरू हो गया. जब-जब ये संगठन इस घिनौने खेल में असफल होते दिखे तो इनको सफल बनाने की कमान अमेरिका ने अपने हाथ में ले ली. ब्रिटानी थैचर और अमेरिकी रीगन लिबरल नेताओं ने इन संस्थाओं को फलने-फूलने के अवसर खूब उपलब्ध कराए. 



कृषि को GATT से दूर रखा गया. पर 1995 में जैसे हैं गैट WTO में तब्दील हो गया तो कृषि को भी इसमें शामिल कर लिया गया. इन संस्थानों पर अमेरिका का दबदबा था और अब भी है. उसने अपने द्वारा ईजाद किये गए व्यापार के ग्लोबल मानकों पर चलने के लिए पूरी दुनिया को मजबूर कर दिया. विदेशी मुद्रा संकट के चलते भारत ने भी 1991 में IMF से कर्ज लिया. क्योंकि रिजर्व बैंक के पास महज दो हफ्ते के आयात का बिल चुकाने के लिए ही विदेशी मुद्रा रह गई थी.जाहिर है इंडिया को भी वो शर्तें माननी पड़ी. तब से ही ऐसा कहा जाता है कि भारतीय वित्त मंत्री भारतीय संसद की बजाए सीधा विश्व बैंक और IMF के दफ्तर की हिदायतों का पालन करने लगा. वित्त मंत्री अपने कामों का हिसाब किताब वहीं जाकर देता है और तभी से भारतीय अर्थव्यवस्था विदेशी पूंजी के रहमो कर्म पर चलने लगी. 


भूमंडलीकरण नामक एक नया शब्द आया. पढ़ने में भले ही इस शब्द से व्यक्ति को गौरव का एहसास होता हो पर इसने दुनियां जहान की सरकारों से यह तय करने का हक छीन लिया कि उनके देश की जनता के लिए क्या अच्छा है,क्या बुरा है. बाजार को ध्यान में रखकर नीतियां बनाई जाने लगी. अमेरिका ने भारत को दो टूक लहज़े में पाठ पढ़ा दिया कि यदि वह विकसित महाशक्ति का खिताब हासिल करना चाहता है तो स्वावलंबी विकास और स्वदेशी के चक्कर में न पड़े. गैर-पूंजीवाद का मोर्चा स्थापित करने वाला सोवियत संघ ढह चुका था. गरीबों को संगठित कर क्रांति का दावा करने वाले कम्युनिस्ट अपनी नाकामियों से सबक सीखने को तैयार नही थे. 


अर्थतंत्र की ये नीतियां राजनीति को ही राजनीति सिखा रही थी. मतलब 'राज्य' का महत्त्व घटने लगा. हर क्षेत्र में बाजार हावी होता गया. इस दौर में इंटरनेट ने भी शहरी लोगों के ड्राइंग रूम में अपनी जगह बनानी शुरू कर दी थी. इसमें न्यूज़ मीडिया की भूमिका प्रमुख होती चली गई. इसका घटिया रूप आज आपकी आंखों के सामने है. आधुनिकता की चकाचौंध में हर देश ने अमेरिकी संस्करण को स्वीकार करना शुरू कर दिया. पिछड़े व गरीब देशों ने इन्हीं नीतियों में अपने मुल्क के विकास का फलसफ़ा देखा. 


1971 में अमेरिका में महंगाई और बेरोजगारी के चलते इकोनॉमी गिरती चली गई. ऐसे में एक बार फिर अमेरिका ने वहीं खेल खेला जो 1930 के दौर में आई आर्थिक महामंदी के समय खेला था. अर्थात वह देश के लघु व कुटीर उद्योगों को समाप्त करने पर तुल गया. ग्लोबलाइजेशन की नींव यहीं से पड़ती है. आज मजबूरीवश कह लीजिए या आधुनिकता की चकाचौंध के मारे, हर देश यहीं कर रहा है.  विदेशी कर्ज हेतु भूमंडलीकरण को अपनाना और अपने यहां निजीकरण को लागू करना हर देश की नियति बन चुकी है. आज तमाम सार्वजनिक उपक्रमों के साथ-साथ कृषि की जो दशा आप देख रहे हैं, अमेरिका की चौधराहट में इसकी पटकथा पचास बरस पहले ही लिखनी शुरू हो चुकी थी.