सन् 1792 में पहली बार महिला अधिकारों की आवाज उठाने के लिए मैरी वॉलस्टेनक्राफ्ट का मजाक उड़ाया गया था। ठीक ऐसा ही मजाक आधुनिक पशु अधिकारों की रक्षा और मांसाहार के खिलाफ आवाज उठाने के लिए पीटर सिंगर नाम के एक युवा का बना। सन् 1971 में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में स्नातक के कुछ-एक विद्यार्थियों ने आधुनिक पशु अधिकार को लेकर आंदोलन किया। उन्हीं में से पीटर सिंगर भी एक थे। वे ऑस्ट्रेलिया में जन्में हैं। अब प्रोफेसर और मॉरल फिलॉसफर हैं। 1975 में आई अपनी पुस्तक 'एनिमल लिबरेशन' में उन्होंने अपने इन विचारों को प्रस्तुत किया। तब उनका बहुत उपहास उड़ाया गया। अब उस किताब का नया संस्करण 'एनिमल लिबरेशन नाउ' नाम से आया है।
मीडिया का सहयोग भी
पीटर सिंगर प्रिंसटन यूनिवर्सिटी में बायो-एथिक्स के प्रोफेसर हैं। अमेरिका में पशु अधिकार और शाकाहार की निरंतर आवाज उठाने के साथ वे दुनिया के सबसे चर्चित पत्र 'द न्यूयॉर्क टाइम्स' में लेख भी लिखते हैं। यह उदारवादी बुद्धिजीवी वर्ग का तो मुखपत्र माना ही जाता है, इसके अतिरिक्त यह वहां विपक्षी पार्टी से भी बढ़कर काम करता है। अश्वेतों, महिलाओं, अल्पसंख्यकों, पशु अधिकारों और नए-नए सामाजिक मुद्दों के लिए होने वाले आंदोलनों में इस पत्र की बड़ी भूमिका पूर्व में भी रही है और अब भी है। आरंभ से ही यह वहां की सरकारों को भी प्रभावित करता रहा है। कुछ दिन पहले इसी पत्र में पीटर सिंगर का 'फिक्स यॉर डाइट, सेव द प्लैनेट' नाम से लेख छपा था। और न्यूयॉर्क टाइम्स जैसा पत्र ऐसे लेख छाप रहा है तो इसका मतलब ये भी है कि यह विषय बहुत गंभीर है।
यह व्यक्तिगत चॉइस का मसला नही
वे लिखते हैं कि हम एक तरफ स्वयं को सभ्य कहकर दूसरी तरफ पशुओं का मांस खाकर उनके साथ असभ्य व्यवहार नही कर सकते। वे जोर देकर कहते हैं कि मांसाहार करना व्यक्तिगत चॉइस नही है। यह प्लैनेट और क्लाइमेट चेंज से जुड़ा मुद्दा है। उन्होंने कहा कि यदि क्लाइमेट चेंज भी कारण नही होता, तो भी मेरे लिए नैतिक कारण ही काफी था कि मैं मांस खाना छोड़ दूँ। वे लिखते हैं कि 1970 में जब मैंने मांस खाना छोड़ा तो मेरे दिल में पशुओं के प्रति प्रेम था। वे समूची मानवता को आगाह करते हुए कहते हैं कि जब तक कोई बड़ी महामारी नही फैल जाती, तब तक मनुष्य जागने वाला नही। इसलिए, यदि समय रहते हम सब संभल जाएं तो इसमें कोई दिक्कत नही।
आय का बड़ा हिस्सा जानवरों को समर्पित
पीटर सिंगर को साल 2021 में बर्गग्रेन पुरस्कार से सम्मानित किया गया। दर्शन और संस्कृति के लिए दुनिया को बदलने की दिशा में काम करने वाले को यह पुरस्कार प्रतिवर्ष बर्गग्रेन संस्था द्वारा प्रदान किया जाता है। प्रो. सिंगर ने इस पुरस्कार के रूप में मिली एक मिलियन अमेरिकी डॉलर को राशि को दान कर देने का फैसला लिया। पुरस्कार की आधी राशि दुनिया में सबसे गरीब लोगों को लाभ पहुंचाने वाली एक चैरिटी संस्था (द लाइफ यू कैन सेव) को और आधी राशि पशु अधिकारों हेतु काम करने वाले संगठनों को दान की। यह संस्था स्वयं पीटर सिंगर द्वारा स्थापित है। इसी नाम से 2009 में उन्होंने एक किताब भी लिखी है। ह्यूमैनिटी एंड सोशल साइंस के लिए भी 2022 में उन्हें पुरस्कार मिल चुका है। प्रो. सिंगर अपना अधिकांश समय और आय पशु अधिकार, अकाल व गरीबी और पर्यावरण की रक्षा हेतु समर्पित करते हैं। पशु अधिकार आंदोलन में उनके बौद्धिक नेतृत्व ने उनको समूची दुनिया के व्यापक रूप से मान्यता प्राप्त सार्वजनिक बुद्धिजीवियों की श्रेणी में स्थापित कर दिया।
अधिकार जानवरों के भी हैं
दो बार पुलित्जर पुरस्कार प्राप्त कर चुके और 2001 से 'द न्यूयॉर्क टाइम्स' के स्तंभकार निकोलस क्रिस्टोफ कहते हैं कि पीटर सिंगर से प्रभावित होकर मैंने भी पिछले कई सालों से मांसाहार पर बहुत अधिक नियंत्रण कर लिया है। और संभवतः पीटर सिंगर के फैलते विचारों का ही परिणाम है कि इंग्लैंड की लगभग 2% और अमेरिका की 3-5% आबादी शाकाहारी बन गई है। अमेरिका के कई राज्यों में पशु अधिकार के प्रति व्यापक जागरूकता फैली है। कुछ समय पहले अर्जेंटीना की एक अदालत ने भी स्वीकार किया कि बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) का अधिकार चिपैंजी पर भी लागू होता है। पशु अधिकारों पर मतदाताओं द्वारा जनमत संग्रह (रिफ्रेंडम) किया जाता है।
दुनिया तब बदलेगी जब हम बदलें
हमारे यहां भारत के बुद्धिजीवियों का तो अलग ही स्टैंडर्ड होता है। उन्हें पर्यावरणविद भी बनना है और बीफ भी खाना है। शाकाहार का संदेश देने वालों को सड़ियल और सिक मेंटेलिटी कहने वाले लोग सामाजिक बदलाव की पहली शर्त ही नही जान पा रहे। 'आधी से ज्यादा दुनिया मांस खाती है' , 'दुनिया बदलेगी तब हम बदलेंगे' तथा 'दुनिया को मांस खाने से दिक्कत नही तो हमें भी नही' की लीक पर चलने वाले समझ लें कि जो बदलाव आप समाज में लाना चाहते हैं, पीटर सिंगर की तरह वो बदलाव पहले स्वयं में लाएं। प्रो. पीटर भी पहले मांसाहारी थे। दुनिया में बदलाव लाने के लिए 1970 में उन्होंने मांसाहार का त्याग किया। उस बदलाव का असर आज भले ही कम हो, पर दिख अवश्य रहा है। दुनिया का क्या है? आज से 500 साल पहले तक सारी दुनिया यह मानती थी कि सूर्य पृथ्वी का चक्कर लगाता है।