मेवात के आर्थिक पिछड़ेपन पर बात क्यों नही

मेवात के 50 प्रतिशत क्षेत्र पर सिंचाई की कोई उचित व्यवस्था नही है। यहां 35 प्रतिशत भूमि पर ट्यूबवेल से सिंचाई होती है, किन्तु यह पानी खारा है। और 15 प्रतिशत क्षेत्र पूरी तरह बारिश पर निर्भर है। जिस भूमि पर सिंचाई की उचित व्यवस्था नही है वही क्षेत्र कृषि के योग्य है। अर्थात उपजाऊ जमीन होते हुए भी उचित व्यवस्था के अभाव में आधे क्षेत्र को बंजर रहना पड़ रहा है। बीस-पच्चीस साल पहले मेवात में कुछ नहरों का निर्माण हुआ था। कई सरकारें आई और गई, पर उन नहरों में आज तक पानी नही आ पाया। अन्य दूसरी नहरों से मेवात को जितना पानी मिलना चाहिए, उसका बीसवां हिस्सा भी मुश्किल से मिल पाता है। आधे मेवात ने आज तक नहर का पानी नही देखा। 



2018 में नीति आयोग की रिपोर्ट में देश के सबसे पिछड़े जिलों में मेवात पहले स्थान पर रहा। हरियाणा के सबसे कम साक्षर जिलों में भी मेवात पहले स्थान पर है। महिलाओं का हाल और भी बुरा है। यहां 100 में से मात्र 33 महिलाएं ही शिक्षित हैं। पिछड़ेपन की स्थिति यह है कि एक परिवार की प्रति व्यक्ति आय 45 रुपए है। शिक्षा नही है तो लोगों को प्राइवेट नौकरी करने में भी दिक्कतें आ रही हैं। गरीब बीमार व्यक्ति मरने की दुआ ज्यादा करता है,क्योंकि पैसों के अभाव में इलाज नहीं करा पाता। 


इन्हीं खराब हालातों के चलते यह अपराध और अवैध घुसपैठ का अड्डा बनता जा रहा है। अवैध घुसपैठ से इस क्षेत्र का अपना भी नुकसान हो रहा है। दुःख की बात ये है कि ऐसी मांग क्षेत्र के लोगों द्वारा भी बहुत कम उठाई जाती हैं। यह कड़वा सच है कि इन मांगों के प्रति यहां के लोगों का रवैया उदासीन रहा है। शिक्षा और जागरूकता ही अपराध के इस जाल से यहां के लोगों को बाहर निकाल सकती है। 


किसी के पास तो जमीन नही है। जिसके पास है वह खेती करना नही चाहता, क्योंकि लागत अधिक है और मुनाफा कम। ये हालात न कभी किसी सरकारों को दिखाई दिए, न सामाजिक संगठनों को और न ही किसी प्रगतिशील बुद्धिजीवी जमात को। किसान आंदोलन में तो ये मांगें उठती ही कहां, आंदोलन समाप्त होने बाद भी आज तक मेवात की इस कृषि समस्या पर किसी किसान नेता ने कोई ब्लूप्रिंट तक तैयार नहीं किया। जैसे ही बड़े किसान नेताओं से भूमिहीन किसान और जमीन के समान बंटवारे के बारे में सवाल पूछा जाता है, वैसे ही उनकी किसानी उतर जाती है और उनपर जमींदारी सवार हो जाती है। दिखावटी जातीय भाईचारा अलग बात होती है। हिस्से के पानी और जमीन के बंटवारे पर बड़े-बड़े भाईचारे टूटते देखे हैं। 


बुद्धिजीवी तबके की दुकान भी इन मुद्दों पर नही चलती। उसे भी चलने के लिए जाति-धर्म के ग्राहक चाहिए होते हैं। तभी वो माइक लेकर अपने लश्कर के साथ वहां पहुंचते हैं। अन्यथा नहीं। अभी हुई हिंसा के अगले दिन हालात का जायजा लेने वहां योगेंद्र यादव अवश्य पहुंचे थे। बाकी कोई अपने को राष्ट्रीय स्तर का बुद्धिजीवी कहने वाला वहां नही गया। महिलाओं की स्थिति इतनी गंभीर होने के बावजूद कोई नारीवादी संगठन या मानवाधिकार एक्टिविस्ट वहां ढूंढने को नही मिलते। क्या मेवात देश से कोई अलग हिस्सा है ? सच्चाई यह है कि इन ह्यूमन राइट्स से जुड़े लोगों को भी अपना फायदा-नुकसान देखना होता है। 


ताजा घटना ने सरकारी प्रशासन को फेल कर दिया। सरकार विफल रही। राज्य के उपमुख्यमंत्री, गृह विभाग के मंत्री और सत्ताधारी पार्टी के अध्यक्ष कह रहे हैं कि उन्हें सूचना का सही आंकलन देने में अति विलंब किया गया। यदि आपके अधिकारी समय पर सूचना नही दे पा रहे तो यह सरकार का ही फेल्योर कहा जायेगा। विपक्ष के जिस विधायक(मेवात क्षेत्र) ने विधानसभा के पटल पर जो भड़काऊ बयान दिया, घटना के बाद गिरफ्तार हुए लोगों को छुड़ाने के लिए क्या वह पहुंचा? उसका काम सिर्फ वहीं तक था। बल्कि, वह तो कह रहा है कि ऐसा बयान तो दूसरे नेताओं ने भी दिया है, फिर सवाल मुझसे ही क्यों! यह कहां का तर्क है? इतनी ही फिक्र होती तो लोगों से पहले खुद को अरेस्ट होना चाहिए था। तब तो कुछ बात बनती। यह सच है कि हिंसा की योजना पहले ही बना ली गई थी। जिस राजनीतिक पार्टी से उस विधायक का संबंध है उसने भी उनके उस बयान की निंदा नही की। जबकि उसे पार्टी से निकालने का फर्ज बनता था। 


वोट की राजनीति को तो यह करना ही था। सो, उसने किया। समझ का परिचय जनता को देना चाहिए था, जो दुर्भाग्य से नही दिया गया। क्षेत्र में मुस्लिम आबादी बहुसंख्यक है। इसलिए भय का कोई कारण नहीं है। फिर भी कई संगठनों और लोगों द्वारा अनावश्यक भय का माहौल बनाया जाता है, ताकि उनकी दुकानें चलती रहें। इस क्षेत्र में पिछले पांच सालों में एक भी सांप्रदायिक घटना नही हुई थी। जबकि शेष हरियाणा में इन सालों के दरम्यान कई ऐसी घटनाएं हुई। 


इसलिए शिक्षित होइए और जागरूक बनिए। शिक्षित होकर अपने अधिकार की मांग उठाइए। वरना अपराध का रास्ता तो बचा है ही। असुरक्षित क्षेत्र में तो कोई उद्योग भी नही लग सकता। नतीजतन, आर्थिक पिछड़ापन बढ़ता जायेगा। अब जीवन की प्राथमिकताएं बदल गई हैं। जमाना बहुत बदल गया है। हथियार की जगह किताब उठाने का समय आ गया है। और हां, किसी जातीय समूह और संगठन से कोई आशा न रखें। क्योंकि ये समूह इस तरह की कार्यवाही के लिए तो आपका हौंसला बढ़ा देंगे, भाईचारा दिखाएंगे, आपकी वाहवाही भी करेंगे किन्तु, आपके हिस्से और हक की बात आते ही पीछे हट जाएंगे। कृषि और शिक्षा जरूरत है। इस जरूरत पर लड़िए।