नए भारत में प्रेमचंद सरीखा व्यावहारिक लेखन हो

अमर कथाशिल्पी मुंशी प्रेमचंद ने अपनी जुझारु लेखनी के दम पर समाज की जिन समस्याओं को अपने साहित्य द्वारा उजागर किया, हर साल उनके जन्मदिन की बधाई देकर हम खुश जरूर हो लेते हैं; पर वे समस्याएं आज भी हमारे समक्ष मुंह उठाये खड़ी हैं. उन्होंने जो लिखा वो कोई और लिख ही नही सकता था. 



एक अनुमान के मुताबिक़ प्रति वर्ष पाठक दो करोड़ रुपये का प्रेमचंद साहित्य खरीदता है. खुद प्रेमचंद कभी भी सरकारी खरीद के मोहताज़ नही रहे. क्योंकि एक तो वे सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले साहित्यकार थे, दूसरा उन्होंने अपने जीवनकाल में जितना भी लिखा वो आम आदमी के लिए आम भाषा में लिखा. पर सच यह है कि आज का भारत भी उन्हीं समस्याओं की दलदल में धँसा हुआ है जो कभी प्रेमचंद जी ने उस दौर में इंगित की थी. 


उन्होंने किसानों के जीवन का जो दस्तावेज समाज को सौंपा वो आज भी अपनी वहीं तस्वीर पेश कर रहा है. वो चाहे 'ग़बन' के रमानाथ व जालपा हों या 'पूस की रात' के हल्कू व मुन्नी के किरदार हों. ऐसे न जाने प्रेमचंद द्वारा कल्पित कितने ही पात्र हैं जो हमें आज भी इक्कीसवीं सदी में अपने आसपास असलियत में देखने को मिल जाते हैं. तो बदला क्या? महिलाओं की जो हालात आज के भारत में है, उसकी पहली झलक प्रेमचंद की रचनाओं में ही मिली थी; बरसों पहले. तो वर्षों बाद भी हममें कितना बदलाव आया?  


साम्प्रदायिकता नामक जिस दंश को देश आज झेल रहा है, इसके खतरे से प्रेमचंद जी ने बहुत पहले ही आगाह कर दिया था. क्या हमने इसका तोड़ निकाला? प्रेमचंद की कथाओं के पात्रों की तरह पीड़ित वर्ग आज भी जल,जंगल,जमीन की लड़ाई लड़ रहा है और आए दिन अपराधी के नाम पर सरेआम पीटा जा रहा है. इस तबके के साथ हमारा कितना जुड़ाव हुआ? देश में आज गबनकर्त्ता ऊंचे और माने हुए पदों पर बैठे हैं; भृष्टाचार टॉप-टू-बॉटम फैला हुआ है, तो एक चंद्रहार के "गबन" की बात ही क्या है. 


प्राकृतिक संसाधनों पर माफ़िया लोगों का राज हो चला है. कामगार और पूँजीपति के बीच का फासला दिनों-दिन बढ़ता जा रहा है. "पंच परमेश्वर" को पढ़कर आज देश की न्यायिक व्यवस्था का हिसाब आप लगा लीजिये. उन्होंने अम्बेडकर के आंदोलन से प्रभावित होकर दलितों पर अनेकों कहानियां लिखी. पर आज आप देखिए दलित किस हाल में हैं? उनकी कहानियों के पात्र आज भी हमारे आस-पास जिंदा हैं. प्रेमचंद जी महिलाओं की बराबरी की बात करते-करते चले गए. पर समाज ने उनकी सोच के साथ क्या किया? बराबरी की परिभाषा ही बदल डाली. कदम-दर-कदम प्रेमचंद के साथ हम अन्याय करते चले गए. चंद लड़कियों की प्रतिभा और सफलता तो सुर्खियों में आ जाती है, लेकिन हाशिये पर पड़ी उन हज़ारों लड़कियों ने क्या बिगाड़ा है जो हिम्मत की पगडंडियों पर चलते हुए अपने लिए सुखद भविष्य की राह खोज रही हैं. ये तमाम सारी समस्याएं मुंशी जी के समय में भी थी और आज भी हैं. तो किस मुंह से हम प्रेमचंद जी के जन्मदिन पर उन्हें याद करते हुए नए भारत में पुरानी रूढ़ियों के साथ देशवासियों को बधाई दें? 


इसलिए हो सके तो प्रेमचंद को याद करने की बजाए उनके द्वारा उठाई गई समस्याओं का हल खोजिये. हमें इस बात का उत्तर तलाश करना होगा कि आखिर हम आजतक जन्मदिन या श्रद्धाजंलि के रूप में भी प्रेमचंद जी को वो भारत क्यों नही दे पाए जो उन्होंने कभी चाहा था. सरकारें अब भी लोक कल्याण व समाजवाद की राह चलने पर हिचक रही हैं. आज का भारत भी उन्हीं समस्याओं को सिर पर ढोये चला जा रहा है. ये सही है कि इनकी जड़ें समाज में गहराई तक गड़ी हुई हैं. इसलिए काम थोड़ा मुश्किल है पर कोशिश करिये समाधान जरूर निकलेगा. 


हमें यह भी देखना होगा कि प्रेमचंद जैसे कितने जनप्रिय साहित्यकार हमारे आसपास हैं. साहित्य को समाज का दर्पण कहने का कुछ तो मतलब होता ही है. अच्छा साहित्य समाज़ में जागरूकता लेकर आता है,जिससे लोग व्यवस्था के समक्ष लोक कल्याणकारी माँग रखते हैं. हिंदी कवि और आलोचक अशोक वाजपेयी ने बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में कहा था, "साहित्यकार और सत्ता प्रतिष्ठान के बीच तनाव का संबंध जरूरी है. सत्ता की प्रजातंत्रिकता के लिए सत्ता को तीखी आलोचनात्मक नज़र से देखना आवश्यक है. मूल्यों की राजनीति सिर्फ साहित्य और कला में हो रही है. मूल्यों को लेकर जो संघर्ष साहित्य व कला में जारी है वहीं असली राजनीति है, बाकि तो सत्ता का खेल है."  


कबीर, दुष्यंत, पाश जैसे कितने ही साहित्यकार हुए जिन्हें पढ़कर समाज ने सिस्टम से अपने अधिकारों की मांग की. मैं तो समाज विज्ञान का छात्र हूँ ज्यादा नही जानता, पर साहित्य वाले अधिक जानते होंगे कि भारतेन्दु युग को नवजागरण काल इसी लिए कहा गया क्योंकि उस दौर के साहित्यकारों ने सामाजिक व राजनीतिक क्षेत्र को अपनी रचनाओं द्वारा प्रोत्साहित किया, जिससे समाज में सत्ता से अधिकारों की माँग को लेकर एक जागरूकता पनपी. पर ये सब विधाएं भी अब सिलेक्टिव बनती जा रही हैं. वहीं प्रेमचंद जी ने एक पत्रकार व लेखक के रूप में कभी भी अपनी लेखनी से समझौता नहीं किया. उन्होंने जो देखा वही लिखा. सत्ता प्रतिष्ठानों को उनका लेखन कभी रास नही आया. उनकी कलम मजदूरों की बराबर आवाज उठाती हुई चली. उनका मानना था कि 'मैं मजदूर हूँ जिस दिन कुछ लिख न लूँ, उस दिन मुझे रोटी खाने का कोई हक नही.' 


साहित्यकार जब बाजार और मार्केटिंग के अधीन हो जाता है तब वह वो नही लिख पाता जो वह चाहता है, फिर उसे वहीं लिखना पड़ेगा जो उससे बाजार लिखवाना चाहेगा. कबीर के जमाने में भी बाजार था. प्रेमचंद के जमाने में भी बाजार था. लेकिन उन्होंने बाजार और मार्केटिंग की तरफ देखा तक नही. यहीं वजह है कि उनका साहित्य आज भी प्रासंगिक है और हमेशा रहेगा भी. मार्केटिंग के जरिये मिली प्रसिद्धि पल भर के लिए आपको खुशी दे सकती है, पर भविष्य के लिए आपकी रचना की प्रभावशीलता टिकी रहेगी इस बात की कोई गारंटी नही है. 


साहित्य समाज में जागरूकता लेकर आता है. इसलिए लेखकों का यह दायित्व है कि वह ऐसा साहित्य रचें जिसे पढ़कर जनता सत्ता से समाज-कल्याण की मांग उठाये. यही बात जनता पर भी लागू होती है.  प्रेमचंद जैसे लेखकों ने कभी अपनी किताबों की मार्केटिंग नही की. आज के लेखकों को इतनी बात तो समझ लेनी चाहिए कि बाजार की छाया आपकी रचनाओं से शोषित, उत्पीड़ित व गरीब समाज के हक में लिखे गए शब्दों को ढक लेती है. 


"हंस" पत्रिका के जनवरी 1936 के अंक में मुंशी प्रेमचंद जी ने लिखा था, "ऊंचा साहित्य तभी आएगा जब प्रतिभा-संपन्न लोग तपस्या की भावना लेकर साहित्य क्षेत्र में आएंगे, जब किसी अच्छी पुस्तक की रचना राष्ट्र के लिए गौरव की बात समझी जाएगी, जब उसकी चाय की मेजों पर चर्चा होगी, जब उसके पन्नों के गुण-दोषों पर शिक्षित मित्र-मंडलियों में आलोचनाएं होंगी. हमारे यहां वहीं साहित्य की सेवा करते हैं जिन्हें कोई काम नही मिलता या जो लोग केवल मनोविनोद के लिए कभी-कभी कुछ लिख-पढ़ लिया करते हैं. ऐसे समाज में उच्च कोटी का साहित्य क़यामत तक न आएगा." 


प्रेमचंद अपने आप में एक आंदोलन थे. देहात उनके रग-रग में बसा था. जब तक गाँव-देहात रहेगा,तब तक प्रेमचंद जिंदा रहेगा. उनके साहित्य ने समाज को जोड़ने का काम किया था. उनकी कलम ईश्वर-अल्लाह की बराबर इबादत करती रही. उर्दू में वह नवाब राय के नाम से लिखते थे. महात्मा गांधी उनकी लेखनी के ज़बरदस्त कायल थे. प्रेमचंद के निधन पर गांधी बाबा ने अपनी टिप्पणी में लिखा था - 

" हमारा देश जब स्वाधीन होगा और जब यहां का ग्रामीण समाज बेरोजगारी, गरीबी, शोषण और निरक्षरता से मुक्त होगा, तब लोग कल्पना भी नही कर सकेंगे कि कभी भारत का किसान और मजदूर उस हालत में था. तब प्रेमचंद जी का साहित्य पढा जाएगा और उससे पता चलेगा कि तत्कालीन भारत का भावी जीवन कैसा था." 


इस आशा के साथ मुंशी जी के जन्मदिन पर बधाई कि हिंदुस्तान को ही नही संसार को भी प्रेमचंद जैसा लेखक बार-बार मिलता रहेगा और उस दौर की जो समस्याएं व रूढ़ियाँ आज भी प्रचलित हैं हम उनसे स्वयं व समाज को बाहर निकालने की कोशिश करेंगे. ऐसा करके ही हम उन्हें सम-आदर के पुष्प भेंट कर सकते हैं. वरना तब से अब तक कि उन्हीं समस्याओं के व्यवहारिक समाधान की तलाश में न्यू इंडिया यूँ ही निरंतर भटकता रहेगा. उच्चकोटि के यथार्थवादी साहित्यकार श्री धनपत राय उर्फ़ प्रेमचंद जी के जन्मदिवस पर उन्हें सादर नमन करता हूँ.