नारीवाद केवल शहरी महिलाओं की जागरूकता का नाम नही है. महिला सशक्तिकरण गांव देहात तक भी पहुंचे. इसके लिए भारतीय सिविल सोसाइटी कई प्रयास कर सकती है.
एक, हर इंडियन फेमिनिस्ट मजबूती से ये मांग उठा देगा कि स्त्री को घरेलू काम का उचित मूल्य मिलना चाहिए. कबीर जैसे समाज सुधारकों ने भी यहीं मांग उठाई थी. मांग जायज़ भी है. क्योंकि कोई भी उत्पीड़ित वर्ग तब तक अधिकारों के लिए विद्रोह नही कर सकता जब तक उसके पास संपत्ति या आय के साधन न हों. स्त्री का पुरूष पर निर्भर रहने का यह एक बड़ा कारण है. परन्तु बहुत-सी संपन्न स्त्रियां ऐसी हैं जिनके पास प्रचुर मात्रा में धन है, पैसा है, जिनका बैंक बैलेंस लाखों रुपये है, बावजूद इसके वे पुरुष की मानसिक ग़ुलामी से बाहर नही निकल पाती या निकल पाई हैं. इसलिए मूल समस्या को पहचान कर मांग ये उठे कि देश में आर्थिक व्यवस्था ऐसी हो जिसमें नारी की वित्तीय स्थिति पुरूष से कम न हो उसके बराबर ही हो. भारतीय नारीवाद को ऐसे आर्थिक प्रश्न उठाने से हिचकना नही चाहिए.
दो, आज भी हिंदुस्तानी मेनस्ट्रीम फेमिनिज़्म पर उच्च जाति की महिलाओं या मध्यम वर्ग की महिलाओं का कब्ज़ा है. शायद ये यूरोप की नकल है. लेकिन भारत का मध्यम वर्ग बहुत छोटे आकार का है. यूरोप में पूंजीपति को छोड़कर लगभग हर वर्ग मध्यम वर्ग बन चुका है! भारत का नारीवाद इन्हीं दो वर्गों के इर्द-गिर्द घूमता रहता है. वह गांव की मजदूर-किसान स्त्रियों की तरफ झांकना ही नही चाहता. इंडियन फेमिनिज़्म की यह भी एक बड़ी खामी है.
तीन, काले-गोरे का भेद भी यहां कम नही है. साठ के दशक में अमेरिका में 'मिस अमेरिका ब्यूटी कॉन्टेस्ट' के खिलाफ एक बड़ा प्रोटेस्ट हुआ. महिलाओं ने सुंदर दिखने वाली सभी सौंदर्य प्रसाधन सामग्री को डस्टबिन में डालकर विरोध जताया. ये चीजें भी मानसिक उत्पीड़न के लिए जिम्मेदार हैं. इससे हीन भावना जन्म लेती है.
चार, संसद में भी मजदूर वर्ग की महिलाओं का प्रतिनिधित्व होना चाहिए. उच्च व मध्यम वर्ग की ऐसे तो बहुत-सी महिलाएं पार्लियामेंट में बैठी हैं. पर वे कभी रेप व महिला उत्पीड़न पर बोलती ही नही. सत्ता पक्ष वाली महिलाओं को तो ऐसे मुद्दों पर सांप सूंघ जाता है. ऐसे में महिला आरक्षण का क्या औचित्य रह जायेगा? इसके अलावा मीडिया, सिनेमा, सीरियल, नाटक और विज्ञापनों में भी महिलाओं का वस्तुकरण किया जाता है. ऐसी बहुत सारी समस्याएं हैं जिनका समाधान किया जाना बाकी है. पर यहां के नारीवादी यहां की परिस्थितियों के हिसाब से स्त्री संबंधी प्रश्नों का निर्माण करें और उनको लेकर संघर्ष करें.
आज विश्व महिला दिवस है. शुभकामनाएं.