सरकारी जासूसी की सबसे बड़ी मिसाल : वाटरगेट कांड

1964 में अमेरिका सीधे तौर पर वियतनाम युद्ध में उतर आया था. उसने एक से एक भयंकर रासायनिक बमों का प्रयोग किया. माना जाता है कि इस युद्ध में द्वितीय विश्वयुद्ध से भी ज्यादा बम गिरे थे. इसी युद्ध से अमेरिका को बाहर निकालने के नाम पर सत्ता में आये - रिचर्ड निक्सन. युद्ध तो रुक गया पर उसके दुष्परिणाम सामने आने लगे, जिसके प्रभाव में निक्सन भी आये. 



जनवरी 1969 में वे राष्ट्रपति बने. अमेरिकन रिपब्लिकन पार्टी से उनका ताल्लुक था. वाशिंगटन डीसी में वाटरगेट काम्प्लेक्स की एक बिल्डिंग में उस समय की अमेरिकन डेमोक्रेटिक पार्टी की राष्ट्रीय समिति का कार्यालय हुआ करता था. वियतनाम युद्ध में अमेरिका के दुराचारों की आंच पूरी तरह से ठंडी नही हो पाई थी. निक्सन भी इससे अछूते नही रहे. इसलिए वहां की जनता में अभी भी सरकार के खिलाफ रोष था. याद रहे, ये वो युद्ध था जिसमें अमेरिका की जनता ने अमेरिका की ही जमकर आलोचना की थी, क्योंकि इस युद्ध में अमेरिकी सेना ने निहत्थे लोगों पर खूब अत्याचार किये थे. 


निक्सन ने जनता के रोष को भांपते हुए अगले चुनाव में जीतने के लिए हर तरह की नीति अपनानी शुरू कर दी. इसी क्रम में उन्होंने वाटरगेट काम्प्लेक्स के डेमोक्रेटिक ऑफिस में जासूसी के लिए रिकॉर्डिंग डिवाइस लगवा दिए ताकि पता चलता रहे कि विपक्ष क्या चुनावी प्लान बना रहा है. कुछ दिन ये डिवाइस ठीक से काम करते रहे पर जल्दी ही ये खराब हो गए. पुनः इनको सही करने के लिए पांच लोग दोबारा उस कार्यालय में चोरी छिपे दाखिल हुए और पुलिस द्वारा पकड़ लिए गए. अभी तक निक्सन का नाम इस घटनाक्रम में सीधे तौर पर नही आया था,पर जल्द ही आने वाला था. 


इधर इस पूरी घटना को वाशिंगटन पोस्ट के दो युवा पत्रकार बॉब वुडवर्ड और कार्ल बर्नस्टीन निरन्तर रिपोर्ट कर रहे थे और छाप रहे थे. जब निक्सन का इस साजिश में हाथ होने की ख़बर का सोर्स उनसे पूछा गया तो उन्होंने सिर्फ 'डीप थ्रोट' नामक एक कोड नेम बताया. ये क्या था क्या नही, इस पर अगले 30 सालों तक पर्दा पड़ा रहा. अमेरिका के इतिहास में तीन दशकों तक यह पहचान रहस्य बनी रही. इत्तेफाक से उन दिनों डीप थ्रोट नाम की एक अश्लील फ़िल्म अमेरिका में खूब चर्चित थी. इसलिए रहस्य और भी पुख्ता बना रहा. 


इस साजिश में अपना नाम उछलते देख निक्सन जनता के सामने आए और भावुक लहजे में दावा किया कि इस घटना से उनका कोई लेना देना नही है. जनता ने भरोसा कर लिया और वो दोबारा से भारी बहुमत के साथ अमेरिका के राष्ट्रपति बन गए. पर इस बार वहां की न्यायपालिका ने जोरों से इस साजिश की जाँच करनी शुरू कर दी. जो जो वकील व जज इस पर जी-जान से लड़ रहे थे उनको निक्सन ने नौकरी से निकाल दिया. और अपने खास लोगों को CIA के माध्यम से FBI की जांच में हस्तक्षेप करने को कहा. FBI उस समय इसी स्केंडल की खोजबीन में लगी हुई थी. निक्सन का उस स्केंडल में हाथ था या नही था लेकिन इन दोनों मामलों(न्यायपालिका और जांच एजेंसियों में हस्तक्षेप) से साफ नजर आ रहा था कि वो राष्ट्रपति की शक्तियों का अपने निजी स्वार्थ के लिए दुरुपयोग कर रहे हैं. 


सीनेट में उन पर महाभियोग की प्रक्रिया आरंभ हो गई. उधर न्यायपालिका ने निक्सन को वो टेप रिकॉर्डिंग प्रस्तुत करने का आदेश दिया. उन्होंने कुछ टेप उपलब्ध भी करवाये. कुछ दिन बाद चारों ओर से बनते दबाव के चलते उन्होंने सभी टेप रिकॉर्डिंग अदालत में रख दी. अंततः उन पर आरोप सिद्ध हुआ और वे गुनहगार साबित हुए. अगस्त 1974 में दूसरा कार्यकाल पूरा होने से पहले ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया. अमेरिकी इतिहास में होने वाला यह इस तरह का पहला केस था और सरकारी जासूसी का दुनिया में सबसे बड़ा उदाहरण. 


डीप थ्रोट का रहस्य 2005 में जाकर खुला. दरअसल वो डीप थ्रोट कोई और नही बल्कि FBI के डिप्टी डायरेक्टर विलियम्स मार्क फैल्ट थे. उन्होंने 2005 में एक पत्रिका में लिखे लेख में यह बात खुद स्वीकार की थी कि उस समय डीप थ्रोट के नाम से अखबार को जानकारी वहीं मुहैया कराया करते थे. इससे पहले भी एक कॉलेज स्टूडेंट ने दावा किया कि फैल्ट के बेटे ने उन्हें खुद बताया कि डीप थ्रोट मार्क फैल्ट ही थे. इसके अलावा भी वुडवर्ड 1999 में नियमित रूप से फैल्ट के घर आते रहते थे, जब वो बीमार थे. पर इन बातों पर तब जनता ने ज्यादा भरोसा नही किया था. रहस्य खुल जाने के बाद उन दोनों पत्रकारों से पूछा गया कि वो कब उनका नाम उजागर करते? उन्होंने कहा- मार्क फैल्ट की मृत्यु के बाद. कुछ साल बाद 2008 में वाटरगेट कांड के मुख़बिर फैल्ट का 95 वर्ष की उम्र में निधन हो गया. कुछ लोग उन्हें FBI को धोखा देने के चलते गद्दार कहते हैं तो कुछ निक्सन प्रशासन के सच को उजागर करने के कारण हीरो भी मानते हैं. 


दोनों पत्रकारों ने वाटरगेट स्केंडल पर एक किताब लिखी - All the president's men. इस किताब पर इसी नाम से फ़िल्म भी बनी, जो इसी वाटरगेट कांड पर आधारित है. 


भारत में भी इस तरह की जासूसी कई बार हुई है. 1988 की कर्नाटक सरकार, पिछले साल राजस्थान सरकार और अभी हाल ही में चर्चा में चल रही पेगासस जासूसी कुछ प्रमुख उदाहरण हैं.  पेगासस में फ्रांस का नाम भी है. फ्रांस से राफेल डील हुई थी. भारत के पूर्व cji पर एक महिला ने शोषण का आरोप लगाया था. अब उस महिला का नाम भी जासूसी सूची में है. अनुमान लगाया जा रहा है कि राफेल पर फैसला देने के लिए पूर्व सीजेआई पर दबाव बनाया गया था. इस मामले में एक बात और ध्यान देने वाली है, पूर्व सूचना मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा है कि पेगासस में अन्य 40 देशों का नाम भी है फिर अकेले भारत पर ही आरोप क्यों लगाया जा रहा है? इसका मतलब ये भी है कि वो जासूसी होने को नकार नही रहे हैं. सच अभी भी दबा हुआ है. 


इस्तीफे के कुछ साल बाद एक सवाल के जवाब में एक इंटरव्यू में निक्सन ने कहा कि, 'अमेरिका का राष्ट्रपति जो करता है वो गैर-कानूनी नही हो सकता.' इसी तर्ज़ पर हमारी सरकार के समर्थक भी कह सकते हैं कि भारत सरकार भी जो करती है वो सोच समझकर ही करती है. दुनिया की सबसे पुरानी डेमोक्रेसी (अमेरिका) की सरकार जासूसी के चलते गिर गई थी. अब ये देखना दिलचस्प रहेगा कि दुनिया की सबसे बड़ी डेमोक्रेसी (भारत) की सरकार पर जासूसी का क्या प्रभाव पड़ेगा. वैसे सरकार जासूसी जैसे आरोपों को सिरे से खारिज कर रही है और न इस पर चर्चा ही करना चाहती है. लेकिन सरकार दबाव में जरूर है.