मार्क्स - एंजिल्स : दोस्ती की अनूठी मिसाल

क़िस्से दोस्ती के कइयों के मशहूर हैं. मसलन; अटल-आडवाणी, इंदिरा-पुपुल जयकर, जयललिता-शशिकला, राजीव-सचिन पायलट. इस कड़ी में चाहें तो आप अरविंद केजरीवाल-मनीष सिसोदिया और अमित शाह-नरेंद्र मोदी का नाम भी जोड़ सकते हैं. फिलोसॉफी की दुनिया में भी मित्रता का एक महान, अमिट और सर्वश्रेष्ठ अध्याय जुड़ा हुआ है. एक समय दुनिया के हर दसवें व्यक्ति की जुबां पर इसका नाम रहा. यह जोड़ी थी कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंजिल्स की. 


पहली मुलाक़ात : मार्क्स का ज़िक्र हो और एंजिल्स का नाम न लिया जाए, संभव ही नही. एंजिल्स हर कदम पर मार्क्स के साथ मजबूती से डटे रहे. अनुसंधान इकट्ठे रहकर किए, साथ मिलकर किताबें लिखी, एक होकर क्रूर सत्ताओं से मुकाबला किया; कई सारी बातें हैं. क्रांतिकारी दर्शन के जगत में ये गज़ब जोड़ी थी. एंजिल्स मार्क्स के आजीवन साथी रहे. इस संबंध में लेनिन ने लिखा है, " प्राचीनकाल की कथाओं में हमें मित्रता के बहुत-से हृदय-द्रावक उदाहरण मिलते हैं, लेकिन यूरोप का सर्वहारा-वर्ग यह दावा कर सकता है कि उनका मार्गदर्शन करने वाली महान रचनाओं को ऐसे दो महान योद्धाओं ने मिलकर रचा है जिनकी परस्पर मैत्री के सामने प्राचीनकाल की मित्रता की कहानियां भी फीकी पड़ जाती हैं." 



दोनों की पहली मुलाक़ात सन 1842 में राइनलैंड के एक शहर कॉलोन में हुई. पीएचडी पूरी करने के बाद भी जब मार्क्स को किसी यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर बनने का मौका नही मिला तो वे इसी शहर के एक अख़बार में पत्रकार के तौर पर काम करने लगे. अख़बार के कार्यालय में वे अपना लेख प्रकाशित कराने पहुंचे. वहीं पर इसी काम के लिए एंजिल्स भी आए हुए थे. मिलन हुआ, कुछ बातें हुई, मग़र ये मुलाक़ात अभी दोस्ती में बदलनी बाकी थी. अख़बार में छपा मार्क्स का एक लेख बड़ा विवादित रहा. इसमें उन्होंने कृषि संबंधी कुछ लिखा था, क्योंकि तब वहां खेती योग्य भूमि का निजीकरण किया जा रहा था. नतीजतन, सरकार ने अख़बार बंद कर दिया. 


जब मुलाक़ात दोस्ती में बदली : 

प्रशिया में मार्क्स जिस पत्रिका के संपादक थे, सरकारी दमन के चलते वह बंद हो गई और मार्क्स को इस्तीफा देना पड़ा. अब मार्क्स पेरिस जा पहुंचे. मार्क्स ने अब तक अपना पहला वर्क "कंट्रीब्यूशन टू द क्रिटिक ऑफ हेगल्स फिलोसॉफी ऑफ राइट" पूरा कर लिया था. पर ये प्रकाशित हुआ उनकी मृत्यु के बाद. यहीं यानी पेरिस में उनके साथ एक बड़ी घटना घटती है. वहीं घटना जिसने आगे चलकर ऐतिहासिक रूप ले लिया. घटना थी- एंजिल्स से दोस्ती. यहीं पर वे जोसेफ प्रूधो और बकुनिन जैसे विद्वानों से भी मिले. 


एंजिल्स की आर्थिक स्थिति लगभग अच्छी थी. वे थोड़े अमीर परिवार से आते थे, लेकिन गरीबों के दर्द को उन्होंने दिल से महसूस कर करीब से देखा था. इसी अनुभव के आधार पर एंजिल्स ने अपनी एक पुस्तक लिखी- द कंडीशन ऑफ वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड. मार्क्स इस किताब से बहुत प्रभावित हुए. उन्होंने उनसे मिलना चाहा. एंजिल्स के पेरिस पहुंचते ही मार्क्स उनसे मिले. यहीं आकर इस मुलाकात पर दोस्ती का परवान चढ़ गया. यहां दोनों ने मिलकर अपनी पहली किताब लिखी- द हॉली फैमिली. आगे चलकर दोनों ने एक और किताब लिखी. 


जब मार्क्स सरकारों के लिए मुसीबत बने 

सन 1848 में कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो भी दोनों ने ही मिलकर तैयार किया. तंग आकर सरकार ने सन 1845 में मार्क्स को फ्रांस से निकाल दिया. कारण बताया कि यहां की सरकार के लिए मार्क्स हानिकारक है. तब वे बेल्जियम चल दिए. एंजिल्स भी अपनी नौकरी छोड़ मार्क्स के पीछे-पीछे बेल्जियम ही जा पहुंचे. वहां पर दोनों ने एक और किताब लिखी- द जर्मन आइडियोलॉजी. इसी किताब में कहा गया कि सवाल विश्व की व्याख्या का नही, उसे बदलने का है. 


बेल्जियम में वे दोनों एक संगठन 'लीग ऑफ द जस्ट' से जुड़ गए. दोनों महापुरुषों ने इस संगठन का नाम बदलकर 'कम्युनिस्ट लीग' रख दिया. इसमें इन दोनों युवाओं को जिम्मेदारी दी गई कि वे इस लीग के होने वाले दूसरे सम्मेलन के लिए एजेंडा/मेनिफेस्टो तैयार करें. दोनों ने मेहनत कर एक मेनिफेस्टो तैयार किया. नाम - कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो. इसका एक विश्वप्रसिद्ध वाक्य है- वर्किंग मेन ऑफ ऑल कंट्रीस, यूनाइट. इसे चार्टर ऑफ एक्शन कहा जाता है. इसमें फिलोसॉफी की बातें नही हैं. सन 1848 में यहां भी क्रांति हो जाती है. मार्क्स को बेल्जियम से भी निकाल दिया गया. 


फिर वे वापिस फ्रांस आ गए. उनके पीछे-पीछे एंजिल्स भी फ्रांस पहुंच गए. उसके बाद मार्क्स कुछ समय जर्मनी में रुक कर इंग्लैंड चले गए. और मृत्यु तक वहीं रहे. इंग्लैंड में उन्हें आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा. यहां भी एंजिल्स उनकी वित्तीय मदद करते थे. खुद मार्क्स भी लंदन लाइब्रेरी में 12-16 घण्टे तक अध्ययन कर अखबारों में लिखते हुए खर्च चला रहे थे. इंग्लैंड में मार्क्स जर्मन भाषा में लिख रहे थे तो एंजिल्स ने कहा कि यहां रहकर यहां की भाषा में लिखा जाए तो लोगों को समझने में आसानी होगी. मार्क्स सहमत हुए. 


सबसे प्रसिद्ध किताब 

सन 1867 में उनकी एक प्रसिद्ध किताब आई- दास कैपिटल. यह वही अनुपम किताब थी जिसने दुनिया भर में मार्क्स की विद्वता की धाक जमा दी. सारा वैज्ञानिक समाजवाद इसी में तो समाहित है. इसे आर्थिक विचारों का इतिहास भी कहा जा सकता है. सन 1883 में मार्क्स की मृत्यु हो जाती है. मृत्यु के बाद उनकी दास कैपिटल के दूसरे और तीसरे खंड को एंजिल्स ने ही प्रकाशित करवाया. यह अपने मित्र के लिए उनकी श्रद्धांजलि थी. 


मार्क्स को आज जितनी ख्याति मिली हुई है वह कभी नही मिलती यदि ये दोनों खंड दुनिया को न मिले होते. मार्क्स की मृत्यु पर एंजिल्स ने अत्यंत दुःख प्रकट करते हुए लिखा - "साइबेरिया की खानों से कैलिफोर्निया के तट पर विस्तीर्ण प्रदेश से श्रमिकों का प्रिय नेता मृत्यु को प्राप्त हो गया." लंदन के हाइगेट कब्रिस्तान में जहां मार्क्स को दफनाया गया वहीं उनकी समाधि पर अपने प्रिय मित्र के नाम एंजिल्स ने एक हृदय-विदारक भाषण भी दिया. 


सन 1917 का सोवियत संघ सालों के कठिन परिश्रम से तैयार किए उनके सिद्धांत को व्यवहार में तब्दील करने में सफल हो गया. पर मार्क्स अपने विचारों की नींव को इमारत बनते देखने के लिए जिंदा नही थे. भले ही उनके विचारों पर खड़ा हुआ ढांचा लम्बा नही चल पाया. फिर भी पूंजीवाद के विकल्प के रूप में मार्क्स का सिद्धांत आज भी मजबूती से खड़ा है. कार्ल हेनरिक मार्क्स एक व्यक्ति से बढ़कर एक विचार के रूप में प्रतिष्ठित हैं. राजनीतिक विज्ञान के जनक महान यूनानी दार्शनिक अरस्तू के पश्चात सामाजिक प्रघटनाओं को इतने विस्तार से विश्लेषित करने वाले कार्ल मार्क्स ही थे. 

मार्क्स के लिए शायद यह सब कुछ संभव नहीं हो पाता, यदि उनके साथ एंजिल्स न खड़े होते ! आजीवन साथ निभाने वाली दोनों की यह मित्रता अटूट और अनूठी थी.