मार्क्स ने धर्म को अफ़ीम बता दिया. 1890 में मार्क्स के साथी एंगेल्स ने स्वयं कहा, 'मैं और मार्क्स ही इस बात के लिए जिम्मेदार हैं कि अपने विरोधियों को जवाब देने की तलब के चलते हमारा ध्यान संस्कृति, धर्म, नीति व भाषा की तरफ गया ही नही. आर्थिक तत्त्वों के अलावा अन्य मानवीय और सामाजिक तत्त्वों पर अध्ययन करने का न हमारे पास समय था,न स्थान और न अवसर. इसलिए अन्य कारक गौण रह गए.' पर आज भी मार्क्स के अनुयायी अपनी विचारधारा में अन्य कारकों के शामिल होने की घिसी-पिटी बात कहकर एक तरफ हो लेते हैं.
मार्क्स ने मानवता की बात की
जगत की उत्पत्ति का अध्ययन करने में जिस विद्वान की थ्योरी का कार्ल मार्क्स ने सहारा लिया, वो फ्रेडरिक हीगल खुद धर्म के महत्त्व को भली-भांति समझता था. जवानी में मार्क्स इसी हीगल के शिष्य हुआ करते थे. उनका मत था कि सृष्टि में जो भी होता है उसके पीछे एक दैवीय शक्ति (spirit) काम करती है. और प्रत्येक धर्म में उसी दैवीय शक्ति की अभिव्यक्ति होती है. मानव का मस्तिष्क इसी शक्ति का प्रतिबिंब है. जिस तरह वेद व उपनिषदों में 'तत्वमसि:' और 'अयमात्मा ब्रह्म' की बात कही गई है उसी तरह हीगल ने अपना 'विश्वात्मा' का सिद्धांत प्रस्तुत किया. हीगल तो राज्य को धरती पर ईश्वर का अवतार तक मानते थे जबकि मार्क्स इसके बिल्कुल उलट थे. इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल मैनुस्क्रिप्ट में ही मार्क्स ने मानव प्रेम व साहचर्य का जिक्र किया है. मार्क्स के बाद के मार्क्सवादियों ने इन विषयों को दरकिनार ही कर दिया. ये पांडुलिपियां मार्क्स ने 'यंग हिगलियन' का सदस्य रहते हुए यंग उम्र में लिखी थी और जवान मार्क्स चूंकि हीगल का शिष्य था. इसलिए मार्क्सवादियों ने अपने हिसाब से जो ठीक लगा वो रख लिया बाकी का छोड़ दिया. जैसे आज के अधिकतर नारीवादी सिर्फ़ छद्म नारीवाद को ही असली नारीवाद समझकर ग्रहण करते हैं. आलोचक तो यहाँ तक कह देते हैं कि बाद के वर्षों में मार्क्स द्वारा रचित इस मानवीय रूप की लेनिन व स्टालिन जैसों ने हवा ही निकाल दी.
धर्म पर भारतीय कम्युनिस्ट
करीब दस साल पहले की बात है. केरल में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के एक सांसद के.एस. मनोज ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया था. कारण बताया गया कि पार्टी में उनकी उपासना व आस्था के अधिकार को ठेस पहुंच रही है. पार्टी ने उनको टिकट भी इसी लिए दिया था क्योंकि कैथोलिकों के बीस लाख लोगों पर उनकी अच्छी पकड़ थी. तो सवाल ये भी बनता है कि उस समय नास्तिक माकपा को क्या उनमें धर्म नज़र नही आया? सफाई देने के लिए पार्टी के शीर्ष नेतृत्व में शामिल प्रकाश करात को आना पड़ा. प्रकाश करात ने जवाब देकर ही एक नया विवाद खड़ा कर दिया. उन्होंने कहा कि मार्क्सवाद धर्म पर हमला नही करता. धर्म तो हृदयहीन दुनिया का हृदय है, आत्माहीन दुनिया की आत्मा है. हमारी पार्टी किसी धर्म में निष्ठा रखने वाले व्यक्ति को सदस्य बनने से नही रोकती. अर्थात कम्युनिज्म का सपना देखने वाले मार्क्स की विचारधारा पर बनी कम्युनिस्ट पार्टियां धर्म के खिलाफ नही हैं. इसी तरह बंगाल में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के एक मंत्री हुए सुभाष चक्रवर्ती. उन्होंने एक बार कह दिया था कि 'मैं पहले हिंदू हूँ, फिर ब्राह्मण और फिर कम्युनिस्ट.' तब के सीएम ज्योति बसु ने उनको पागल करार दे दिया था. पर उन्होंने भी इस टिप्पणी का गजब प्रत्युत्तर दिया. उन्होंने कहा कि जब मैं दरगाह जाता हूँ तब मुझमें पागलपन नजर क्यों नही आता. ज्योति बसु जब इजराइल के धार्मिक स्थानों पर जाते हैं तब ये सबकुछ दिखाई क्यों नही देता. इन घटनाओं ने भारत के कम्युनिस्टों में एक प्रकार से खलबली मचा दी थी.
मार्टिन लूथर का विचार
कार्ल मार्क्स के समरूप धर्म को बेकार की वस्तु बताने में जिस अन्य जर्मन विद्वान मार्टिन लूथर को खड़ा किया जाता है उन्होंने भी धर्म को कभी नकारा नही. उन्होंने बताया कि सत्य और ईश्वर की प्राप्ति सच्ची आस्था व धर्मग्रंथों के पालन से ही संभव है, लेकिन इसके लिए किसी मध्यस्थ यानी चर्च या पादरी के पास जाने की आवश्यकता नही है. अर्थात उन्होंने ईश्वर के न होने पर सवाल नही उठाया. वामपंथ के स्कूल से निकले और अब नए-नए कांग्रेसी बने डॉ. कन्हैया कुमार भी हो सकता है अब मार्क्सवाद की धर्म के प्रति उदार छवि का बखान करने लगें! क्योंकि उन्हें अब चुनावों के दौरान कांग्रेस के 'धर्म अभियान' का हिस्सा भी बनना है.
कम्युनिस्ट देशों में आज की स्थिति
इन सब के अलावा अपने जिस अमूर्त समाज को मार्क्सवादियों ने रूस के रूप में कुछेक दशकों के लिए मूर्त रूप लेते देखा, मार्क्स के जाने के करीब डेढ़ सौ साल बाद भी वहाँ के लोग धर्म से मुक्त नही हो पा रहे हैं. रूस में अस्सी फीसदी ईसाई, पन्द्रह फीसदी मुस्लिम, दो फीसदी बौद्ध रहते हैं. यहाँ तक कि कम्युनिस्ट चीन ने भी धर्म को मान्यता दे दी है. और वैसे भी मानव के आध्यात्मिक व नैतिक विकास के लिए धर्म बहुत जरूरी है. तो क्या यह मान लिया जाए कि जिस तरह पुजारी व मौलवी भक्तों को चढ़ावे के बदले स्वर्ग या जन्नत के सपने दिखाते हैं, उसी तरह मार्क्स समेत तमाम कम्युनिस्टों ने जनता को धर्म रहित समाज का सपना दिखाया? क्योंकि वामपंथियों का जब इस्लाम अन्य धर्मों के प्रति उदार व केवल हिंदू धर्म के प्रति कठोर रवैया हो जाता है, बस तभी आकर लगने लगता है कि मार्क्स की धर्म को अफीम बताने वाली कहावत ने अब दम तोड़ दिया है.