राजनैतिक जीवन हमेशा दर्पण की भांति स्वच्छ व पारदर्शी रहा. सामने कुछ और व पर्दे के पीछे कुछ और कहना उनकी फ़ितरत में नही था. अक्सर वे कहते थे- राजनीति में जो चल रहा है देश को उसकी जानकारी होती रहनी चाहिए. कुछ छुपना नही चाहिए. प्रशासन में भी खुलेपन के वे हिमायती रहे.
लहज़ा इतना सख्त कि गंभीर मुद्दों पर सिंह जैसी गर्जना करते हुए जब संसद में बोलते तो मछली बाजार बने सदन में सन्नाटा पसर जाता, मिज़ाज़ इतना नरम कि विपक्षी नेता भी उनसे परामर्श और मार्गदर्शन मांगते रहते थे. विपक्ष ने दो ही नेताओं को दिल से प्यार किया है- अटल व चंद्रशेखर.
युवाओं में न सिर्फ लोकप्रिय थे बल्कि उन्हें राजनीति की ओर आकर्षित भी किया. 'युवा तुर्क' के रूप में विख्यात. कांग्रेस में जब युवाओं को साधने की बात आती तब उन्हें ही याद किया जाता था. इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस से एम.ए. करते हुए छात्र राजनीति के दिनों में जहां खड़े होकर बोलना शुरू कर देते लाइन वहीं से शुरू हो जाती थी.
छह फुट लंबी कद-काठी में स्वाभिमान इतना कि पीएम पद से इस्तीफा देने के बाद राजीव गांधी ने शरद पवार को उन्हें पुनः मनाने भेजा तो कड़क लहज़े में कह दिया- जाओ और अपने नेता से बोल दो चंद्रशेखर दिन में तीन बार अपनी बात नही बदलता. पवार अपना-सा मुंह लिए वहां से खिसक लिए. उसूलों के लिए प्रधानमंत्री का पद छोड़ने वाला कोई चंद्रशेखर ही हो सकता है.
बेखौफ ऐसे कि सिंधिया दरबार की एक मीटिंग में वीएचपी के अशोक सिंघल और बजरंग दल के नेताओं को सीधा खड़का दिया कि अगर विवादित ढांचे को छूने की हिम्मत भी की तो मैं गोली चलाने का आदेश दे दूँगा. भारत के प्रधानमंत्री को धमकी देने की आपकी हिम्मत कैसे हुई? मैं वीपी सिंह नही हूँ जो दबाव में काम करूंगा. मीटिंग में सब लोग शांत हो गए थे.
स्पष्टवादी ऐसे कि जब देवीलाल ने उनसे पूछा कि क्या मैं राजीव गांधी से मिल लूं? झटके से बोल दिया कि जाइये मिल लीजिये और अपने लिए प्रधानमंत्री का पद भी मांग लीजिये. हमेशा मुंहफट अंदाज़ में ही बोलते थे. याद रहे कि जब मधु दंडवते सेंट्रल हॉल में संसदीय दल के नेता का चुनाव करा रहे थे और वीपी सिंह ने जब पीएम पद के लिए देवीलाल का नाम प्रपोज किया तो चन्द्रशेखर ने इसका समर्थन किया था. फिर अगले पांच मिनट में जो हुआ वो समूची दुनिया ने देखा और इससे चन्द्रशेखर बहुत आहत हुए. उन्होंने लिखा भी है कि अरुण नेहरू और मधु दंडवते ऐसा कर सकते हैं ये मैंने सोचा भी नही था.
बागी तेवर तो शुरू से ही रहे. एक बार पीएम इंदिरा गांधी ने पूछा, चंद्रशेखर! तुम कांग्रेस को समाजवादी मानते हो? इस पर उन्होंने कहा- थोड़ा मानता हूं थोड़ा मनवा लूंगा. इंदिरा ने इसका मतलब पूछा तो बोले- कांग्रेस बूढ़े बरगद की तरह हो गई है. यदि मैं इसे सोशलिस्ट नही बना पाया तो पार्टी को तोड़ दूंगा. इंदिरा यह सुनकर अवाक रह गई. चंद्रशेखर ने बाद में यही किया भी. 1977 में कांग्रेस को तोड़कर जनता पार्टी बना ली. कांग्रेस द्वारा लगाई गई इमरजेंसी का विरोध करने वाले वो अकेले प्रमुख कांग्रेसी नेता थे.
इसी प्रकार एक IAS अधिकारी (कैबिनेट सचिव) का घमंड भी उन्होंने तोड़ा. राजीव गांधी के प्रिंसिपल सेक्रेटरी और वीपी सिंह के भी सचिव रह चुके बी.जी. देशमुख एक बार चंद्रशेखर से मिलने आये और अभिमान भरे तेवर में प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर से कहा, आप क्या सोचते हैं कि मैं नौकरी के लिए यहां आया हूँ? मुझे टाटा के यहां से कई साल से ऑफर मिल रहे हैं. इस घटना का जिक्र करते हुए चंद्रशेखर अपनी बुक में लिखते हैं- "ज़िंदगी में पहली बार अपने घर आए हुए किसी व्यक्ति से बात करने के बजाय मैं उठा और कमरे के बाहर चला गया. मैंने उनसे कहा, आप यहाँ से जा सकते हैं."
चुटकियों में कठोर से कठोर निर्णय ले लेते थे. उनके पीएम रहते भारत में वित्तीय संकट मंडराया तो अपने खिलाफ प्रतिक्रिया की परवाह किये बगैर सोना गिरवी रखने और IMF से लोन लेने जैसा फैसला भी तुरन्त ले लिया. भले ही इस पर उनकी खूब आलोचना हुई. उस दौर में देश कई संकटों से झूझ रहा था. मसलन; पंजाब में आतंकवाद, असम में चुनाव, आरक्षण का मुद्दा, अयोध्या विवाद आदि. स्वयं चंद्रशेखर ने बताया था कि जिस दिन उन्होंने शपथ ली उस दिन देश में 70 जगहों पर कर्फ्यू लगा हुआ था.
सच्ची व दृढ़ भाषा शैली के साथ बेबाकी से राय रखने के शौकीन. दमदार आवाज उन्हें एक बेहतरीन वक्ता सिद्ध करती थी. भाषण इतना सधा हुआ कि पूरा सुने बिना जनता अपनी जगह से हिलती तक नही थी. उनकी आवाज संसद और सड़क पर बराबर गूंजती थी. 5वें सार्क सम्मेलन में दिए उनके भाषण को सुनकर नवाज शरीफ ने अपने सचिव से कहा, काश तुम भी मेरे लिए ऐसी तकरीर लिखते. सचिव ने बताया, चन्द्रशेखर ने किसी का लिखा हुआ नही पढा, बल्कि अपने खुद के विचार प्रकट किए.
कलम व जुबान दोनों के धनी. यंग इंडियन के संपादक रहे. कलम को हथियार बना क्रांति का आह्वान कर युवाओं को जगाया. यंग जनरेशन के बीच जितना लोकप्रिय चंद्रशेखर रहे उतना आजतक कोई पीएम नही रहा. इमरजेंसी में यंग इंडियन पर प्रतिबंध लगा दिया, फिर भी निडर होकर सवाल पूछते थे. वो कहते भी थे-
'मुझे कैद करो या मेरी जुबाँ को बंद करो,
मेरे सवाल को बेड़ी कभी पहना नही सकते.'
सादगी की धरोहर ऐसी कि गांव तो गांव अपने ऑफिस तक में नेताओं से ग्रामीण बोली में बात कर लेते थे. दसियों किलोमीटर पैदल चल लेते थे. बिना इस्त्री किया धोती-कुर्ता भी पहन लेते थे. प्रधानमंत्री रहते हुए पांचवें सार्क शिखर सम्मेलन में भी खांटी अंदाज़ में धोती-कुर्ता पहनकर ही पहुंचे थे. और वहां उन्होंने विदेश मंत्रालय द्वारा लिखित भाषण नही पढ़ा, बल्कि अपनी ही ठेठ भाषा में पढा. पीएम रहते हुए कभी प्रधानमंत्री आवास में नही रहे.
प्रधानमंत्री बनने से पूर्व वे 22 साल संसद के सदस्य रहे, पर कभी भी मंत्री पद पाने की चाहत नही की. 89 का चुनाव दो सीटों से लड़ा और दोनों पर ही जीत दर्ज की. कांग्रेस ने समर्थन वापसी के संकेत दे दिए थे. सरकार गिरने के बाद उसी कांग्रेस ने जब चंद्रशेखर से उनके कार्यों का हिसाब मांगा तो कांग्रेस को उनका जवाब कुछ यूँ था -
चमन को सींचने में पत्तियां भी कुछ झड़ गई होंगी
यही इल्जाम लग रहा है मुझ पर बेवफ़ाई का..
पर कलियों को रौंद डाला जिन्होंने अपने हाथों से
आज वही दावा करते हैं चमन की रहनुमाई का.
ऐसे थे बलिया के बाबू साहेब. चापलूसी से कोसों दूर धारा के विपरीत बहने वालों का नाम है चन्द्रशेखर. भारत के राजनीतिक इतिहास में ऐसा सर्वगुण-संपन्न नेता चन्द्रशेखर सिंह के बाद आज तक दूसरा कोई नही हुआ. उनको आदर्श मानना हमारे जैसे राजनीतिक विज्ञान के विद्यार्थियों के लिए अत्यंत गौरव की बात है. समाजवाद की वैचारिक और व्यवहारिक राजनीति के उस महान पुरोधा को आज उनकी पुण्यतिथि पर सादर नमन करता हूँ.