गुरु गोविंद सिंह और दसम ग्रंथ

गुरु गोविंद सिंह को सिख धर्म का पूरक माना जाता है। उन्होंने खालसा समुदाय बनाया और सिखी के पांच चिन्ह प्रदान किए। पाहुल संस्कार भी उन्होंने ही आरंभ किया। धर्म की रक्षा के लिए सिख धर्म ने कई बलिदान दिए। गुरु गोविंद सिंह सिखों के दसवें गुरु हैं। उन्होंने सन् 1675 से लेकर 1699 तक एक बहुत ही विस्तृत साहित्य लिखवाया, जिसे दसम ग्रंथ के नाम से जाना जाता है। आदि ग्रंथ पांचवे गुरु के समय रचा गया। इसमें नानक जी की वाणी को प्रमुखता से लिखा गया, जो प्रेम व भक्ति पर आधारित थी।




लगभग दो सौ वर्षों तक इस दसम ग्रंथ का आदि ग्रंथ के साथ सभी गुरुद्वारों में पाठ होता रहा। बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में सिखों ने एक सभा बनाई और दसम ग्रंथ को गुरुद्वारों से हटाने का अभियान आरंभ कर दिया। दसम ग्रंथ में भारत के जिन आदर्श पुरुषों का वर्णन है उनकी मूर्तियां गुरुद्वारों में स्थापित थी। उन मूर्तियों को भी गुरुद्वारों से हटाने का निर्णय ले लिया गया। 

दसम ग्रंथ केवल वीर रस से भरा हुआ है। मरे हुए इंसान में जोश भर देने का नाम है दसम ग्रंथ। वैदिक धर्म के 24 अवतारों का इसमें वर्णन है। प्रत्येक अवतार के सौम्य रूप की अपेक्षा रौद्र रूप को इसमें महत्त्व दिया गया है। चंडी चरित्र और शिव का रुद्र अवतार प्रमुख हैं। मुगल आतंकी औरंगजेब को चेतावनी देता एक अध्याय भी है, जो फारसी में लिखा गया है। एक अध्याय पंजाबी भाषा में है। बाकी का सारा ग्रंथ बृज भाषा में लिखित है। ऐसा सुनने में आता है कि आज दसम ग्रंथ का पाठ पंजाब के किसी गुरुद्वारे में नही होता! पटना साहिब और हजूर साहिब में ही इस दसम ग्रंथ का पाठ किया जाता है! जबकि गुरु गोविंद सिंह के बिना सिख धर्म पूरा ही नही होता। उन्होंने सिखी को प्रेम व भक्ति से मोड़कर पराक्रम के रास्ते पर ला दिया। 

जब धर्म पर आंच आई हो तो संन्यास का सहारा लेकर मोक्ष प्राप्ति के लिए तप करने के समर्थक गुरु गोविंद सिंह कदापि नहीं थे। एक बार गोविंद सिंह जी ने गोदावरी नदी के किनारे एक संन्यासी को तपस्या करते हुए देखा। उस संन्यासी का नाम माधो सिंह बैरागी था, जिसने दस साल की आयु में ही तपस्वी बनने के लिए घर छोड़ दिया था। गुरु गोविंद सिंह ने उससे कहा कि आज सारा देश मुगलों के अत्याचारों से पीड़ित है। मुगलों की राजसत्ता से प्रश्न करने का किसी को कोई अधिकार नहीं। मुगलों की गुलामी को भारत की जनता ने अपनी नियति मान लिया है। सारा देश थक हार कर बैठ गया है। बच्चों व निहत्थे लोगों को काटा जा रहा है, औरतों का सम्मान लूटा जा रहा है और तुम यहां मोक्ष प्राप्ति के लिए तप कर रहे हो। यह कोई शौर्य नही बल्कि बहुत बड़ी कायरता है। तुम्हारे ईश्वर ऐसे तप से कदापि प्रसन्न नही होंगे। गुरु गोविंद सिंह ने ओजस्व व वीरता से भरा उपदेश देकर उसकी सोई हुई आत्मा को जगा दिया। वही संन्यासी बाबा बंदा सिंह बहादुर बनकर उठ खड़ा हुआ।

मुगल काल में नैतिक और मानसिक रूप से बिल्कुल निस्तेज हो चुकी भारत की जनता में जोश भरने के लिए, उनकी सोई हुई आत्मा को जगाने और मुगल राजसत्ता से भिड़ जाने के लिए उन्होंने दसम ग्रंथ में चंडी चरित्र व शिव के रुद्र रूप को जनता के सामने प्रस्तुत किया। उन्होंने आह्वान किया कि इस तरह की गुलामी में जीने से तो मर जाना अच्छा है। यूरोप में पुनर्जागरण के समय भी बुद्धिमान लोगों ने वहां के प्राचीन आदर्शों को जनता के बीच स्थापित किया। इस तरह से नैतिक रूप से मरे हुए लोगों को जिंदा कर लड़ने को तैयार कर देने का नाम दसम ग्रंथ है, जिसे गुरुद्वारों से हटा देने का काम किया गया। 

वैदिक धर्म का ग्रंथ गीता भी हमें यही सिखाता है। जब भारत शारीरिक और मानसिक रूप से अंग्रेजों के पराधीन हो चुका था, अंग्रेजों की गुलामी को यहां की जनता ने अपना भाग्य समझ कर स्वीकार कर लिया था, तब अरविंद , तिलक और गांधी जैसे महापुरुषों ने गीता पर अपने भाष्य लिखे। चंद्रशेखर आजाद और बिस्मिल जैसे क्रांतिकारियों के हाथों में गीता देखी जाने लगी। स्वतंत्रता सेनानियों का स्वाभिमान जगा और राष्ट्रीय आंदोलन की एक नई लहर ने जन्म लिया। जनता में क्रांति फूटी, जिसने समूचे भारत को एकता में बांधकर अंग्रेजों के विरुद्ध खड़ा कर दिया। गीता का मूल संदेश भी यही है कि अपकीर्त होकर जीने से मर जाना अच्छा है। जब युद्ध के मैदान में अर्जुन शक्तिहीन और निस्तेज हो चुका था, तब श्रीकृष्ण ने समूची मानवजाति को यहीं संदेश दिया था।

 " क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं " हे पार्थ! तुम वीरों की जाति के हो, इसलिए हृदय की इस तुच्छ दुर्बलता को त्यागो और युद्ध के लिए खड़े हो जाओ। 

 यहीं संदेश सिखों के दसम ग्रंथ का है।