यह सही बात है. सभा में अट्ठाइस सदस्यों द्वारा एक प्रस्ताव लाया गया कि संस्कृत देश की आधिकारिक भाषा होनी चाहिए. इन्हीं सदस्यों में डॉ. भीमराव आंबेडकर और टी. टी. कृष्णामचारी भी थे. शायद वे एल. के. मैत्र से सहमत थे कि संस्कृत को आधिकारिक भाषा घोषित करने से सभी क्षेत्रीय भाषाओं का दर्जा समान हो जाएगा और हिंदी से हुई तमाम ईर्ष्या समाप्त हो जाएगी. 19 सितम्बर 1949 के द हिन्दुस्तान टाइम्स ने इस सुझाव को 'निराशा का परामर्श' बताया था.
शुरुआत में जब संविधान का ड्राफ्ट तैयार किया गया तब भाषा का कोई अलग प्रावधान नही था. इसमें लिखा गया था कि संसद में हिंदी व अंग्रेजी का इस्तेमाल होगा. ये बात भी स्पष्ट नही है कि ड्राफ्टिंग कमेटी (जिसमें बाबा साहेब भी थे) ने संविधान सभा की आधिकारिक अनुमति के बिना 'हिंदुस्तानी' की जगह 'हिंदी' को ही क्यों शामिल कर लिया?
इसके अलावा भाषा को लेकर तैयार किया गया 'मुंशी-आयंगर फॉर्मूला' भी डॉ आंबेडकर की देखरेख में ही हुआ था. इस फॉर्मूले में एक प्रावधान ये भी था कि 'हिंदी' को अपने शब्द मुख्यतः संस्कृत और गौणतः अन्य भाषाओं से ग्रहण करने चाहिए. दरअसल ये 'हिंदी' और 'हिंदुस्तानी' का मसला क्या था?
भाषा को लेकर संविधान सभा उस वक्त दो धड़ों में बँटी हुई थी. एक का नेतृत्व चरमपंथी समूह कर रहा था तो दूसरे का उदारपंथी समूह. चरमपंथी 'हिंदी' के पक्ष में थे. ये लोग 'हिंदी' को संस्कृतनिष्ठ हिंदी बनाने पर तुले हुए थे. और चाहते थे कि 'हिंदी' से उर्दू, अंग्रेजी और अन्य भाषाओं को निकाल दिया जाए. इसका एक बड़ा नुकसान ये था कि ऐसा करने से 'हिंदी' बुद्धिजीवियों की एक छोटी-सी जमात तक सीमित हो जाती. इस समूह में पुरुषोत्तम दास टण्डन, रविशंकर शुक्ल, वी डी त्रिपाठी, ए आर शास्त्री, एस एल सक्सेना जैसे लोग थे.
उदारपंथियों का समूह 'हिंदुस्तानी' (हिंदी व उर्दू का मिश्रण) के अलावा क्षेत्रीय भाषाओं को भी आधिकारिक भाषा बनाने के पक्ष में था. यह भारत की एकता के लिए जरूरी भी था. और ये अंग्रेजी को तुरंत न हटाकर धीरे धीरे हटाये जाने के पक्ष में थे. इस समूह में गोविंद दास, के टी शाह, सच्चिदानंद सिन्हा, प्रसाद, मुंशी, राजगोपालाचारी जैसे लोग शामिल थे. नेहरू भी इसी समूह का समर्थन करते हुए कह रहे थे कि 'हिंदी' में भारत की मिश्रित संस्कृति होनी चाहिए.
पूर्व में गांधी जी भी 'हिंदुस्तानी' की वकालत करते रहे थे. 1945 में गांधी जी ने हिंदी साहित्य सम्मेलन के सभापति पद से ये कहते हुए इस्तीफा देने की पेशकश की थी कि सम्मेलन 'हिंदुस्तानी' की बजाए 'हिंदी'(संस्कृतनिष्ठ) को लागू कराने का दावा करता है.
हिंदी के मजबूत पैरोकार टण्डन ने एक सार्वजनिक व्याख्यान में यहां तक कहा था कि जो लोग 'हिंदी' को राष्ट्रीय भाषा और नागरी को एकमात्र लिपि घोषित करने का विरोध कर रहे हैं वे राष्ट्रविरोधी या ऐंटी नेशनल हैं. (जबकि टण्डन खुद एक क्रिश्चियन मिशनरी स्कूल में पढ़े-लिखे थे). आप सोच सकते हैं कि विपरीत विचार रखने वालों को आज जिस देशद्रोही टाइटल से नवाजा जाता है, यह मुहावरा तब भी किसी की शान में पढ़ा जाता था.
इसलिए जज साहब का ये कहना ठीक है. देश के कुछ लोग (जिनमें वरिष्ठ पत्रकार तक भी हैं) जज साहब के इस बयान को व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी से लिया गया ज्ञान बता रहे हैं. जबकि ऐसा कुछ प्रतीत नही हो रहा. हो सकता है ऐसा कहने के पीछे इन लोगों की अपनी मजबूरी हो, उन्हें अपने लोगों को खुश करना हो. पर इसमें भी कोई दोराय नही कि संस्कृत न तो उस समय आम बोलचाल की भाषा थी और न ही तकनीकी दृष्टि से प्रशासनिक स्तर पर लागू की जा सकती थी. संस्कृत केवल एक खास इलीट क्लास द्वारा ही बोली-समझी जाती थी. इसलिए संस्कृत को आधिकारिक भाषा बनाये जाने का कोई तुक ही नही था.
जब भाषा के मसले पर गांधी जी की राय जानी गई तब उन्होंने कहा था कि हिंदी को न सिर्फ़ उर्दू,अंग्रेजी,अन्य भारतीय क्षेत्रीय भाषाओं बल्कि अंतर्राष्ट्रीय भाषाओं से भी शब्द ग्रहण करने चाहिए. कुछ ऐसा ही नेहरू का भी मानना था.
