विशेषकर हरियाणा के किसानों और किसान संगठनों से कुछ अहम प्रश्न हैं. आशा है ईमानदारी से उत्तर भी मिलेगा! यूँ तो संयुक्त किसान मोर्चा और धरने पर बैठे किसान समय-समय पर अपनी मांगे ज़ाहिर करते रहे हैं. पर हालात व परिस्थितियों के अनुसार कई दफ़ा इनमें भी बदलाव या समझौता करना पड़ा है. इसी वजह से कुछ सवाल पैदा हो जाते हैं कि क्या यह बदलाव और समझौता एक वक्त आने पर इन कानूनों व एमएसपी तक भी पहुंच सकता है? ऊपरी निगाह से देखें तो नही लगता पर गहराई में उतरने पर यह आभास जरूर होता है कि हर संगठन व किसान नेता का कहीं न कहीं किसी राजनीतिक विचारधारा से मोह तो है ही. क्षेत्रीय व जातिय पुट भी है वो अलग. यदि आंदोलन लंबा चला तो इन प्रवृत्तियों का व्यापक रूप भी देखने को मिल सकता है.
सवाल:-
1. यदि सरकार खेती कानून वापस नही लेती है और किसानों द्वारा प्रदर्शन करते-करते 2024 का चुनाव आ जाता है, तब किसान किस पॉलिटिकल पार्टी को वोटिंग करेंगे?
2. यदि भाजपा सरकार इन कानूनों को वापस ले लेती है तो क्या किसान बीजेपी को वोटिंग करेंगे?
3. अगर दुष्यंत चौटाला आने वाले कुछ महीनों में या चुनाव से ठीक पहले सरकार से समर्थन वापस लेकर अलग से चुनाव लड़ते हैं तो क्या किसान जेजेपी को वोट देंगे?
4. यदि संयुक्त किसान मोर्चा अपने स्तर पर आजाद उम्मीदवार चुनाव में उतारता है तो सदन में उनकी क्या भूमिका होगी? क्योंकि एक तो सभी सीटों पर skm को उम्मीदवार ही नही मिलेंगे. दूसरा,यदि दो-चार उम्मीदवार जीत भी गए तो वो कानून वापस करवाने के लिए सरकार पर कुछ दबाव नही बना सकते. इसके अलावा skm के बीच सीट बंटवारे को लेकर भी तकरार पनप सकती है.
5. कानून वापस नही हुए तो जाहिर है किसान भाजपा को तो वोटिंग नही ही करेंगे. फिर हरियाणा में तीसरा कोई बड़ा दल है नही. ऐसे में एक विकल्प चौधरी भूपेंद्र सिंह हुड्डा ही हो सकता है. किंतु अभी तक वो भी खुलकर किसानों के समर्थन में कभी नही आये. एकाध बार अपने बेटे दीपेंद्र हुड्डा के जरिये ही बयान दिलवाये हैं. और फिर इन कानूनों का ड्राफ्ट कांग्रेस ने ही तो तैयार किया था. वो तो ठीक है मिली-जुली सरकार होने के कारण उस समय प्रधानमंत्री कमजोर थे, इसलिए इन्हें लागू नही करवा पाए. इसके अतिरिक्त भी वर्तमान हरियाणा कांग्रेस में 30 के करीब एमएलए हैं. वो भी अपने-अपने क्षेत्र में किसानों के पक्ष में खुलकर नही आ रहे. मंच साँझा न करें, आकर बैठे तो सही. तो क्या 2024 के चुनाव में किसान भूपेंद्र सिंह हुड्डा का बॉयकॉट करेंगे? या तब भी उनमें जाटों के सर्वमान्य नेता की छवि ही देखेंगे क्योंकि अब तक आंदोलन में हरियाणा से जाटों की भागीदारी ही सबसे अधिक है.
6. यदि संयुक्त किसान मोर्चा न तो खुद चुनाव लड़ता है और न ही किसी अन्य राजनीतिक दल को वोट करता है तब किसानों के पास क्या नया विकल्प होगा? एक विकल्प चुनावों का बहिष्कार हो सकता है, किंतु लोकतंत्र में यह कोई स्थाई समाधान नही है, और फिर ऐसा करने से ना ही ये कानून वापस होंगे.
7. यदि भाजपा को छोड़ किसान किसी अन्य दलों जिनमें चौ. भूपेंद्र हुड्डा और चौ. ओम प्रकाश चौटाला प्रमुख हैं, की तरफ जाते हैं तो किसान अपने को इस आरोप से कैसे बचाएंगे कि यह आंदोलन तो सिर्फ भाजपा को भगाने के लिए ही था, ताकि कांग्रेस जैसी या अन्य पार्टी फिर से वापस आ सके? वैसे चौ. ओम प्रकाश चौटाला की तरफ किसानों के जाने की कम ही उम्मीद है क्योंकि वो पहले भी भाजपा के सहयोगी रह चुके हैं और उनके पोते दुष्यंत तो ख़ैर अभी सरकार में हैं ही. लेकिन अभी वो तीसरा मोर्चा बनाने की कोशिश में लगे हुए हैं.
8. 2024 में भी केंद्र में कांग्रेस की सरकार आने की कम ही उम्मीद है. अगर ऐसा समीकरण बन जाए जिससे हरियाणा में कांग्रेस की सरकार आने की संभावना नज़र आने लगे तब भी किसान आंदोलन के नज़रिए से देखें तो कांग्रेस को वोट करने का क्या फायदा, क्योंकि कानून तो केंद्र सरकार को ही वापस लेने या नही लेने हैं. कांग्रेस अपने मेनिफेस्टो में कानून वापसी की घोषणा कर भी देती है तो क्या भरोसा, क्योंकि ये तो महज़ कागजी वादे होते हैं. इसलिए जितना विरोध या दबाव दुष्यंत चौटाला पर बनाया जा रहा है क्या किसान उतना ही दबाव भूपेंद्र हुड्डा पर भी बनाएंगे? जो फिलहाल अभी तक तो नज़र नही आ रहा.
9. सरकार और किसानों के टकराव से उपजे असंतोष के चलते संयुक्त किसान मोर्चा कोई ठोस निर्णय लेगा या भविष्य में भी समझौतावादी सिद्धांत का ही सहारा लिया जाएगा?
10. यदि संयुक्त किसान मोर्चा न चुनावों का बहिष्कार करे, न अपने प्रत्याशी उतारे और न ही किसी अन्य दल के समर्थन की अपील करे, ऐसी स्थिति में अगर सरकार की तरफ से कानूनों में संशोधन करने की नौबत आ ही जाए तो क्या skm परिस्थितियों को देखते हुए सरकार के साथ एक मेज पर बैठ सकता है?
11. उत्तर प्रदेश और पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले और चुनावी नतीजे आने के बाद संयुक्त किसान मोर्चे की अगली रणनीति या योजना क्या होगी? क्योंकि दोनों राज्य एक तरह से सरकार और skm दोनों के लिए साख का सवाल है.
12. चूँकि संयुक्त किसान मोर्चे में तमाम तरह की विचारधाराएं शामिल हैं. यदि आंदोलन दो-एक साल और लंबा खिंचा तो skm के संगठनों के मध्य हर मुद्दे पर सहमति आखिर कब तक बनती रहेगी?
दो सवाल और -
13. संयुक्त किसान मोर्चा राष्ट्रीय स्तर पर 2024 के लोकसभा चुनाव में किस पार्टी का समर्थन करेगा? कांग्रेस का या भविष्य में कोई थर्ड फ्रंट बनता दिखा उसका? पर ऐसा करने से पहले skm को भविष्य में चलाए जाने वाले आंदोलनों के मद्देनजर अपनी निष्पक्षता व विश्वसनीयता को भी ध्यान में रखना होगा.
14. राकेश टिकैत अगले साल यूपी में होने वाले चुनावों में किसानों से पश्चिमी यूपी में किसका समर्थन करवाएंगे? पंजाब में भी चुनाव हैं तो किसान नेता जोगिंदर उग्राहा वहां SAD, AAP या कांग्रेस में से किसको समर्थन देने की अपील करेंगे?
अतः संयुक्त किसान मोर्चा और तमाम किसान पहले से ही अपनी पूरी स्थिति स्पष्ट करके चलें तो हमें लगता है आंदोलन में लोगों का और भी ज्यादा जुड़ाव होगा, जिसमें गैर-कृषक वर्ग भी शामिल है. शंकाओं को मिटाते हुए आंदोलन की अगुवाई करने से ही बेहतर परिणाम देखने को मिल सकते हैं,जिसकी उम्मीद पिछले एक साल से हर किसान लगाए बैठा है.