तुम आलसी हो! तुम किसी काम के नही हो! तुम बेकार हो! समाज में आलसी लोगों पर इस तरह की टिप्पणी करते अक्सर देखा जाता है। अपनी शारीरिक ऊर्जा का उपयोग न करने की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को आलसी कहा जाता है। आलसी लोगों को तिरस्कार भरी नजरों से भी देखा जाता है। दुनिया की लगभग तमाम संस्कृतियों में आलस का नकारात्मक अर्थ ही लगाया जाता है। किंतु, बहुत सारे शोध तथ्यों के आधार पर आलस के सकारात्मक होने का दावा करतें हैं।
इस विषय पर काम करने वाले जानकारों का मानना है कि एक आलसी व्यक्ति सावधानीपूर्वक प्रबंधन के द्वारा अपनी ऊर्जा को खर्च करता है। इससे वह अनावश्यक कामों से भी बच जाता है। अमेरिकी साइंस फिक्शन लेखक रॉबर्ट ए. हेनलेन कहते हैं कि, "प्रगति सुबह जल्दी उठने वालों द्वारा नही की जाती। यह उन आलसी लोगों द्वारा की जाती है जो किसी काम को करने के आसान तरीके खोजने की कोशिश करते हैं।" इसलिए आज आलस के प्रति नजरिए को बदलने की जरूरत है।
पारंपरिक नजरिए से हटकर सोचिए :
जिस काम को करने में ज्यादा मेहनत लगती है, इंसान उससे बचना चाहता है। शारीरिक गतिविधियों पर जितना हो सके उतना अंकुश लगाने की कोशिश की जाती है। व्यक्ति ऑफिस के कामकाज से भी जल्दी छुटकारा पाना चाहता है। पूछा जा सकता है कि क्या ऐसे व्यक्ति आलसी होते हैं? किसी काम के प्रति अत्यधिक सक्रियता की बजाए कम सक्रियता को तरजीह देने वाला व्यक्ति आलसी कह दिया जाता है।
किंतु, इसका दूसरा पहलू यह है कि, हो सकता है वह उस काम को नापसंद करता हो! सक्रिय होना अथवा न होना हमारी रुचि पर भी निर्भर करता है। एक व्यक्ति पढ़ने के प्रति सक्रिय है तथा खेलने के प्रति उदासीन। दूसरा व्यक्ति ठीक इसके विपरित प्रकृति का है। तो क्या ऐसा कहा जा सकता है कि पढ़ने वाला खेलने के मामले में आलसी है तथा खेलने वाला पढ़ने के मामले में? यह भी हो सकता है कि वे इस उदासीनता का कारण अपने आसपास के अनुपयुक्त वातावरण को मानते हों!
हेल क्रैनमर ने अपने निबंध ' इन डिफेंस ऑफ लेजीनेस ' में लिखा है कि, "आलस्य के खिलाफ अनेक तर्कों के बावजूद यह आश्चर्यजनक है कि हम इसे हासिल करने के लिए इतनी मेहनत करते हैं।" कई बार देखने को मिलता है कि किसी ईनामी प्रतियोगिता या अन्य गतिविधि में योग्य लोग भी पर्याप्त सक्रियता नही दिखाते। क्या हम उन्हें आलसी कह सकते हैं? कह भी सकते हैं! किंतु, ऐसा भी संभव है कि वह ईनाम उन व्यक्तियों के लिए कोई फायदेमंद ही न हो! इसलिए वे ऐसी भागीदारी के प्रति उदासीन रहना उचित समझते हैं। जबकि, अपनी रुचि के अनुसार किया गया प्रयास उन्हें आनंद प्रदान करता है।
कई लोग आलस को बुरा नही बल्कि विकासवादी गुण मानते हैं। मानव सभ्यता के विकास की प्रक्रिया में आलस शामिल होता चला गया। जैसे-जैसे हम सभ्य होते गए, हमारे पास आलसी होने के अधिक -से-अधिक अवसर उपलब्ध होते गए। औद्योगिक क्रांति ने आलस का नकारात्मक अर्थ प्रस्तुत किया। तब काम ही शारीरिक श्रम का पर्याय बन गया। अर्थात् शारीरिक श्रम में कोताही बरतने वाले व्यक्ति को आलसी कहा गया।
उद्योगों में काम के घंटे निश्चित करने को लेकर आज भी बहसें होती हैं। समय के साथ इसमें भी बदलाव हुआ। अधिकतर उद्योग अपने कर्मचारियों को अधिकाधिक फुरसत के पल देने की कोशिश कर रहे हैं। उनका मुख्य लक्ष्य काम की मात्रा की बजाए काम की गुणवत्ता पर होता है। क्योंकि काम के प्रति अत्यधिक सक्रियता निराशा उत्पन्न करती है। अमेरिकी इंजीनियर फ्रैंक गिलब्रेथ सीनियर कहते हैं कि, "मैं हमेशा एक आलसी व्यक्ति को एक कठिन काम करने के लिए चुनूंगा, क्योंकि एक आलसी व्यक्ति इसे करने का एक आसान तरीका ढूंढ लेगा।"
कई महान लोग आलसी थे :
रेने डेकार्ट को आधुनिक दर्शन का पिता कहा जाता है। यह फ्रांसीसी दार्शनिक कुख्यात तरीके के आलसी थे। इतने आलसी कि उन्होंने करीब 40 बार अपना मकान बदला, ताकि लोगों से जान-पहचान और मेल-जोल न करना पड़े। उनके लिए बिस्तर से बाहर निकल पाना टेढ़ी खीर था। डार्विन और आइंस्टीन भी अधिकतम समय आराम करना पसंद करते थे। डार्विन के बारे में कहा जाता है कि स्कूल में वे पढ़ते पढ़ते सो जाते थे।
मानव सोच के संदर्भ में सबसे बड़ी खोजें तब हुई जब लोग आलसी थे। नोबेल शांति पुरस्कार विजेता लेक वाल्सा का कहना है कि, "मैं आलसी हूं। आलसी लोगों ने ही पहिए और साइकिल का आविष्कार किया, क्योंकि उन्हें चलना और सामान ढोना पसंद नही था।" एक बेहतरीन शोधार्थी देखने में आलसी लग सकता है। लेकिन, वह अपनी ऊर्जा सोच में लगा रहा है। हम इसे खुली आंख से नही देख पाते। फ्लोरिडा यूनिवर्सिटी में साइकोलॉजी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर टॉड मैकलरॉय कहते हैं कि विज्ञान में आलस्य का कोई नकारात्मक अर्थ नही है।
ओशो ने ' द बुक ऑफ विजडम ' में दिलचस्प तरीके से बताया कि आलसी लोगों ने दुनिया को कभी हानि नही पहुंचाई। आलसी लोग कभी शरारती नही होते। क्योंकि शरारत के लिए सक्रियता जरूरी है। बेहद सक्रिय व्यक्ति ही शरारती हो सकता है। जरा सोचिए, सिकंदर और हिटलर थोड़े आलसी होते तो दुनिया कैसी होती। सारी शरारतें सक्रिय लोगों ने ही की हैं। लाओत्से निष्क्रियता के माध्यम से क्रिया करने पर बल देते हैं। ऐसी स्थिति में क्रिया और आलस विपरीत न होकर पूरक होते हैं।
आलस : बच्चों के संदर्भ में
अत्यधिक सक्रियता असंतोष की जननी होती है। प्रायः देखा जाता है कि कई बच्चे बेहद सक्रिय होते हैं और कई आलस्य से भरपूर। जानकार मानते हैं कि अधिक सक्रिय बच्चों की देखभाल करना और उन्हें कुछ सिखाना बहुत मुश्किल होता है। ऐसे बच्चों के साथ लंबे समय तक रह पाना किसी चुनौती से कम नहीं होता। बच्चों के मामले में अभिभावक यह मान कर चलते हैं कि उदासीनता और सक्रियता ही बच्चे की बुद्धि या क्षमता का पता लगाने का पैमाना है। जबकि ऐसा नहीं है। बच्चे की शक्तियों को पहचान कर उनपर ध्यान देने से ही उसकी बुद्धि का विकास संभव है। आलस का दोष मढ़कर बच्चे पर अनावश्यक दबाव डालना उन्हें तनाव की तरफ धकेल सकता है। पढ़ाई पर अधिक जोर देने की प्रवृति के चलते बच्चे मानसिक असंतुलन से गुजर रहे हैं। जानकार मानते हैं कि सोने और अलसाने के समय बच्चों को किसी रोमांचक गतिविधि में न उलझने दें।
भारतीय शहरों के बच्चों के अनुभवों में बदलाव लाने की कोशिश करने वाली किरण बीर सेठी बच्चों को पाल पोस कर बड़ा करने के एक सवाल पर कहती हैं कि हमारा कार्य बच्चों की जीवन यात्रा में उनका सहयोगी बनकर रहना है न कि ऐसा व्यक्ति बनकर जो किसी विशेष मार्ग पर चलने के लिए उनपर दबाव डाले। क्योंकि ऐसा नहीं है कि हम उन्हें कुछ भी सिखा सकते हैं। मैं समझती हूं कि हम ही उनसे काफी कुछ सीख सकते हैं। यह वास्तव में अपने आपको जानना है, न कि उन्हें। इसलिए मैं ऐसी मां बनना चाहूंगी जो इन यात्राओं पर उनके साथ-साथ चले न कि ऐसी मां जो उनसे कहे, "नही, यह मत करो।" बच्चों पर कवि खलील जिब्रान की एक कविता है -
"आपके बच्चे वास्तव में आपके बच्चे नहीं हैं,
वह तो स्वयं जीवन की आकांक्षा के ही बेटे बेटियां हैं।"
रणनीतिक आलस :
रणनीतिक आलस को चतुराई भरा आलस भी कहते हैं। अर्थात् कम समय में और कम काम करना। पर यह दक्षता से किया गया काम होता है। बदले में आलस हेतु अतिरिक्त समय भी निकल आता है। देखने में लग सकता है कि किसी संगठन में लोग बहुत कम काम कर रहे हैं। लेकिन, वे इसमें एक व्यवस्थित और रणनीतिक दृष्टिकोण अपनाते हैं। कुछ मनोविज्ञानी रणनीतिक आलस को बेहतरीन मानते हैं जो खुद को अनावश्यक चीजों से हटाकर विशिष्ट चीजों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रेरित करता है। उनके अनुसार रणनीतिक आलस उद्देश्यपूर्ण होता है। इसमें समय का बहुत सदुपयोग होता है, जिससे अधिक मेहनत किए बिना श्रेष्ठ कार्य संपन्न किया जा सकता है।
अतः आपको भी यदि आलस महसूस होता है तो खुद को दोष न दें। यह स्वयं को समझने का भी एक जरिया है। आलस की उपयोगिता को ध्यान में रखकर इसके प्रति पारंपरिक नजरिए को बदलने की जरूरत है। क्योंकि ऐसा भी देखा जाता है कि अधिक जुनूनी व्यक्ति को हर कोई आलसी नजर आता है और एक आलसी को हर कोई जुनूनी। आपसी रिश्तों के संबंध में भी आलस सहायक हो सकता है। एक आलसी व्यक्ति के लिए एक जगह बैठकर लंबी-लंबी बातें करना कोई मुश्किल काम नहीं। आलस के समय हमारा दिमाग सूचनाओं को खंगाल रहा होता है।
आलसी व्यक्ति इसलिए भी तनावमुक्त रहता है, क्योंकि वह स्वयं को रिलेक्स करने और दिमाग को रिचार्ज करने के तरीके ढूंढता रहता है। इस समय को वह आसानी से रचनात्मक कार्यों व नवाचार में लगा सकता है। क्योंकि इतिहास में ऐसे कई उदाहरण हैं जो अविश्वसनीय रूप से आलसी थे और उन्होंने अविश्वसनीय सफलता हासिल की।
