हरियाणा चुनाव : भाजपा की रणनीतिक जीत

गुजरात और मध्य प्रदेश के बाद हरियाणा बीजेपी का नया गढ़ बन गया है। हरियाणा के राजनीतिक इतिहास में कोई पार्टी लगातार तीसरी बार सरकार बनाने जा रही है। कहते हैं युद्ध और राजनीति में सिद्धांतों का कोई स्थान नहीं होता। बीजेपी और कांग्रेस दोनों राजनीतिक पार्टियों ने 'गीता की भूमि' हरियाणा में इस बार यह सिद्ध करके दिखा दिया है कि चुनावी प्रक्रिया में जीत से महत्त्वपूर्ण कुछ नहीं होता। परिवारवाद का इस चुनाव में खुलकर इस्तेमाल होना यही सब दर्शाता है। खैर, एंटी-इंकम्बेंसी को प्रो-इंकम्बेंसी में कैसे बदला जा सकता है, यह बीजेपी से सीखना चाहिए तथा जीती हुई बाजी को कैसे हारा जाता है, यह कांग्रेस से सीखा जाना चाहिए।



बीजेपी हरियाणा विधानसभा चुनाव जीती है तो इसलिए नही कि लोग उसको पसंद करते थे। किंतु, इसका अर्थ यह भी नही कि हर वर्ग बीजेपी से नाखुश था। परंतु, इससे कोई इंकार नही कर सकता कि 2019-24 के दौरान जनता का बीजेपी के प्रति विश्वास कम हुआ है। यदि ऐसा नही होता तो बीजेपी के नौ मंत्री चुनाव नही हारते। तो क्या कारण रहे कि सत्ता विरोधी लहर होने के बावजूद भी बीजेपी को स्पष्ट बहुमत मिल गया। इस चुनाव में उसकी जीत के कुछ बुनियादी कारण रहे हैं। जिनमें बीजेपी की मजबूत रणनीति, बेहतर चुनाव प्रबंधन और कांग्रेस की अंदरूनी कलह प्रमुख हैं। चुनाव की घोषणा होने से पहले बीजेपी को जीत की उम्मीद नही थी। इस चुनाव का एक दूसरा पहलू वंशवाद और परिवारवाद की राजनीति भी है। इस बार वे बड़े-बड़े पेड़ गिरे हैं जिनकी जड़ें तीन-चार पीढ़ियों से राजनीति की जमीं में गहराई तक फैली हुई हैं। कई अभेद्य किले ढहे हैं। इनका जिक्र करना जरूरी है। पहले बीजेपी की जीत के कारण -


बीजेपी की सधी हुई रणनीति :


2019 हरियाणा विधानसभा चुनाव में बीजेपी को घाटे का एक बड़ा कारण 75 पार का नारा था। बीजेपी को लगा था कि 75 नही तो 70, और 70 नही तो 60 सीटें आ ही जाएंगी। इसलिए उस समय बीजेपी का टिकट वितरण बहुत खराब था। बीजेपी ने तब आंख मूंद कर टिकट बांटी थी। इस बार पार्टी ने वह गलती नही की और उसमें बहुत सुधार किया। इस बार यदि कोई उम्मीदवार थोड़ा बहुत भी कमजोर दिखा तो बीजेपी हाईकमान ने बड़े निर्मम तरीके से उसकी टिकट काटी है। पिछले चुनाव में बीजेपी केवल नरेंद्र मोदी के नाम के सहारे लड़ी थी। संगठन के नेतृत्त्व में व्यक्ति का महत्त्व एक बात है, किंतु चुनावी जीत में केवल एक नाम के भरोसे नही बैठा जा सकता। बीजेपी ने इस बार इसमें काफी बदलाव किया है। पिछली बार जिस अति-आत्मविश्वास का शिकार बीजेपी हुई, इस बार वह कांग्रेस को ले डूबा। 


बीजेपी ने इस बार सिद्धांतों के साथ भी समझौता किया। परिवारवाद के तहत पार्टी ने 10 से ज्यादा प्रत्याशियों को मैदान में उतारा जिनमें से 8 जीतकर आए। कांग्रेस ने 20 ऐसे ही प्रत्याशियों को टिकट दी जिनमें 10 जीतकर आए। रेवाड़ी, कोसली, महेंद्रगढ़, सफीदो, नलवा, हिसार, बरवाला ऐसी सीटें थी जिन पर बीजेपी ने बहुत ही मजबूत रणनीति बनाई। राजनीति में रुचि रखने वालों के लिए यह रणनीति देखने लायक थी। जिस व्यक्ति ने बीजेपी को 4 से 47 तक पहुंचाया था, महेंद्रगढ़ से उनकी भी टिकट एक झटके में काट दी गई। यह रणनीति का हिस्सा तो था ही, पार्टी द्वारा किया गया एक नया प्रयोग भी था। कांग्रेस यह सब करने में हिचकती है। लोकसभा चुनाव 2024 में रोहतक क्षेत्र का ब्राह्मण वोटर कांग्रेस की तरफ गया; यदि ऐसा नही होता तो दीपेंद्र हुड्डा इतने लाखों के अंतर से नही जीतते। इससे निपटने के लिए ही बीजेपी ने विधानसभा में 11 ब्राह्मण प्रत्याशियों को चुनाव में उतारा। जिनमें सात ब्राह्मण उम्मीदवार जीत कर आए। 


सिरसा लोकसभा क्षेत्र में विधानसभा की 9 सीटें आती हैं। वहां पर बीजेपी की रणनीति थी कि मुकाबला इनेलो और कांग्रेस के बीच रहे। इसलिए इनेलो के खिलाफ बीजेपी ने कमजोर प्रत्याशी उतारे। ताकि बाद में स्पष्ट बहुमत की सरकार न बने तो उससे समर्थन लिया जा सके। हालांकि बाद में इसकी कोई जरूरत नहीं पड़ी। पूरे चुनाव में न इनेलो ने बीजेपी का विरोध किया, न बीजेपी ने उसका। कांग्रेस ने वहां मेहनत की जहां वह मजबूत थी, बीजेपी ने वहां की जहां वह बहुत कमजोर थी। बीजेपी पूरी तैयारी के साथ जाट बेल्ट में घुस गई। परिणाम इसी का हुआ कि जिस जाट बाहुल्य क्षेत्र में कांग्रेस 2019 में 12 सीटें जीती थी, इस बार 8 पर आ गई है। कांग्रेस का गढ़ कहे जाने वाले सोनीपत की 6 विधानसभा सीटों में कांग्रेस के पास अब केवल एक सीट बची है। अगर सोनीपत लोकसभा क्षेत्र की बात करें तो बीजेपी को 6 सीटें मिली हैं और एक निर्दलीय को। जाट बेल्ट में बीजेपी ने इस बार पूरी तरह सेंध लगाई है। झज्जर में भी चार में से एक सीट कांग्रेस के हाथ से निकल गई। 


बीजेपी का बेहतर चुनावी प्रबंधन व कांग्रेसी कलह : 


इस चुनाव में कांग्रेस केवल माहौल के भरोसे बैठी रही। मैनेजमेंट पर उसने मेहनत नही की। लोकसभा चुनाव के समय बीजेपी-आरएसएस के बीच जो संतुलन बिगड़ा था, विधानसभा चुनाव से ठीक पहले वह तालमेल बैठ गया। संघ की फीडबैक के आधार पर मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर को बदला गया। खट्टर की इस चुनाव में सार्वजनिक सभाओं से भी दूरी बनाकर रखी गई। किंतु, जमीन पर उनकी भूमिका कम नही हुई। खट्टर का लोकसभा क्षेत्र करनाल है। करनाल में विधानसभा की 9 सीटें हैं। बीजेपी ने सभी 9 सीटों पर जीत दर्ज की है। इसी से मनोहर लाल खट्टर की अहमियत का अंदाजा लगाया जा सकता है। जुलाई में ही संघ-बीजेपी की समन्वय बैठक हो गई थी। चुनाव के दरम्यान भी आरएसएस प्रमुख पानीपत में लगातार तीन दिन तक डटे रहे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अपनी हर रैली में बीजेपी के एक कार्यकर्त्ता के जिम्मे दस घरों की ड्यूटी लगाने की अपील करते दिखाई दिए। हिमाचल और राजस्थान के बीजेपी विधायकों को भी हरियाणा में ग्राम स्तर की छोटी-छोटी सभा करने की जिम्मेदारी दी गई थी। कांग्रेस पार्टी में पिछले डेढ़ दशक से कोई संगठन ही नही है। बीजेपी एक टीम की तरह लड़ी और कांग्रेस ने पूरा चुनाव अभियान एक व्यक्ति केन्द्रित बना दिया। 


अपने करीब तीस साल के राजनीतिक जीवन में कांग्रेस की बड़ी नेता कुमारी शैलजा पहली बार इतनी सक्रिय हुई थी। अंदाजा लगाया जा रहा था कि हरियाणा में इस बार दलित राजनीति नई करवट ले रही है। किंतु, टिकट वितरण में शैलजा को तरजीह नही दी गई। इसे बीजेपी ने अंत तक खूब अच्छे से भुनाया। एक रैली को छोड़कर शैलजा कहीं भी कांग्रेस का प्रचार करने नही उतरी। इसलिए लोकसभा में जो दलित वोट कांग्रेस की तरफ शिफ्ट हुआ था वह वापिस बीजेपी में आ गया। दूसरी तरफ बांगर क्षेत्र में बीजेपी ने माहौल ऐसा बनाया कि रणदीप सुरजेवाला भी कैथल से बाहर नही निकल पाए। अनुसूचित जाति की 17 में से बीजेपी ने पिछली बार 5 सीटें जीती थी, जो इस बार बढ़कर 8 हो गई। 


शैलजा गुट की अनदेखी से राहुल गांधी भी खुश नही थे। किंतु, क्षेत्रीय नेताओं का अपना अलग ही चलता है। राहुल गांधी आम आदमी पार्टी से भी गठबंधन करने के पक्ष में थे। आम आदमी पार्टी की प्रतीक्षा का बांध अंततः टूटा और उसने अकेले चुनाव लडने का फैसला किया। इसका नुकसान भी कांग्रेस को उठाना पड़ा। 5 सीटों पर बीजेपी को मिली जीत का अंतर आम आदमी पार्टी को मिले वोटों से कम रहा। जितने वोटों से कांग्रेस हारी उससे ज्यादा वोट आप पार्टी को मिले। यदि दोनों का गठबंधन होता तो यहां परिणाम अलग होता। राहुल गांधी जानते हैं कि उनका वोट फ्लोट है जबकि बीजेपी का हार्डकॉर। अति उत्साह के चलते हरियाणा कांग्रेस ने इस पर मंथन नही किया। कांग्रेस के कई प्रत्याशियों के नौकरी बांटने वाले बयानों ने भी बीजेपी को बैठे-बैठाए मुद्दा थमा दिया। इससे खासकर युवाओं का वोट कांग्रेस से कटने लगा। हरियाणा हारने के बाद दिए गए बयानों पर गौर करें तो भूपेंद्र हुड्डा का बयान सैद्धांतिक था जबकि शैलजा का व्यवहारिक। 


वंशवाद और परिवारवाद की राजनीति : 


इस चुनाव में वे दिग्गज धराशायी हुए हैं जो सत्ता को अपना जन्मसिद्ध अधिकार मान बैठे हैं। जिन्होंने जन्म लेते ही आंखें खोली तो राजनीति के दर्शन किए, बोलना सीखा तो पहला शब्द राजनीति था और चलना सीखा तो राजनीति की उंगली पकड़ कर। तीनों लालों (देवीलाल, भजनलाल, बंसीलाल) के परिवार से इस बार 12 प्रत्याशी चुनावी मैदान में थे, जिनमें से केवल तीन ही जीत पाए। देवीलाल परिवार से 8 प्रत्याशी चुनाव लड़े। अभय चौटाला, सुनैना चौटाला, रणजीत चौटाला, दिग्विजय चौटाला, दुष्यंत चौटाला, भव्य बिश्नोई, कुलदीप शर्मा और कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष उदयभान को जनता ने पूरी तरह नकार दिया। इसके अलावा गोपाल कांडा और बलराज कुंडू जैसे दिग्गज भी चुनाव हार गए। फिर भी जेपी के पुत्र, सुरजेवाला के पुत्र, आनंद दांगी के पुत्र, किरण चौधरी की पुत्री, भजनलाल के पुत्र, वरुण चौधरी की पत्नी, अभय चौटाला के पुत्र, राव इंद्रजीत की पुत्री, पूर्व मंत्री विनोद शर्मा की पत्नी आदि प्रत्याशी चुनाव जीतने में सफल रहे। 


पुनश्च : बीते पांच सालों में क्या-क्या नही हुआ। किसान आंदोलन, पहलवान आंदोलन, अग्निवीरों का मुद्दा, बेरोजगारी, पोर्टल सिस्टम, महंगाई इत्यादि। इन सब मुद्दों पर बुद्धिजीवी लोगों ने बीजेपी के खिलाफ पिच तैयार करके कांग्रेस को सौंप दी थी। इनमें से कई मुद्दे हरियाणा में थे भी। इसके बावजूद कांग्रेस उस बनी बनाई पिच पर खेल नही पाई। कांग्रेस ने कड़ी मेहनत जरूर की। जमीन पर पसीना बहाने में भी कांग्रेस ने कोई कसर नहीं छोड़ी। किंतु, बीजेपी की कैल्कुलेटिंग रणनीति और माइक्रो मैनेजमेंट उस पर भारी पड़ा। कांग्रेस हार्ड वर्क करती रही और बीजेपी स्मार्ट वर्क करके बाजी मार ले गई। कहा जा सकता है कि दोनों दलों के बीच चुनावी संघर्ष था, रणनीतिक नही।