जॉर्ज फ्रेडरिक हीगल को दर्शनशास्त्र का पितामह कहा जाता है। उन्होंने यूनानी दार्शनिक प्लेटो से लेकर जर्मन दार्शनिक कांट तक में जो कुछ भी अच्छा लगा, ग्रहण किया। हीगल की बैचलर डिग्री पर लिख दिया गया था कि वह इकोनॉमिक्स में इंटेलिजेंट है, पर फिलोसॉफी में जीरो। उनके बारे में कहा गया कि यह विद्यार्थी कभी दार्शनिक नही बन सकता।
किंतु, हीगल को समय का यह रिजल्ट स्वीकार नहीं था। अपनी कुशाग्र बुद्धि और कठोर परिश्रम के दम पर यही व्यक्ति आगे चलकर समूची दुनिया का प्रसिद्ध फिलॉसफर बना। और जीवन के अंत तक बर्लिन यूनिवर्सिटी में फिलोसॉफी के प्रोफेसर रहे। दर्शन के प्रति इतने गहन व रूचिपूर्ण लगाव और उस दौर के फिक्टे तथा शेलिंग जैसे प्रकांड विद्वानों के सम्पर्क ने हीगल को संपूर्ण विश्व के दार्शनिकों की पंक्ति में सबसे आगे खड़ा कर दिया। उनके बारे में कहा गया कि हीगल दार्शनिकों का राजा और राजाओं का दार्शनिक था।
19वीं शताब्दी के अंत में अमेरिका तथा इंग्लैंड का बड़े-से-बड़ा दार्शनिक हीगल का अनुयायी हुआ करता था। एक समय दुनिया का हर दसवां व्यक्ति जिस फिलॉसफर से प्रभावित हुआ, वो कार्ल मार्क्स भी इन्हीं हीगल का शिष्य था। विद्वानों और स्टूडेंट्स के बीच इनकी फिलोसॉफी पर चर्चा करना उस दौर में एक फैशन-सा बन गया था। कोई भी फिलॉसफर अपनी विद्वता की छाप तब तक नहीं छोड़ पाता था, जब तक वह ये सिद्ध न कर दे कि उसने हीगल के ग्रंथों को पढ़ा है
उनकी किताब 'साइंस ऑफ लॉजिक' को समझने में शोपेनहावर जैसे फिलॉसफर तक मात खा गए। उस दौर में हीगल की आलोचना करना लगभग असम्भव था! उनकी आलोचना करने में विद्वानों ने भारतीय दर्शन का भी सहारा लिया। क्योंकि हीगल जिनके लेक्चर में बैठा करते थे, उनकी फिलोसॉफी में भारतीय न्याय दर्शन की झलक दिखलाई पड़ती है। जर्मनी को खड़ा करने में कांट का योगदान अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जाता है, पर हीगल ने कांट पर भी प्रश्न चिह्न लगा दिया और स्वयं जर्मनी के राष्ट्रीय दार्शनिक कहलाए। हीगल जहां खड़े हो जाते थे, विद्यार्थियों और विद्वानों की भीड़ उन्हें वहीं घेर लेती थी।
हीगल के पिता उन्हें धर्मशास्त्री बनाना चाहते थे। पर, उन्हें तो फिलॉसफर के रूप में ख्याति अर्जित करनी थी। दार्शनिकों के खेमे में हीगल से कार्ल मार्क्स, ग्रीन और बोसंके, इतिहासकारों में ट्रॉटश्की और ट्रॉयसेन तथा विधिशास्त्रियो में सैविगनी जैसे विचारक अत्यंत प्रभावित हुए। उन्होंने राज्य नामक संस्था को सर्वप्रभुसत्ताधारी स्वरूप प्रदान किया। फासीवाद और नाजीवाद जैसी विचारधाराओं को हीगल के इसी सिद्धांत का परिणाम समझा जाता है! शायद, इसी लिए जर्मनी के हिटलर और इटली के मुसोलिनी जैसे कट्टर देशभक्तों को हीगल का मानस पुत्र भी कह दिया जाता है।
हालांकि, यह सच नहीं है। क्योंकि राज्य को इस तरह की शक्ति पूर्व में ब्रिटिश दार्शनिक हॉब्स भी दे चुके थे। सामंतवाद के धुर विरोधी हीगल ने नेपोलियन बोनापार्ट को विश्वात्मा की संज्ञा दी थी। हालांकि, सन् 1806 में हीगल जिस जीना यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर थे, उसे नेपोलियन ने उस समय अपने जर्मनी आक्रमण के दौरान तहस-नहस कर दिया था। तब नेपोलियन ने जर्मनी को परास्त किया था। जीना यूनिवर्सिटी उस समय सांस्कृतिक पुनरुत्थान का केंद्र थी।
कांट का नाम दर्शन के इतिहास में बड़े आदर से लिया जाता है। उन्होंने ईश्वर को बुद्धि की परिधि से बाहर रखा। किंतु, हीगल वो दार्शनिक था जिसने ईश्वर को भी बुद्धि के कठघरे में ला खड़ा किया। द्वैत और अद्वैत को लेकर दोनों के विचारों में बहुत टकराव था। हीगल के दर्शन में उग्र-राष्ट्रवाद भी समाहित है। हीगल इसी राष्ट्रवाद को राजनीतिक शक्ति का सजीव प्रतीक मानते थे। वेदांत का तत्वमसि: ही हीगल का विश्वात्मा है। उन्होंने राज्य के रूप में जनता को ईश्वर के दर्शन कराए। विश्वात्मा की गतिशीलता को अभिव्यक्त करने वाली पद्धति को उन्होंने द्वंद्व प्रक्रिया का नाम दिया। यही द्वंद्व प्रक्रिया हीगल के समूचे राजनीतिक दर्शन का मूल आधार है। कार्ल मार्क्स ने इसी द्वंद्व को पकड़ अपने दर्शन में बिठा लिया, और इसे एक युगांतरकारी खोज कहा। मार्क्स का संपूर्ण समाजवाद इसी सिद्धांत पर टिका है।
उनकी पुस्तकों में दर्शन, अध्यात्म, राजनीति, इतिहास, नीति और कला का बेजोड़ रूप देखने को मिलता है। हीगल की सभी रचनाएं उनकी विलक्षण प्रतिभा का प्रतिबिंब हैं। यह दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि उनका दर्शन समझने में काफी कठिन और भाषा की दृष्टि से भी कलिष्ट है। हीगल का दर्शन राह चलते व्यक्ति को समझ आने वाला दर्शन बिलकुल भी नही है। महान जर्मन फिलोसॉफर शोपेनहावर ने हीगल की पुस्तक 'साइंस ऑफ लॉजिक' के बारे में कहा कि, 'यह इतनी कठिन थी कि मैं इसे पूरी पढ़ ही नही पाया।' दर्शन के माध्यम से धर्म और विज्ञान की खाई को पाटने का हीगल ने जो प्रयास किया वह अत्यंत सराहनीय था।
हीगल ने जिस भी विषय को छुआ, उसी पर अपनी छाप छोड़ दी। अपने बारे में की गई दार्शनिक न बनने की भविष्यवाणी को उन्होंने पूरी तरह से गलत सिद्ध कर दिया। तर्क, बुद्धि और विवेक की नींव पर हीगल ने जो दर्शन खड़ा किया, उस समय वह समूची दुनिया पर हावी रहा। हीगेलियन दर्शन का उन दिनों कोई विकल्प नहीं था। हीगल सदैव अपनी इस बात पर अटल रहे कि 'बुद्धि ही विश्व पर शासन करती है।'