इसी महीने की शुरुआत में एक रिपोर्ट छपी. फ्रांसिस क्रिक(नोबेल प्राइज विनर) के नाम पर स्थापित क्रिक इंस्टिट्यूट ने चार यूनिवर्सिटीज के साथ मिलकर एक शोध किया. कारण तलाशा गया कि कोरोना वायरस को नष्ट करने में आखिर दिक्कत कहाँ आ रही है? इंजेक्शन असर क्यों नही कर रहा? शोध में पाया गया कि कोरोना को यदि ठीक करना है तो बेलरूबिन व बेलीवर डीन नामक दो तत्त्वों को कम करना पड़ेगा, अन्यथा इंजेक्शन काम नही करेगा.
ये रिपोर्ट विशेषज्ञों व पत्रकारों के बीच पिछले दिनों काफी चर्चा में रही. ध्यान दें कि यह रिपोर्ट बीस दिन पहले ही आई है, अर्थात दुनिया में कोरोना आने के डेढ़ साल बाद वैज्ञानिकों को ये बात पता चली है. सोचिये इतने सालों की मेहनत के बाद भी हमारा मॉडर्न साइंस कहाँ तक पहुंच पाया है? यहां ये बताने का मकसद यह नही कि मेडिकल साइंस ने तरक्की नही की. निःसन्देह तरक्की की है. आधुनिक साइंस ने एक से एक भयंकर बीमारियों का इलाज खोजा है और जनता को जीवनदान दिया है. इसके लिए हमें मॉडर्न साइंस का आभारी रहना चाहिए. खैर.
दुर्भाग्य से देश के मशहूर डॉ० के. के. अग्रवाल कोरोना की दो डोज लेने के बावजूद भी चले गए. लेकिन इसका मतलब ये नही कि मॉडर्न मेडिकल साइंस कारगर नही है. योगगुरु बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण को मॉडर्न अस्पतालों में इलाज कराना पड़ता है, यहां भी इसका मतलब ये नही कि आयुर्वेद फेल हो रहा है. रही बात देशी होकर अंग्रेजी दवाइयों पर आरोप लगाने की. तो भाई, अंग्रेजी वाले भी तो देशी वालों की खूब खिल्ली उड़ाते हैं. और खुलकर उड़ाते हैं. ऐसे यदि रामदेव मांग करने लग जाये तो हजारों लाखों FIR हो जाएंगी,क्योंकि अंग्रेजी वाले डॉक्टर तो राह चलते आयुर्वेद पर आरोप लगाते हैं और तंज कसते हैं. क्या आयुर्वेदिक तरीके से तैयार की गई उनकी कोरोनिल का मज़ाक नही उड़ाया गया था? तब अगर वो मानहानि का दावा करते तो?
आयुर्वेद पर लोगों के कम विश्वास का एक कारण ये भी है कि इस दिशा में बहुत कम रिसर्च हुई हैं. सरकारें भी इसे बढ़ावा देने के लिए पैसा उपलब्ध नही कराती. देश के बजट में स्वास्थ्य का सारा पैसा मॉडर्न मेडिकल साइंस के लिए ही जारी होता है. 95:5 का अनुपात बताया जाता है, जोकि बहुत बड़ा अंतर है. एक आम और गरीब आदमी बड़े-बड़े अस्पतालों का खर्च वहन भी नही कर पाता है. मैंने खुद मेरी आँखों से देखा है जेब में पैसे न हों तो बड़े-बड़े बहुमंजिला हॉस्पिटल के डॉक्टर मरीजों को एडमिट करना तो दूर उनसे बात तक नही करते. वहां पहुंचते ही इंसानियत और नैतिकता ढूंढे नही मिलती.
पर एक लाचार व गरीब आदमी करे भी क्या? बेचारे की आधी कमाई तो जीवन की इन्हीं बीमारियों और हॉस्पिटलों में खप जाती है. और पूर्ण रूप से स्वस्थ होने की कोई गारंटी भी नही. लोग कर्ज लेकर इन हस्पतालों में इलाज लेते हैं. कर्ज चुका नही पाते और बेचारे कर्ज समेत ही मर जाते हैं. हमें भी इलाज़ के लिए इन्हीं हॉस्पिटलों में जाना पड़ता है (मजबूरी में ही सही). क्योंकि आयुर्वेदिक इलाज का प्रोसेस थोड़ा धीमा होता है और हर जगह उपलब्ध भी नही. इसका कारण मैं बता चुका हूँ- इस दिशा में वर्षों से रिसर्च न होना. इसलिए सरकारों को चाहिए कि आयुर्वेद को बढ़ाये, क्योंकि इनकी दवाइयों का फॉर्मूला हर आम आदमी के घर, रसोई और खेत में अमूमन मिल जाता है. और ये चीजें हम रोज खाते हैं तो जाहिर है कि शरीर को नुकसान भी नही करेंगी. अंग्रेजी दवाइयों का फॉर्मूला तो आम आदमी की पहुंच से कोसों दूर होता है. न ही वे लोग आम जनता को वो फॉर्मूला बताते हैं.
कोरोना पर तो ये बड़े-बड़े डॉक्टर खुद एकमत नही हैं. इनके बीच भी भ्रम की स्थिति है. दिल्ली एम्स के निदेशक डॉ गुलेरिया और इंडियन रेडियोलॉजिकल एंड इमेजिंग एसोसिएशन ( इरिया) के बीच तो पिछले दिनों ठन ही गई थी. इसके अलावा अभी तक न सरकार और न डॉक्टर्स ने ही यह मजबूत दावा किया है कि कोरोना के टीके लगने के बाद यह फिर से नही होगा. रामदेव की कोरोनिल यदि असरदार नही है तो कोरोना के ये टीके भी इसका परमानेंट सलूशन नही है. टीका लगवाने के बाद भी बहुत से लोग मरे हैं. सच भी यही है कि जड़ समेत कोरोना को नष्ट करने की अभी तक कोई दवाई बनी ही नही है. अब आप जनता की मजबूरी देखिये. उसे कोई गारंटी भी नही मिल रही है और फिर भी दवा लिए जा रहे हैं. सोच लीजिये जीवन में इससे बड़ी मजबूरी और क्या हो सकती है?
मेरी लिस्ट में एक हज़ार के करीब दोस्त हैं. देख रहा हूँ कि इक्का-दुक्का ही इस विषय पर तार्किक ढंग से बात लिख रहा है. सब खाली विरोध करने के लिए विरोध कर रहे हैं. यदि आप ये सोच कर लिख रहे हैं कि आपका लिखा हुआ किसको खुश करेगा और किसको नाराज़, तो आपके लेखन में निष्पक्षता नही है दोस्त. यूँ भी लेखकों की निष्पक्षता आजकल पता न कहाँ खोती जा रही है. रामदेव से राजनीतिक असहमति मेरी भी है और खूब है. पर ईमानदारी से ये बताइये आपमें से कौन इस बात को नकार सकता है कि मॉडर्न मेडिकल साइंस ने हर तरफ भारी लूट मचा रखी है? अरबों-खरबों की लूट हर साल होती है. इसलिए टीवी पर IMA के निदेशक को गुस्सा आ रहा है. हम और आप जैसे इस लूट में पिसते चले जा रहे हैं. इतनी कड़ाई से क्या कभी उनसे भी आप लोगों ने सवाल पूछे हैं? एकतरफा बात न करिये.
मेदांता देश का एक बड़ा हॉस्पिटल है. उसके चेस्ट सर्जरी इंस्टिट्यूट के चैयरमैन डॉ अरविंद कुमार फेफड़ों के ऑक्सीजन बढ़ाने के लिए गहरी सांस लेना-छोड़ना और पांच से दस मिनट तक बिना रुके वॉकिंग करना बताते हैं. और ये बात सौ फीसदी तथ्यात्मक भी है. डीप ब्रीथिंग और कपालभाति के जरिये यहीं बात बाबा रामदेव बताते हैं तो आप लोगों को बकवास लगती है. वाह! आप सभी जानते हैं कि कोरोना में प्लाज्मा थैरेपी फेल हो गई. पर आप ये बात स्वीकार नही कर पा रहे हैं, क्योंकि ये बात रामदेव ने बोल दी.
रामदेव का इलाज प्राकृतिक इलाज है. किसी का विरोध करते-करते हम यहां तक पहुंच गए हैं कि प्रकृति पर ही भरोसा नही कर पा रहे. प्रकृति से बड़ा तो कोई नही, उससे बलवान कोई नही. जो बड़े-बड़े डॉक्टर्स आपस में एकमत नही हैं जिस वजह से जनता में भ्रम की स्थिति है, क्या उनसे भी आपने ऐसे सवाल पूछे हैं? आप पतंजलि के किसी जूस की बोतल को सवालिया नज़रों से देखने लग जाते हैं, जबकि कोका कोला को आंख मूंद कर खुशी-खुशी पी जाते हैं.
सच तो यह है कि एक बड़े हॉस्पिटल में इलाज़ कराने से एक मिडिल क्लास के आदमी का भी घर-बार बिकने की नौबत आ जाती है. जो काम सरकारों को करना चाहिए वो काम पतंजलि नाम की एक प्राइवेट कंपनी कर रही है. क्या जनता को सरकारों से ऐसी व्यवस्था की मांग नही करनी चाहिए जिससे 90 फीसदी बीमारियों का इलाज वो घर पर ही रहकर कर सकें? इसमें कोई दोराय नही की रामदेव ने ही योग को घर-घर तक पहुंचाया है.
बेशक योग हज़ारों साल से प्रचलित था, पर लोकप्रियता तक ले जाने का श्रेय रामदेव को ही जाता है. इससे पहले कुछ खास लोग ही योग पर अपना एकाधिकार समझते थे. इस दिशा में यदि कोई निरंतर काम कर रहा है तो हम जैसे आम लोगों को दिक्कत क्यों हो रही है? समझ में नही आता. जब कोई इस तरह की लूट के खिलाफ मोर्चा खोलता है तो आप प्रेशर कुकर की सिटी की भूमिका में आ जाते हैं. सच जनता तक जाने नही देते. और फिर बाद में 'दवाइयों की लूट मची है लूट' का रोना रोते रहते हैं. स्वास्थ्य तंत्र की खामियों के खिलाफ एक अकेला आदमी खम ठोक रहा है तो मुझे लगता है अमीरों को न सही कम-से-कम एक आम आदमी को तो इस बात का समर्थन करना ही चाहिए.
IMA से बाबा रामदेव ने 25 सवाल पूछे हैं. मैंने वो सभी सवाल पढ़े. 3 - 4 सवालों को छोड़ दिया जाए तो सभी में दम वाली बात है (कॉमेंट में आप वो कॉपी देख सकते हैं). खाली विरोध के लिए विरोध करने वाले लोग क्या इसी लहज़े में IMA के निदेशक से ये सवाल पूछेंगे? यूँ भी भारत में आजकल सवाल पूछने पर अक्सर लोग देशद्रोही बोल ही देते हैं. बिजनेस करने में कोई बुराई नही है, बशर्ते वो समाजहित व देशहित में हो. सिर्फ़ एक पक्ष को नही, दूसरे पक्ष को भी देखिए. भेड़ चाल में शामिल न होइये.
कुछ लोगों को तो रामदेव सिर्फ इसलिए फूटी आंख नही सुहाते कि 2014 में उन्होंने कांग्रेस की सरकार गिराने में अहम भूमिका निभाई थी. क्या बस इसी तथ्य के आधार पर बाबा गलत साबित हो जाते हैं? ऐसा कहने वालों के साथ एक समस्या ये भी है कि वो खुलकर खुद को कांग्रेस का समर्थक भी नही कह सकते. सस्ते दामों में यदि कोई किसी को स्वास्थ्य लाभ मुहैया करा रहा है तो हमें उससे बेवजह खुन्नस नही पालनी चाहिए. मैं एलोपैथी की बुराई कतई नही कर रहा. ज्यादा दिक्कत होने पर विकल्प के अभाव में मैं भी इन्हीं हॉस्पिटलों की तरफ भागता हूँ.
सोचिये अगर एलोपैथी, नैचुरोपैथी, आयुर्वेद सब एक होकर ईमानदारी से कार्य करें तो इस देश से बीमारियां यूँ ही दफा हो जाएंगी. स्वास्थ्य एक मूलभूत जरूरत है. व्यक्ति मजबूर होकर ही हस्पतालों का रुख करता है. गरीब व लाचार आदमी की इस मजबूरी को यदि कोई अपने प्रॉफिट के लिए धंधा बना रहा है और उसकी मजबूरी का फायदा उठा रहा है तो उससे घटिया इंसान इस दुनिया में कोई नही हो सकता. फिर वो चाहे एलोपैथी वाला हो या आयुर्वेद वाला.
और हाँ, जायज बात लिखिए. किसी को खुश करने के लिए न लिखिए.