भारतीय 'दर्शन' संसार में प्रसारित न हो सके, इसके लिए पश्चिम के दार्शनिकों ने उसे 'धर्म' की श्रेणी में डाल दिया। इससे भारतीय दर्शन के संबंध में अवैज्ञानिकता का संदेश दुनिया में फैला। विदेशों में भारतीय दर्शन की पढ़ाई दर्शन के अधीन नहीं बल्कि धर्म के अधीन करवाई गई। जबकि भारतीय दर्शन (न्याय, सांख्य, योग, वैशेषिक, मीमांसा, वेदांत, जैन, बौद्ध, चार्वाक) का प्रमुख लक्ष्य धर्म और देवत्व का उल्लेख करना नहीं है। यह जीव, जगत, पदार्थ, तत्त्व का मूल ज्ञान कराकर व्यक्ति को दैहिक, भौतिक और आत्मिक सुख प्रदान करता है।
धर्म को दर्शन में जबरदस्ती शामिल करने की कोशिश करने वाले भी पश्चिमी ही थे। सेंट ऑगस्टिन के समय। जैन, बौद्ध और चार्वाक को छोड़ सभी दर्शन वेदों में विश्वास करते हैं। याद रहे, दयानंद सरस्वती का संपूर्ण चिंतन इसी पर आधारित है कि वेदों में किसी अवतारवाद, धर्म, मूर्तिपूजा और अंधविश्वास का वर्णन नहीं है। उन्होंने सामाजिक कुरीतियों और पाखंड के विरुद्ध लड़ते हुए 'वेदों की ओर लौटो' का नारा दिया। ये समस्त दर्शन भारतीय तर्क प्रणाली की पद्धतियां हैं। पश्चिमी दर्शन के तर्क का मूल आधार अरस्तू का 'तर्क' है। महर्षि गौतम के न्यायदर्शन में तर्क की अवधारणा अरस्तू के तर्क की अपेक्षा कहीं विस्तृत है।
भारत का सांख्य दर्शन 'चेतना' के प्रत्येक स्तर की बात करता है। जैसे - व्यक्तिक, पारिवारिक, सामाजिक, राष्ट्र और मानवीयता इत्यादि। जबकि मार्क्स केवल वर्गीय चेतना तक स्वयं को समेट लेते हैं। फ्रायड केवल 'उपस्थिति' तक सीमित है, जबकि भारतीय न्याय-वैशेषिक 'अभाव' की भी बात करता है। 'चेतना' को जितनी गहराई से कणाद और बुद्ध ने समझा, उतना फ्रायड ने भी नहीं। बुद्ध और गौतम के समर्थकों के मध्य हुए संवाद से जो नया थॉट उभरा, उसने भी भारत के तर्कशास्त्र, न्यायशास्त्र और प्रमाणविधि को आगे बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई। अमर्त्य सेन के एक रिलेटिव भी इसी स्कूल (थॉट) से संबंध रखते थे। इसका जिक्र सेन ने अपनी एक किताब में किया है।
फ्रायड के एक विद्यार्थी भारत आए थे। उन्होंने कहा कि भारत में 'चेतना' की समझ पश्चिम से कहीं अधिक विशाल है। उनके इस बयान से जर्मनी की संपूर्ण साइको-एनालिटिकल कम्युनिटी नाराज हो गई, और उनका सर्टिफिकेट तक रद्द करने की बात कह दी। अंततः उन्हें अपना यह बयान वापस लेना पड़ा और कहा कि भारत में मैंने जो कहा या लिखा वह अतिवाद था, गंभीर नही था।
ऐसा ही इंग्लैंड के दार्शनिक रॉय भास्कर के साथ हुआ, जब सन् 2000 में लिखी अपनी किताब में उन्होंने दुनिया की फिलोसॉफी को भारत की फिलोसॉफी के साथ जोड़कर प्रस्तुत किया। रॉय की किताबों के आधार पर पश्चिम में वैचारिक आंदोलन भी चला। पर, जब उन्होंने यह किया तो पश्चिम के दार्शनिकों का नाराज होना स्वाभाविक था। पश्चिमी चिंतकों ने उनकी इस किताब को उनका आध्यात्मिक मोड़ करार दे दिया। अंततः रॉय को भी अपनी लिखी बातों का खण्डन करना पड़ा। हालांकि, कुछ भारतीय विद्वान रॉय की 'मेटा रियलिटी' को महान भारतीय दार्शनिक श्री अरविंद का ही दर्शन बताते हैं। पर, श्री अरविंद को रॉय ने कहीं उल्लेखित नही किया है। शायद इसलिए कि कहीं उन पर गैर -अकादमिक और गैर -दार्शनिक होने का संभावित आरोप न लग जाए! क्योंकि पश्चिमी चिंतक भारतीय फिलोसॉफी को धर्म के चश्मे से ही देखा करते हैं।
राज दार्शनिक बनने के लालच में फ्रेडरिक हीगल ने भी यहीं काम किया। सत्ता समर्थित दार्शनिक होते ही भारतीय दर्शन से प्रभावित जर्मन दार्शनिकों को उन्होंने किनारे लगा दिया। ब्रिटेन के चिंतकों ने भी मैकाले से ऐसे बयान दिलवाये जिससे भारतीय दर्शन दुनिया में हल्का साबित हो गया। अंग्रेजी भाषा का कीड़ा काटे हुए व भारतीय चिंतन परंपरा से घृणा करने वाले बहुत-से भारतीय लोगों ने भी मैकाले का समर्थन करना शुरू कर दिया। आधुनिक विश्वविद्यालयों की शुरुआत औपनिवेशिक काल में होने के चलते भारतीय दर्शन को अवैज्ञानिक बताते हुए इसे पाठ्यक्रमों में शामिल करने से भी मना कर दिया गया।
यदि किसी भारतीय दार्शनिक को वैश्विक दार्शनिक के रूप में मान्यता लेनी होती है, तो उसे वहीं कहना पड़ता है जो पश्चिमी दार्शनिक भारत के दर्शन के संबंध में कहते आए हैं। दुनिया के हर कोने में व्यक्ति का स्वभाव भिन्न-भिन्न होता है। इसलिए आवश्यक नहीं कि व्यक्ति के 'स्वभाव और व्यवहार' का जो वर्णन पश्चिमी चिंतकों ने किया है, वही भारत में भी सही मान लिया जाए। प्लेटो, हॉब्स,लॉक, रूसो ने व्यक्ति को स्थिर करके समझा, जबकि भारतीय दार्शनिकों ने गतिशील। पश्चिम के इन समझौतावादी दार्शनिकों ने व्यक्ति के एक ही स्वभाव पर अपनी पूरी फिलोसॉफी खड़ी कर दी, जबकि हमारे यहां भारतीय दर्शन में व्यक्ति के स्वभाव के संबंध में तीन गुण, चार पुरुषार्थ और छह विकारों का वर्णन है।