'भारतीय समाजवाद' के सकारात्मक राष्ट्रवाद पर 'द प्रिंट हिंदी' के लिए 17 अक्टूबर 2022 को लिखे गये योगेंद्र यादव के लेख पर मेरी टिप्पणी -
यह सही बात है कि भारत के सच्चे समाजवादी नेता राष्ट्रवादी थे। जेपी, नेहरू, आचार्य नरेंद्र देव; ये सब फेबियन समाजवादी ही थे, जिन्होंने भारतीय समाजवाद की पैरवी की। विदेश से आया समाजवाद भारत के प्रकृति-परिवेश को कभी जंचा ही नहीं। वह भारतीय मजदूरों से तो जुड़ा पर से एकत्व नहीं बना पाया। 20वीं सदी के शुरुआत एवं मध्य में हुए किसान विद्रोहों में कम्युनिस्ट समाजवादियों ने किस तरह भारतीय किसानों को गंभीरता से लेना जरुरी नहीं जाना।
राष्ट्रवादी समाजवादी चाहते थे कि स्वाधीनता के बाद की भारतीय सत्ता में किसानों का प्रधान हाथ हो, लेकिन भारतीय कम्युनिस्ट समाजवादी मत इसके ठीक विपरीत था। वे किसानों को राजनीतिक ताकत से बाहर रखना चाहते थे। जबकि कम्युनिस्ट समाजवादियों को पता होना चाहिए था कि यहां की विशाल आबादी किसान है मजदूर नहीं। उनका विश्वास एक वर्गीय तानाशाही में था। आज भी हर कम्युनिस्ट ये कहता हुआ मिल जायेगा कि किसानों को चुनाव नही लड़ना चाहिए, किसानों को राजनीति से दूर रहना चाहिए। मतलब साफ है।
प्रो. मधु दंडवते की किताब में अच्युत पटवर्धन का एक लेख है। इसमें वे लिखते हैं कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने इंटरनेशनल की गलत दृष्टि अपना कर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को बदनाम करने की कोशिश की। उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध को जन युद्ध घोषित कर दिया। कांग्रेस समाजवादी पार्टी ने साम्राज्यवादी आदर्शों पर भारतीय कम्युनिस्टों के एकाधिकार को चुनौती दी। प्रो. रंगा ने भी लिखा है कि राष्ट्रीय कांग्रेस ने तो आजादी की घोषणा की शर्त पर युद्ध में सहयोग देने का वचन दिया था पर कम्युनिस्टों ने कांग्रेस के विरुद्ध लोक युद्ध का नारा ऊंचा किया और स्वराज के लिए जन-आंदोलन छेड़ने वाले कांग्रेस प्रस्ताव का विरोध किया। क्योंकि उन्हें लगता था कि अगर राष्ट्रीय कांग्रेस शक्तिशाली हो गई तो उनकी(कम्युनिस्टों) दाल नहीं गल पायेगी।
जय प्रकाश नारायण और राम मनोहर लोहिया जैसे समाजवादी नेता भी जल्द ही मार्क्स और लेनिन के कम्युनिस्ट समाजवाद से घृणा करने लगे। 1936 में जेपी की किताब Why Socialism में मार्क्सवादी सिद्धांतो पर उनकी सहमति जरूर दिखती है, पर 1949 में लिखी उनकी किताब 'डेमोक्रेटिक सोशलिज्म' में वे संसदीय लोकतंत्र के पक्ष में खड़े दिखाई देते हैं, जिसे राष्ट्रवादी व भारतीय समाजवाद का ही परिचायक समझा जा सकता है। इसके अलावा जेपी 1942 के उस भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय रूप से जुड़े जिससे भारत के कम्युनिस्ट नेताओं ने किनारा कर लिया था।
रूस में स्टालिन ने जिस तरह से अपने विरोधियों का क्रूरता से दमन किया, जेपी ने उसे कभी स्वीकार नहीं किया। जेपी ने एम एन रॉय के नव-मानवतावाद में भी आस्था जताई। ये वहीं साम्यवादी रॉय थे जिनको कम्युनिस्ट इंटरनेशनल की बैठक से इसलिए निकाल दिया था क्योंकि उन्होंने उस बैठक द्वारा भारतीय आजादी के आंदोलन में नेतृत्व की भूमिका निभाने वाली कांग्रेस पार्टी को पूंजीवादी पार्टी कहने पर विरोध जताया था। इसलिए भारत के कम्युनिस्ट रॉय से दूरी बना कर रखते हैं। जेपी भारतीय परंपराओं पर आधारित समाजवाद के समर्थक थे।
लोहिया भी मार्क्सवादी समाजवाद से सहमत नही थे। उनका समाजवादी चिंतन भी राष्ट्रवाद पर आधारित था। उन्होंने समाजवाद को समानता और संपन्नता के साथ जोड़कर उसे भारतीय स्वरूप प्रदान किया। वे कम्युनिस्टों की इस बात को कोरी मूर्खता कहते थे कि पूंजीवाद की चरम सीमा से समाजवाद का उदय होगा। 'अंग्रेजी हटाओ' के नारे को उन्होंने पूरे देश में बुलंद किया। उनका यह विचार भी कम्युनिस्टों से मेल नहीं खाता। गैर - कांग्रेसवाद की अलख जगाने वाले वे भारत के एकमात्र सबसे बड़े महान नेता हुए हैं। जेपी ने कम्युनिस्ट की बजाए भारतीय समाजवाद को मजबूत करने और लोहिया ने कांग्रेस का विकल्प तैयार करने में बड़ी भूमिका निभाई।
मुलायम सिंह यादव ने भी कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों को समय-समय पर आइना दिखाने का काम किया था। याद कीजिए जब वाजपेयी सरकार गिरी और सोनिया गांधी सरकार बनाने का प्रस्ताव लेकर राष्ट्रपति के पास पहुंची। उन्होंने आत्मविश्वास के साथ कह दिया था कि हमारे पास 272 सांसदों का समर्थन है। सोनिया गांधी को लग रहा था कि मुलायम सिंह यादव का समर्थन तो कांग्रेस पार्टी को ही होगा। लेकिन उन्होंने कांग्रेस को समर्थन नहीं दिया। मुलायम सिंह ने सोनिया के विदेशी नागरिकता का मुद्दा भी उठाया। वो अलग बात है कि सोनिया गांधी ने इसका बदला 2004 में मुलायम सिंह यादव से जरूर लिया। इसी तरह यूपीए सरकार से जब कम्युनिस्ट पार्टियों ने अपना समर्थन वापस लेकर सरकार गिराने की कोशिश की तो मुलायम सिंह यादव ने कम्युनिस्टों के मंसूबों पर पानी फेर दिया और सरकार बचा ली।
जिस एक फैसले के लिए मुलायम सिंह यादव की कड़ी आलोचना की जाती है, वह है - अयोध्या में कारसेवकों पर गोली चलवाना। और यह आलोचना नाजायज भी नही है। किसी भी सकारात्मक और लोकतांत्रिक समाजवाद में इस कार्यवाही को सही नही ठहराया जा सकता। भारतीय समाजवाद में तो कतई नहीं। पहले तो उन्होंने अपने इस निर्णय के लिए कोई खेद प्रकट नही किया, लेकिन बाद के दिनों में वे इस पर जरूर अफसोस जताते दिखाई दिये। लेकिन, कम्युनिस्टों की तरह उनका समाजवाद कभी भी देश विरोधी समाजवाद नही रहा। उनकी पार्टी में भी आंतरिक लोकतंत्र था। मुलायम सिंह यादव भरी भीड़ में अपने कार्यकर्ताओं को नाम लेकर बुला लेते थे। उनकी समाजवादी परंपरा को आगे ले जाने में, उनकी कमियों को दूर करने में और साथ ही जेपी व लोहिया के भारतीय समाजवाद को पुनः स्थापित करने में उनके उत्तराधिकारी कहां तक सफल होंगे, यह तो समय ही बताएगा।
'भारतीय समाजवाद' विश्व भर के समाजशास्त्रियों और राजनीतिज्ञों को सामाजिक विज्ञान की तमाम विचारधाराओं में से एक अनोखी देन है। योगेंद्र यादव जी का यह कहने का तात्पर्य भी सही है कि 'आज के भारत का युवा भारतीय समाजवाद का 'स' भी शायद नही जानता, समझता। इसलिए संभव है कि वह साम्यवाद को ही समाजवाद का समानार्थी समझ बैठे।'
सांस्कृतिक आत्म-सम्मान की राजनीति की बात करें तो कम्युनिस्टों को कभी भी भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति से लगाव नहीं रहा। इस मामले में आज की कांग्रेस भी धीरे-धीरे उसी मान्यता की तरफ अग्रसर हो रही है। भाजपा अंग्रेजी की बजाए हिंदी भाषा को महत्त्व दे रही है तो इसे गलत क्यों माना जाए? क्योंकि स्वयं लोहिया भी अंग्रेजी हटाओ की बात करते थे। हिंदी के वर्चस्व की हिमायत तो भाजपा भी नहीं कर रही है। इसलिए गहराई में जाकर समाजवाद की भारतीय राष्ट्रवादी परंपरा और साम्यवादी परंपरा की दोनों धाराओं को समझना होगा।
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आचार्य नरेंद्र देव का मानना है कि, 'समाजवादी लोग वर्ग -संघर्ष को पैदा नहीं करते और न ही उसको पसंद करते हैं। उनका उद्देश्य तो समाज में ऐसी व्यवस्था करना है जिसमें परस्पर विरोधी वर्गों और उनमें निरंतर चलने वाले संघर्षों का अंत हो जाए।'
महात्मा गांधी ने 1937 में हरिजन में लिखा था कि सच्चा समाजवाद तो हमें अपने पूर्वजों से प्राप्त हुआ है, जो हमें सिखा गए हैं: "सब भूमि गोपाल की है, इसमें कहीं मेरी और तेरी की सीमाएं नही हैं। आधुनिक भाषा में गोपाल यानी राज्य अर्थात जनता। आज जमीन जनता की नही है। पर इसमें दोष किसी और का न होकर हमारा है। हमनें उनकी शिक्षा के अनुसार आचरण नहीं किया। स्वदेशी अपनाकर और ग्राम्य अर्थव्यवस्था के जरिए भी पूंजीवालों से उनकी पूंजी छीनी जा सकती है, इसके लिए हिंसा का सहारा लेना आवश्यक नहीं है।"