स्वतंत्रता-पूर्व पाँच राज्यों के किसान आंदोलन

सन 1916 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय में बोलते हुए गांधी जी ने कहा था कि हमें केवल किसान ही मुक्ति दिला सकते हैं; डॉक्टर, वकील व धनी लोगों के बस की बात नही. 

साठ फीसदी से ज्यादा जनसंख्या प्रत्यक्ष रूप से खेती कार्यों में लगी होने के कारण कृषि आज भी भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ बनी हुई है. प्राचीन भारत तो केवल निर्भर ही कृषि पर था. आजादी मिलने के कुछ दशक पहले और कुछ दशक बाद तक खेती की स्थिति डांवाडोल ही रही. इससे भी ज्यादा चिंतनीय स्थिति यह है कि स्वतंत्रता के सत्तर बरस बीत जाने के बाद आज भी गांव तमाम सत्ताओं की गलत नीतियों के चलते विकास की दौड़ में पिछड़ते ही चले जा रहे हैं. अंग्रेजी हुक़ूमत को अपने पराक्रम व ताकत से झुका देने वाला भारतीय किसान आज भी राजनीति का शिकार हो रहा है. आइये एक संक्षिप्त परिचय जान लेते हैं आजादी से पहले हुए पंजाब, गुजरात समेत हिंदी पट्टी के कुछ महत्त्वपूर्ण किसान आंदोलनों के बारे में 



पंजाब का किसान आंदोलन- 


सरदार अजीत सिंह ने 'देशभक्त' नामक संस्था किसान समस्याओं पर विचार करने के लिए गठित की. क्योंकि 1906 में सरकार ने जमीन व सिंचाई की दरें बढ़ा दी थी. 7 अप्रैल 1907 को लाहौर में 12 हज़ार किसानों की सभा हुई. दो महीनों के अंदर-अंदर ऐसी 28 बड़ी किसान सभाएं पूरे पंजाब में हुई. 21 अप्रैल को रावलपिंडी में हुई सभा में पहली बार एक गीत गाया गया जो आगे चलकर किसान आंदोलन का प्रतीक बन गया और आज भी गाया जाता है. गीत था- "पगड़ी संभाल जट्टा पगड़ी संभाल ओये."  इस सभा में शामिल लोगों को पुलिस द्वारा आतंकित करने के विरुद्ध 11 हज़ार लोगों ने जुलूस निकाला जिसके दमन के लिए सेना भी बुलानी पड़ी. इससे सेना के पंजाबी जवानों में असंतोष फैलने लगा और सरकार चिंतित हो गई. सरकार ने अजीत सिंह और लाला लाजपतराय को गिरफ़्तार कर बर्मा भेज दिया. किसानों ने इसके खिलाफ़ जगह-जगह विरोध किया। 


राजस्थान का किसान आंदोलन- 


1920 में देश के सियासी वातावरण में गांधी जी की एंट्री होने से नई चेतना पनपी. मेवाड़ व सिरोही में किसान आंदोलन का नेतृत्व राजस्थान सेवा संघ के अधीन विजय सिंह पथिकराम नारायण चौधरी कर रहे थे. 1922 से ही वहां किसानों का असन्तोष साफ दिखने लगा था. राम नारायण चौधरी और हरिजी ब्रह्मचारी ने अनेक गांवों का दौरा किया. जयपुर सरकार ने चौधरी को राज्य से बाहर निकाल दिया, और उनके द्वारा संपादित अख़बार 'तरुण राजस्थान' पर भी फौरन प्रभाव से प्रतिबंध लगा दिया. हरिजी ब्रह्मचारी को सीकर इलाके से चले जाने और भविष्य में वहां आसपास नज़र न आने का हुक्म सुनाया गया. सीकर के किसानों से प्रभावित होकर शेखावाटी के किसान भी जयपुर में संगठित होने लगे. अक्टूबर 1925 में पुष्कर में अखिल भारतीय जाट महासभा का वार्षिक जलसा हुआ. इसमें बड़ी संख्या में शेखावटी के जाट किसान शामिल हुए और उन्हें नई प्रेरणा मिली. पर इस प्रतिरोध को पुलिस द्वारा शक्ति से दबा दिया गया. शेखावटी के किसानों में जागृति लाने में मंडावा के सेठ देवीबक्स सर्राफ, धौलपुर के महाराजा उदयभान सिंह,रतनसिंह व भरतपुर के ठाकुर देशराज का नाम प्रमुखता से लिया जाता है. इन्होंने किसानों में बौद्धिक चेतना जागृत की और उनके हक-हुक़ूक़ की लड़ाई लड़ी. 


फरवरी 1932 में जाट महासभा का 23वाँ जलसा झुंझुनूं में आयोजित हुआ. यद्यपि यह उत्सव जाटों का था,पर इसमें राजस्थान के हर उस नागरिक ने भाग लिया जो सामन्तशाही व जागीरदारों के जुल्मों की चक्की में पिस रहे थे. झुंझुनूं में 'विद्यार्थी भवन' नामक एक संस्था स्थापित की गई जो आखिर तक किसान आंदोलन की गतिविधियों का केंद्र बनी रही. किसानों में नई स्फूर्ति लाने के लिए जाट प्रजापति महायज्ञ किया गया. इसे सफल बनाने में चौधरी छोटूराम ने भी इसमें आहुति डाली. दस दिनों तक चलने वाला यह यज्ञ 20वीं सदी में जाटों का सर्वोपरि यज्ञ था,जिसने किसानों को एक नए वीर सैनिक के रूप में प्रकट किया. किसानों के इस प्रतिरोध को जयपुर सरकार की कोई मशीनरी नही दबा सकी. 


जागीरदार जितने बर्बर होते जा रहे थे,किसानों का हौंसला भी उतना ही प्रबल होता जा रहा था. शेखावटी में जागीरदार किसानों पर निरंतर ज्यादतियां कर रहे थे. बलरिया के ठाकुर कल्याणसिंह ने हनुमानपुरा को जला दिया. जिसमें 23 घर जल गए व किसानों की गाय,भैंस,भेड़ बकरियां भी जल गई. अन्य कई जगहों पर भी खेतों में काम कर रहे निहत्थे किसानों (स्त्री-पुरुषों)पर गोलियां चलाई गई. शेखावटी के जाट नेताओं ने इन हत्याकांडों के खिलाफ़ मुकदमा लड़कर जागीरदारों को 20 साल तक की सजा दिलाने में सफलता प्राप्त की. इन चार-पांच वर्षों के आंदोलन का नतीजा यह निकला कि वहां भूमि बंदोबस्त शुरू होने लगे,वाजिब टैक्स लगाए जाने लगे व जागीरदार जैसी प्रथा से किसानों को मुक्ति मिलने लगी. 


गुजरात का किसान आंदोलन- 


सरकारी नियम था कि यदि किसी आपदा के चलते फसल एक चौथाई से कम हो तो उस साल किसानों से लगान नही वसूला जाएगा. 1918 में गुजरात में यहीं हालात पैदा हो गए थे. पर सरकारी अधिकारियों का मूल्यांकन इसके विपरीत था,जो हर हाल में लगान वसूलने पर अड़ा हुआ था. ऐसे में महात्मा गांधी और गुजरात किसान सभा ने सत्याग्रह का ऐलान कर दिया. बिहार के चंपारण के बाद यह दूसरा किसान आंदोलन था जिसमें गांधी जी शामिल हुए थे.  वल्लभ भाई पटेल और इंदुला याग्निक जैसे युवा वकीलों ने गांधी जी के साथ गांवों का दौरा किया. एन एम जोशी और शंकर लाल पारिख जैसे बुद्धिजीवी भी इस आंदोलन से जुड़े. सरकार लगान न देने वाले किसानों की संपत्ति और उनके पशुधन को जब्त करने लगी. गांधी जी ने किसानों को शपथ दिलाई -  "हम इस वर्ष का लगान पूरा या आधा भी नही देंगे. जो लगान अदा करने की स्थिति में हैं वे भी नही देंगे. इसके बदले हमें जो भी संकट उठाना पड़े हम उठाएंगे. यहां तक अपनी जमीन छोड़ देंगे पर लगान नही देंगे."  


कुछ ऐसे खेत थे जिस पर सरकार खेती करती थी यानी सरकार द्वारा अधिकृत किए गए खेतों में प्याज की फसल उगी हुई थी. किसानों ने प्याज की वो फसल उखाड़ दी. इस सरकारी अपराध के चलते बहुत से किसानों को गिरफ्तार कर सजा दी गई. अनेक सत्याग्रही जेल पहुंचाए गए. गांधी जी ने इस पर प्रतिक्रिया करते हुए कहा, 'इससे गुजरात के किसानों को राजनैतिक शिक्षा मिली है और उनमें एक नई चेतना का विकास हो रहा है.' सरकार दमन करती रही और किसान अपनी जिद्द पर अड़े रहे. अंततः सरकार को झुकना पड़ा और किसानों के साथ लगान न देने का समझौता हुआ. ये खेड़ा आंदोलन ही था जिसने पटेल को गांधी जी का अनुयायी बना दिया. इस आंदोलन ने किसानों को आभास करा दिया कि बिना लड़े वे सरकार से अपनी मांगे नही मनवा सकते. 


उत्तरप्रदेश का किसान आंदोलन- 


अवध का किसान आंदोलन सबसे संगठित, विस्तृत व तीव्र माना जाता है. नेहरू भी इसमें भागीदार बने. पूरे यूपी में किसान सभा की 500 शाखाएं गठित हो चुकी थी, जो मदन मोहन मालवीय, पुरुषोत्तम दास टण्डन, गौरी शंकर मिश्र और इंद्र नारायण द्विवेदी के नेतृत्व में बनी थी. 1920 की गर्मियों का मौसम था. झिंगुरी सिंह और दुर्गपाल सिंह जैसे किसान नेताओं के तत्वावधान में पंचायत स्तर पर किसानों की बड़ी-बड़ी बैठकें शुरू होने लगी. इन्हीं दिनों एक बाबा फिजी से लौटकर फैज़ाबाद पहुंचे. सन्यासी जीवन बिता रहे ये बाबा किसानों में बहुत लोकप्रिय थे और गांव-गांव घूमकर उनमें चेतना जगा रहे थे. बाबा किसानों की स्थिति को लेकर नेहरू से मिले. नाम- बाबा रामचंद्र. एक बार झूठे आरोप में इनको कई किसानों सहित जेल भेज दिया गया. लगभग 10 हज़ार किसान जेल के बाहर पहुंच गए. किसान नदी किनारे इंतजार कर रहे थे. वे तभी वापस लौटे जब उनको बाबा गन्ने के खेत में एक पेड़ के ऊपर चढ़े हुए दिखाई दिए. 


जनवरी 1921 में रायबरेली में किसान आंदोलन ने जबरदस्त मोड़ ले लिया. किसानों पर गोलियां चलाई गई. नेहरू खुद इसके प्रत्यक्षदर्शी थे. इसी के साथ इस आंदोलन का विस्तार प्रतापगढ़, फैज़ाबाद और सुल्तानपुर तक फैल गया. जानकीदास जैसे किसान नेता को रिहा करने लिए किसानों ने रेलगाड़ी तक रोकनी पड़ी. सेना की दखलंदाजी के बाद आंदोलन कुछ धीमा पड़ा. इसके बाद अवध में किसान आंदोलन की बागडोर एका संघ ने अपने हाथ में ली. जो एका आंदोलन के नाम से जाना जाता है. शोहराब और मदारी पासी इसके दो प्रमुख किसान नेता थे. इस आंदोलन के केंद्र बिंदु सीतापुर, हरदोई और बहराइच थे. किसान बैठकों में जमीन में एक गड्डा खोदकर उसमे पानी भरा जाता था, उसे गंगा के समान पवित्र मानकर किसानों को निर्धारित लगान से अधिक न देने और बेगार न करने की शपथ दिलाई जाती थी कि सभी किसान एकजुट होकर जागीरदारों का विरोध करेंगे. 


1922 तक आते-आते इस आंदोलन ने व्यापक रूप ले लिया. पर सरकारी मशीनरी के आगे कुछ समय के लिए यह आंदोलन रुक गया. और अगले आठ-दस वर्षों तक रुका रहा. कारण- किसानों को संगठित प्रतिरोध हेतु प्रेरित करने के प्रयासों में कमी और किसान सभाओं की सक्रियता का अभाव. इसके बाद गांधी जी के रचनात्मक कार्यों मसलन कताई, बुनाई, खादी, स्वच्छता, तथा अछूतों के उद्धार जैसी कार्यक्रमों के जरिए कांग्रेस सेवा दल को किसानों को संगठित करने के लिए गांव-गांव भेजा गया. गांधी जी द्वारा शुरू किए गए सविनय अवज्ञा आंदोलन की पटकथा इन्हीं कार्यों के जरिए लिखी जा रही थी. 


बिहार का किसान आंदोलन- 


सामंती संरचना में बिहार के किसानों की लड़कियां बिकवाकर उस दाम से बड़े जमींदारों का लगान चुकाया जाता था. बच्चियां अधेड़ उम्र के मर्दों को बेची जाती थी. जब तक लड़की स्यानी होती,वे मर जाते. बिहार में किसान आंदोलन के अग्रदूत स्वामी सहजानंद सरस्वती ने अपनी पुस्तक "किसान कैसे लड़ते हैं" में गया जिले का एक संस्मरण बताया - 'एक बार जरूरत पड़ी कि गाय या भैंस का दूध चाहिए. मगर वहां ढूंढने से भी दूध न मिला. जमींदार को दूध चाहिए था. बस वह क्रोध में आकर बोला- गाय भैंस नही हैं तो क्या औरतें भी ब्याही नहीं हैं? फिर उन्हीं को क्यों नही दूह लेते?' स्वामी सहजानंद सरस्वती ने 1936 में अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना की थी. बिहार में डोला प्रथा थी,जिसके तहत जमींदार की मर्जी पर दुल्हन की पहली रात हवेली में कटती थी. स्त्री शोषण की ऐसी ही स्थिति अवध और राजस्थान में भी थी. 


बकाश्त वो जमीन थी जिस पर अधिकार किसान का था, बोता भी वहीं था पर एक बटाईदार की हैसियत से. उपज का आधे से अधिक जमींदार को देना पड़ता था. 1930 का दौर था. पूरी दुनिया आर्थिक मंदी से जूझ रही थी. किसान भी अछूते कहाँ रहते. लगान में देरी होने लगी तो लगान बकाया होने लगा. बिहार विधायिका ने बकाश्त भूमि उन्मूलन प्रस्ताव पारित तो किया पर जमींदार हित में. 1938 में इसके खिलाफ पटना में हजारों किसानों ने प्रदर्शन किया. इसका नेतृत्व किसान सभा के प्रथम अध्यक्ष स्वामी सहजानंद सरस्वती ने किया. 


गया में ऐसा ही नेतृत्व यदुनंदन शर्मा कर रहे थे,जिन्होंने एक हजार एकड़ में से 850 एकड़ जमीन किसानों को वापस दिलाने में सफ़लता हासिल की. राधोपुर, देकुल, सारण, अम्बवारी जैसी जगहों पर राहुल सांस्कृत्यायन के नेतृत्व में किसान संघर्ष हुए. 20 अप्रैल 1939 को साप्ताहिक जनता में राहुल सांस्कृत्यायन ने जेल से लिखा- "बिहार के किसानों पर दुधारी तलवार लटक रही है. जमींदार अपनी सारी शक्ति लगाकर किसानों को बर्बाद करने के लिए तैयार हैं, ऊपर से कांग्रेसी सरकार की पुलिस हर तरह से उनको मदद दे रही है." मुंगेर में किसान सभा के सचिव करयानंद शर्मा ने आठ गांवों में सत्याग्रह शुरू किया. किसानों ने लाठियों और भालों से पुलिस व जमींदारों के लठैतों को खदेड़ दिया. पुलिस जमींदारों का साथ दे रही थी. पुलिस और किसानों के बीच हिंसक झड़पें हुई. लगभग 600 किसानों को गिरफ्तार कर लिया गया. इस वजह से यह आंदोलन ढीला पड़ गया. परन्तु आधे से अधिक बकाश्त जमीनें किसानों को वापस मिल गई. 


जितनी तेजी से किसान सभा का प्रभाव बढ़ा था उतनी ही तेजी से गिर भी गया. कारण- स्वामी सहजानंद सरस्वती ने कांग्रेस से दूरी बना ली. वे न समाजवादियों के साथ चल सके न गांधी के विचारों के साथ. राजनीति में भी बाद में उनसे कई विवादास्पद कदम उठाए गए. जिस कारण बिहार का किसान आंदोलन कमजोर होता चला गया. और किसान संघर्ष के मार्ग से हट गए. किसान सभा द्वारा कोई दिशा न दिखाए जाने के कारण सबसे गरीब और भूमिहीन किसान की चिंता फिर से बढ़ने लगी. और फिर से उसे खेतों में मजदूरी तलाशने के अलावा कोई सहारा न मिला. 


पुनश्चः - इस प्रकार चंपारण से शुरू हुआ गांधी जी का किसानों हेतु किया गया यह संघर्ष देश के कई अन्य इलाकों तक जा पहुंचा. संपूर्ण देश से उन्हें व्यापक जनसमर्थन हासिल हुआ. परिणाम इसी का था कि राष्ट्रीय स्तर पर गाँधी जी द्वारा आरंभ किये गए आंदोलनों से ब्रिटिश हुकुमत की नींव हिलने लगी. इसी लिए गाँधी जी के बाद उन जैसा कोई दूसरा जननेता नही उभर पाया. अवध, प्रतापगढ़ और रायबरेली में नेहरू जी और बिहार, गुजरात में गाँधी जी ने किसानों के लिए जो संघर्ष किया वो निःसंदेह ही अतुलनीय था. 


बिहार में 1949 तक आते-आते जमींदारों ने इकट्ठा होकर आंदोलन को खत्म करने की पुरजोर कोशिश की. भूमिहीन किसानों के घर तक जला दिए गए. स्वामी सहजानंद पर भी हमले किये गए. बड़े जमींदारों और बंटाईदारों के इस आपसी संघर्ष ने बिहार के इतिहास के पन्नों को खून से रंग दिया था. सुनकर भी रूह कांप जाने वाले हालात थे बिहार में किसानों के. आर्थिक जीवन में आज भी कोई ज्यादा बदलाव नही आया है. 

उस वक्त अधिकतर किसान आंदोलन अंग्रेजी सरकार द्वारा ली जाने वाली लगान, बड़े भूस्वामियों व जमींदारों द्वारा भूमिहीन व छोटे या सीमांत किसानों का शोषण करने के खिलाफ हुआ करते थे. गांधी व नेहरू सरीखे बड़े नेताओं की इन आंदोलनों में बराबर भूमिका होती थी.