किसान समर्थकों की भी जिम्मेदारी

कुछ लोग चाह रहे हैं कि संयुक्त किसान मोर्चे की अहम कड़ी योगेंद्र यादव भी 'बक्कल तार' भाषा में सरकार व प्रशासन से बात करे. तो शायद वो ऐसा नही करेंगे! और करना भी नही चाहिए. ऐसे लोगों को यह याद रखना चाहिए कि 'बक्कल तार' मशीनरी सरकार के पास भी है. भारत एक फेबियन सोसायटी वाला देश है. जिसके आदर्श नेहरू, आचार्य नरेंद्र देव, जेपी, गांधी जैसे फेबियन  लोग रहे हैं. फेबियनवाद यहाँ के डीएनए में है. कोई उग्र क्रांति यहाँ कभी सफल नही हुई है. यदि लाठी के दम पर ही आज़ादी मिलनी होती तो 1857 में ही मिल जाती. 



ये किसान आंदोलन भी अभी उस स्तर का व्यवस्थित नही हुआ है. इंडियन डेमोक्रेसी पर देश-विदेश के मंचों पर लेक्चर देने वाले से आप डेमोक्रेसी को तार-तार करने वाली भाषा में बात करने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?किसान धरना स्थल से दूर एक कमरे में बैठकर किसानों को हिंसक उकसावे के लिए प्रोत्साहित करने वाले वीर रस के लेख लिखना आसान बात है. ऐसे लोगों को याद रखना चाहिए कि किसान सर पे कफ़न बांध कर नही निकला है. वो अपनी मांग मनवाने निकला है. उसके घर पे भी परिवार है, भाई-बंधु, माँ-बाप, पत्नी, औलाद सब हैं. उसकी भावनाओं को उकसाने का काम नही करना चाहिए. क्या हुआ जो यह आंदोलन साल-छः महीने और चल जाएगा. जिंदगी महत्त्वपूर्ण है. यदि कुछ महीने और बैठकर बिना जान गंवाएं मांगे मनवाई जा सके और किसानों की जिंदगियां बचाई जा सकें तो समझ लीजिए फिर भी जिंदगी बड़ी सस्ती है. 


संगठन की जिम्मेदारी बनती है कि वो अपने किसान साथियों के जीवन से कोई खिलवाड़ न करे. किसी इंसान का जीवन इतना भी सस्ता नही होता. हिंसा कोई विकल्प नहीं है. जितने कीमती किसान संगठनों के उच्च स्तरीय नेता हैं उतना ही महत्त्वपूर्ण एक सामान्य किसान है जो इस आंदोलन में अपनी भागीदारी देने दूर-दराज के गांव के एक छोटे से किसान परिवार से आया है. वो ये जानता है जितनी सुख-सुविधा राकेश टिकैत के पास हैं उतनी उस छोटे से किसान के पास नही हैं, फिर भी वो शुरू दिन से ही वहीं बैठा है तो इसका मतलब यह नही कि किसान हाईकमान उसको कफ़न थमा कर रण में उतार दे. अतः संयुक्त किसान मोर्चे को हर फैसला सोच समझकर लेना पड़ता है. 


'बक्कल तार' भाषा जिम्मेदारी की भाषा नही है. प्रदर्शन स्थल से दूर बैठ कर कलम के जरिये किसानों को मौत के कुंए में धकेलने को आतुर लोग गैर-जिम्मेदार लोग हैं. ये वहीं लोग हैं जो गांधी जी के 'करो या मरो' में हिंसा का पुट देखते हैं. भारतीय आंदोलनों के इतिहास में गांधी जी का नाम सबसे आगे आता है. राष्ट्रीय स्तर पर असहयोग, सविनय अवज्ञा और भारत छोड़ो आंदोलन के साथ-साथ चंपारण व खेड़ा जैसे स्थानीय किसान आंदोलन में भी उनकी बड़ी भूमिका थी. इतने आंदोलनों का अनुभव रखने वाला इंसान भी उदारता व अहिंसा को अकर्मण्यता का नही बल्कि कर्मठता व गतिशीलता का दर्शन मानता है. यह भीरु व कायर लोगों का तरीका नही बल्कि बलवान व वीर का गुण है. गांधी जी आंदोलनों में उदारता की बात करते थे तो वो डरपोक नही थे. बल्कि वो भारतीय समाज की सोच के प्राचीन व तात्कालिक इतिहास से परिचित थे. 


योगेंद्र को आराम करने की सलाह देने वाले महाविद्वान लेखकों/पत्रकारों को समझना चाहिए कि जमीन पर किसानों के साथ टिकैत से ज्यादा वक्त योगेंद्र यादव ने बिताया है. जिस वक्त राकेश टिकैत अपने चुनाव प्रचार में व्यस्त हुआ करते थे उस वक्त योगेंद्र यादव किसानों के मुद्दों को लेकर देश भर में घूम रहा था. चढूनी के चुनाव वाली बात से नाराज होने वालों को मालूम हो कि दो चुनाव टिकैत भी लड़ चुका है. भारत संसदीय चुनाव प्रणाली का देश है. संसद में किसानों का नुमाइंदा भेजे बिना किसान हित की आवाज उठाई तो जा सकती है पर उसे कानूनी जामा पहनाना मुश्किल होता है. किसान प्रतिनिधि सीधा मनोनीत होगा नही तो चुनाव द्वारा ही तो विधायिका में एंट्री करेगा. देश में बड़ी-बड़ी हस्तियां और प्रगतिशील विद्वान जेएनयू की पैदाइश रहे हैं. जब विश्वविद्यालय की मूल परंपरा पर आंच आई तो सब सत्ता के डर से घरों में छुपे बैठे थे, तब यूनिवर्सिटी की तासीर के बचाव में योगेंद्र यादव ही उतरे थे और थप्पड़ों का सामना भी किया था. इसके अलावा भी उन्होंने दक्षिण हरियाणा की अनाज मंडियों में घूम-घूमकर किसानों की फसल उचित मूल्य पर बिक़वाई थी. बेकार में किसी के खिलाफ खुन्नस भरा प्रचार नही करना चाहिए. 


योद्धाओं की शैली में उग्र लेख लिखने वालों से पूछा जाना चाहिए कि उनके उकसावे पर यदि किसान गलत कदम उठाता है और उसके जान-माल का नुकसान होता है तो क्या वो उनकी शहादत और नुकसान की जिम्मेदारी लेंगे? क्या वो उसकी भरपाई करेंगे? वीर रस की बात करना और बात है, वीरता दिखाना और बात है. 


इस आंदोलन में लिया गया फैसला न अकेले योगेंद्र का है ना चढूनी का. यह संयुक्त किसान मोर्चे का सहमति से लिया गया फैसला होता है. कुछ लोकल किसान नेता फैसलों को कभी चढूनी का बताकर प्रचार कर रहे हैं तो कभी योगेंद्र का. वैसे करनाल में शांतिपूर्ण प्रदर्शन का योगेंद्र यादव का सुझाव कोई 'गलती' नही थी. संयुक्त किसान मोर्चा बहुत बड़ा संगठन है. तमाम तरह की विचारधाराएं इसमें शामिल हैं. इसलिए थोड़ा बहुत मतभेद होना लाज़िमी है. परंतु दिक्कत तब है जब जोर-शोर से यह प्रसारित किया जाता है कि यदि फलाँ किसान नेता ने ऐसा न किया होता तो सरकार आज ही तीनों कानून वापिस ले लेती. करनाल में लिया गया फैसला किसी एक नेता का फैसला नही है. 


किसान आंदोलन और संयुक्त किसान मोर्चे के बीच भेद पैदा करने वाले फेसबुक के लेखकों से निवेदन है कि अपने निजी या कौमी हित के लिए इस तरह का दुष्प्रचार न करें. धरने पर बैठा किसान कोई आवारा पशु नही है जिसे जब मन किया उस तरफ मोड़ दिया. किसान सौदेबाज़ी का मोहरा नही है. याद रखिये कि सांगठनिक, प्रशासनिक व सरकारी डिसीजन भीड़ और सड़क छाप बयानों को देख भावनाओं में बहकर नही लिए जाते, ऐसे निर्णय हमेशा तर्क, बुद्धि और विवेक के आधार पर लिए जाते हैं.