निर्वाचन आयोग ने पांच राज्यों में चुनाव की तारीखें घोषित कर दी है। मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम में सात नवंबर से तीस नवंबर तक मतदान चलेगा। तीन दिसंबर को चुनावों का परिणाम घोषित किया जाएगा। हर चुनाव की भांति इन चुनावों में भी प्रत्येक दल की नजर अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ा वर्ग के मतदाताओं पर रहेगी। राजस्थान और मध्यप्रदेश में विधानसभा तथा लोकसभा के पिछले दो-तीन चुनावों में दलित मतदाताओं का रुझान किस तरफ रहा ?
मध्यप्रदेश में स्थिति
मध्यप्रदेश की कुल 230 विधानसभा सीटों में 35 सीटें एससी के लिए आरक्षित हैं। 2013 में बीजेपी को इनमें से 28 सीटें मिली। 2018 में 18, 2008 में 26 तो 2003 में 30 एससी की सीटें बीजेपी को मिली। जब मध्यप्रदेश में एससी की 44 सीटें हुआ करती थी, तब भी बीजेपी उनमें से 60-65% सीटें जीत लेती थी। 35 के अलावा 19 अन्य सीटों पर भी एससी वोटर निर्णायक रहते हैं। 35 में से 7 एससी सीटों पर बीजेपी पिछले पंद्रह साल से लगातार और एक सीट पर पिछले तीस साल से लगातार जीत रही है। दलित वोटर की सबसे अधिक संख्या वाली पांच में से दो सीटें बीजेपी जीतती रही है। बुंदेलखंड में करीब 28 सीटें शामिल हैं। इंदौर, उज्जैन और सागर में पांच लाख से ज्यादा दलित रहते हैं। पिछले दो महीने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सबसे अधिक कार्यक्रम इसी क्षेत्र में हुए हैं।
राजस्थान में स्थिति
राजस्थान में कुल 200 विधानसभा सीटें हैं। एससी की यहां 34 सीटें आरक्षित हैं। 2018 विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 12 तो कांग्रेस को 19 सीटें मिली। किन्तु वोट शेयर में मात्र एक प्रतिशत का अंतर था। 2013 में बीजेपी को 34 में से 32 सीटें तथा कांग्रेस को 00 सीटें मिली। 2013 और 2018 में बीजेपी को 48% और 40% दलित वोट मिले थे। 2019 लोकसभा चुनाव में 60% दलित वोट बीजेपी को मिले। 2014 लोकसभा चुनाव में यह प्रतिशत 54 था। 2018 में जब कांग्रेस बीजेपी से सीटों के मामले में आगे थी, तब भी बीजेपी को मात्र 1% वोट का ही नुकसान हुआ था। 2013 में बीजेपी को कांग्रेस से 18% एससी वोट अधिक मिले। मेवाड़ में 17 सीटें एससी के लिए आरक्षित हैं। इनमें से बीजेपी के पास अभी 7 हैं। राजस्थान में दलितों में मेघवाल सबसे अधिक राजनीति में एक्टिव हैं। केंद्र में अर्जुन राम मेघवाल का कानून मंत्री बनाया जाना इसी रणनीति का हिस्सा था।
2019 लोकसभा चुनाव
2019 लोकसभा चुनाव में एससी के लिए आरक्षित करीब 80 में से बीजेपी द्वारा खड़े किए गए 69 में से 51 उम्मीदवार जीते। वे सीटें जहां एससी की संख्या 20 से 30 प्रतिशत के बीच है, ऐसी 68 सीटों पर बीजेपी को जीत मिली। 2014 में अमीर दलितों का 28% वोट बीजेपी को मिला, जो 2019 में बढ़कर 36% पहुंच गया। गरीब दलितों का भी 34% वोट बीजेपी को मिला। यह कांग्रेस और बसपा दोनों का जोड़ दिया जाए तब भी बीजेपी का 12% अधिक बनता है। यूपी में लोकसभा की 80 में से 17 सीटें एससी के लिए आरक्षित हैं। 2019 में बीजेपी को इनमें से 15 मिली, जबकि 2014 में सभी 17 सीटें एससी ने बीजेपी की झोली में डाली। यूपी में जाटव को छोड़ अन्य दलित जातियों ने 50% से अधिक वोट बीजेपी को दिया। 2019 में अकेले उत्तर भारत में 45% दलित वोट बीजेपी के खाते में गए।
यूपी में विधानसभा की एससी के लिए 84 सीटें आरक्षित हैं, 2022 में बीजेपी ने इनमें से रिकॉर्ड 63 जीती थी। 2019 लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 2014 के मुकाबले 21 सीटें अधिक मिली। गजब बात यह कि बढ़ी हुई इन 21 सीटों में से 10 सीटें एससी-एसटी की थी। 2009 में 12% दलितों का वोट प्राप्त करने वाली बीजेपी 2014 में 24% तो वही 2019 में 34% दलितों का वोट प्राप्त कर लेती है। यानी केवल पांच साल में 10% की वृद्धि।
दलितों में बीजेपी की सेंध
अल्पसंख्यक विरोधी भावना दलितों में भी बड़े पैमाने पर है। ऐसे अल्पसंख्यक विरोधी भावना रखने वाले 38% दलितों ने 2019 में बीजेपी को वोट दिया था। क्षेत्रीय दलों को वोट देने वाले दलितों में भी बीजेपी सेंध लगा चुकी है। ऐसे 28% दलित जो 2014 में क्षेत्रीय दलों को वोट देते थे, उन्होंने 2019 में बीजेपी को दिल खोलकर वोट दिया। अच्छी आर्थिक स्थिति वाले दलित बसपा को छोड़ चुके हैं। ऐसे केवल 2% दलित ही बसपा के साथ हैं। छोटे दलित समुदाय विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के चलते बीजेपी के साथ मिल चुके हैं।
ओबीसी में पिछड़ा और अति पिछड़ा के नाम पर बीजेपी कब की सेंध लगा चुकी है। विश्वकर्मा योजना अभी का ताजा उदाहरण है। इसके अलावा रोहिणी आयोग की रिपोर्ट भी लाइन में है। और सुना है सरकार ओबीसी की क्रीमी लेयर की सीमा बढ़ाने पर भी विचार कर रही है। विश्वकर्मा योजना द्वारा बीजेपी एक बार फिर से नॉन-यादव ओबीसी और कुछ एससी जातियों को साधती दिख रही है। लगभग साध ही लिया है।
एससी तथा गैर-यादव ओबीसी वहीं जातियां हैं जिन्होंने 2019 लोकसभा चुनाव में बीजेपी को क्रमशः 34% तथा 44% वोट दिया था। 2014 चुनाव में यह प्रतिशत 24 तथा 34 था। विश्वकर्मा समाज में अधिकतर गैर-यादव ओबीसी ही हैं। 2019 लोकसभा चुनाव में ओबीसी का 44% वोट बीजेपी को मिला था। इस 44% में करीब-करीब नब्बे फीसदी गैर-यादव था। बीजेपी को मिलने वाले यादव वोटों में बिहार तथा यूपी जैसे बड़े राज्यों से नही, बल्कि अधिकतर अन्य राज्यों से मिला था।
पिछड़ों में सेंध
पिछड़ों में अति पिछड़ों के नाम पर बीजेपी कब की सेंध लगा चुकी है। यह बात एससी भी जानता है। इसलिए इन पर भी एससी की बराबर निगाह है। हालांकि, आर्थिक दृष्टि से देखें तो एससी कभी इनको अपने में शामिल नहीं होने देगा। किन्तु, संख्या बल, वोट की राजनीति और राजसत्ता की चाह कुछ भी करा सकती है। पिछड़े वर्ग की जातियां एकजुट नही हैं। 2014 से यहीं वो चोर दरवाजा है जिसकी चाबी बीजेपी के हाथ लग चुकी है। गैर-यादव ओबीसी वोट बैंक पूरी तरह बीजेपी पर मेहरबान है। इस बार इन पांच राज्यों में तथा अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव में इन जातियों का वोट किसे अधिक मिलेगा, यह देखना दिलचस्प होगा।