डेकार्ट फ्रांस के एक गणितज्ञ और दार्शनिक थे। उनके दर्शन का एक प्राणवाक्य है - I doubt, therefore I think, therefore I am. अर्थात् मैं सोचता हूं; इसलिए मैं हूं। लेटिन में इसे cogito ergo sum लिखा जाता है। वह दर्शन के क्षेत्र में प्रत्येक प्रकार के संदेह को दूर करना चाहते थे। इसलिए उनका मानना था कि तब तक संदेह करो,जब तक संदेह की गुंजाइश समाप्त न हो जाए। जैसे 2+3=5 पर कोई संदेह नहीं कर सकता। डेकार्ट ने स्वयं पर संदेह करके और संदेह न करके स्वयं को संदेहमुक्त सिद्ध कर दिया। क्योंकि जब कोई स्वयं पर संदेह करता है, तब भी संदेहकर्त्ता की आवश्यकता पड़ती है और जब नही करता तब भी। वह संदेहकर्त्ता कोई और नही बल्कि 'मैं' होता है। इसलिए सोचने से सोचने वाले की अर्थात् 'मैं' की सत्ता और अस्तित्व अपने आप सिद्ध हो जाता है।
डेकार्ट ने इस 'मैं' को आत्मतत्त्व कहा है,जो संदेह से परे है। इसे सिद्ध करने के लिए किसी तथ्य या प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती। इस तरह उन्होंने चिंतन को आत्मा से और आत्मा को ईश्वर से जोड़कर ईश्वर को स्वयंसिद्ध माना। हमारे यहां की समझ में वह आत्मतत्त्व आत्मा कहलाता है। अर्थात् डेकार्ट ने आत्मा के अस्तित्व को स्वयंसिद्ध माना है। यूनानी दार्शनिक प्लेटो भी आत्मा के अस्तित्व को स्वीकार करते है। डेकार्ट का यह वाक्य उनकी ज्ञानमीमांसा का प्राणवाक्य है। यहीं से वे अपने तत्त्वमीमांसा की शुरुआत करते हैं ।
वाचस्पति मिश्र नामक भारत के एक दार्शनिक हुए। उन्होंने कई दर्शनों पर भाष्य लिखे। नव्य-न्याय नामक दर्शन परंपरा का आधार भी उन्होंने तैयार किया, जिसे उनके बाद बिहार में मिथिला के नव्य-न्यायिकों ने आगे बढ़ाया। वाचस्पति ने अपनी फिलोसॉफी के माध्यम से 'मैं' अर्थात् आत्मा को संदेह से परे सिद्ध किया। उनका एक कथन है - "न हि कश्चित संदिग्धेअह्म वा नह्म वा इति।" अर्थात् किसी को यह संदेह नहीं होता कि मैं हूं या नहीं हूं। यदि कोई कहता है कि मैं आत्मा को नही मानता,तो ऐसा कहने के लिए भी उसका होना जरूरी है। यदि आप आत्मा को नही मानते, तो भी आप रहेंगे। आपके न मानने से आत्मा का नाश नही हो जायेगा और न उसमें कुछ परिवर्तन ही होगा।
जब हम आत्मा के होने या न होने को लेकर किसी से पूछते हैं, तो हां या ना में हमें उत्तर मिलते हैं। परंतु किसी से भी पूछो कि तुम हो या नहीं? सबसे एक ही उत्तर मिलेगा। हां, मैं तो हूं ही। यदि नहीं होता तो कौन कहता कि मैं नही हूं। अर्थात् सब पर संदेह किया जा सकता है, किंतु अपने होने पर नही। स्वयं हैं तभी तो कह रहे हैं कि मैं आत्मा को नही मानता। यह 'मैं' आत्मतत्त्व ही है जो संदिग्धता से परे है। डेकार्ट भी इसी आत्मतत्त्व की बात करते हैं। कठोपनिषद में भी कहा गया है कि आत्मा को न वाणी से पाया जा सकता है, न आंखों से। स्वयं का होना ही आत्मा के होने का प्रबल प्रमाण है। 'मैं' ही इंद्रियों का प्रेरक है, और मेरा होना ही आत्मा का होना है।
भारतीय दार्शनिकों का मानना है कि जर्मन लेबनिज जिस मैटेरिया प्राइमा को आत्मसाक्षात्कार में बाधक मानते हैं, हमारे यहां वेदांत में शंकराचार्य ने उसे माया या मिथ्या कहा है। वेदांत जिस शाश्वत सत्ता की स्थापना करता है, वहीं बात इटली के जेनो कहते हैं। हमारे यहां बौद्ध दार्शनिक जिस क्षणिकवाद की बात करते हैं, यूनानी दार्शनिक हेराकलिटस का भी वहीं मानना है। यदि हम किसी द्रव्य का विभाजन करते जाएं तो अंत में हमें एक ऐसी इकाई प्राप्त होती है जिसका विभाजन संभव नहीं। यहीं अविभाजित इकाई परमाणु कहलाती है। इसका ज्ञान इंद्रियों से नही हो सकता, इसलिए इसे अतिंद्रीय कहा जाता है। इस आण्विक सिद्धांत पर जो मत भारतीय दार्शनिक महर्षि कणाद का है, वहीं प्राचीन यूनान के सुकरात-पूर्व दार्शनिक डेमोक्रिटस का है।
भारतीय सांख्य दर्शन की 'अव्यक्त प्रकृति' ही जर्मन दार्शनिक इमेनुअल कांट का अज्ञेयवाद है। भारतीय दर्शन के अनुसार ज्ञाता कभी ज्ञान का विषय नहीं हो सकता। यहीं बात कांट स्वीकार करता है। हीगल ने भी कभी कांट को पूरी तरह नकारा नहीं, बस उन्होंने कांट के इस द्वैत को अपनी फिलोसॉफी में शामिल करने से इंकार कर दिया।